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Satyajit Ray: सत्यजीत रे की ये खासियतें उन्हें बनाती हैं सिनेमा का जीनियस, हासिल किया ऑस्कर का स्पेशल अवॉर्ड

Wed, 23 Apr 2025 07:30 AM IST
आराध्य त्रिपाठी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: आराध्य त्रिपाठी Updated Wed, 23 Apr 2025 07:30 AM IST
सार

Satyajit Ray Death Anniversary: इंडियन सिनेमा की दिशा और दशा बदलने वाले दिग्गज निर्देशक सत्यजीत रे न सिर्फ भारत बल्कि विदेशों में भी सिनेमा के छात्रों के लिए एक इंस्टीट्यूट माने जाते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं उनकी फिल्मों की खासियत, जो उन्हें बनाती है सबसे अलग।

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Satyajit Ray Death Anniversary, These Specialties Made Him The Genius Of Indian Cinema
सत्यजीत रे - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सत्यजीत रे, ये वो नाम है जिसे न सिर्फ भारतीय सिनेमा बल्कि पूरी दुनिया की सिनेमा का जीनियस कहा जाता है। सत्यजीत रे की फिल्मों से आज भी लोग सीखते हैं और हॉलीवुड के निर्देशक भी सत्यजीत रे के निर्देशन के तरीकों को अपनी फिल्मों के निर्माण में इस्तेमाल करते हैं। भारतीय सिनेमा को एक अलग दृष्टिकोण देने वाले सत्यजीत रे को सिनेमा का चलता-फिरता इंस्टीट्यूट कहा जाता है। उन्होंने उस वक्त में अपनी फिल्मों में वह प्रयोग किए जो शायद आज 21वीं सदी में भी करने से निर्देशक घबराएं। सामाजिक मुद्दों से लेकर राजनीति और महिलाओं पर आधारित फिल्में बनाना रे की यूएसपी थी। सत्यजीत रे उस दौर में इतनी सटलता से पॉलिटिकल कमेंट्री कर जाते थे कि समझने वाले उसे समझ भी जाते थे और कोई शोर भी नहीं होता था। सत्यजीत रे वो निर्देशक थे जो सिनेमा को शब्दों से भी बड़ा हथियार मानते थे और इसीलिए वो अपनी फिल्मों के दृष्यों में डायलॉग से भी गंभीर बात कर जाते थे। यही वजह है कि आज भी उनकी फिल्में सिनेमा के छात्रों के लिए एक बेहतरीन गाइड का काम करती हैं।

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सत्यजीत रे मशहूर निर्देशक होने के साथ-साथ महान लेखक, कलाकार, चित्रकार, फिल्म निर्माता, गीतकार और बुक कवर डिजाइनर व कॉस्ट्यूम डिजाइनर भी थे। सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि सिनेमा का इंस्टीट्यूट कहे जाने वाले सत्यजीत रे ने खुद कहीं से भी फिल्म मेकिंग की शिक्षा नहीं ली थी। उन्होंने सिर्फ हॉलीवुड की फिल्में देख-देखकर ही सबकुछ सीखा और अपनी पहली फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ से ही फिल्मों को लेकर लोगों का नजरिया बदल दिया। ये सत्यजीत रे के निर्देशन की काबिलियत और फिल्मों को लेकर उनकी अद्भुत सोच का ही नतीजा है कि उन्हें 'ऑस्कर ऑनरी अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया है। इस अवॉर्ड को जीतने वाले सत्यजीत रे अभी भी इकलौते भारतीय ही हैं। इसके अलावा सत्यजीत रे को दादा साहब फाल्के अवॉर्ड समेत रिकॉर्ड 37 नेशनल अवॉर्ड मिले हैं। 23 अप्रैल 1992 को इस दुनिया को अलविदा कहने वाले हिंदी सिनेमा के जादूगर सत्यजीत रे की आज 33वीं पुण्यतिथि है। इस मौके पर जानते हैं सत्यजीत रे के फिल्म निर्माण की वो बातें जो उन्हें बाकियों से अलग करती हैं और उन्हें सिनेमा का संस्थान बनाती हैं।

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सामाजिक विषयों व मुद्दों की बात करना
सत्यजीत रे की फिल्में सामाजिक मुद्दों पर बात करती हैं और अपनी कहानी के जरिए रे समाज की उन समस्याओं को उठाते थे, जिन्हें शायद उस समय के बाकी फिल्ममेकर उठाने की सोच भी नहीं सकते। इसका नमूना उन्होंने अपनी पहली ही फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ में दे दिया था। इसके बाद भी उन्होंने जलसाघर, चारुलता, देवी और शतरंज के खिलाड़ी जैसी फिल्मों के जरिए सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

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सत्यजीत रे और उनकी फिल्म चारुलता - फोटो : सोशल मीडिया

महिला केंद्रित फिल्में और महिलाओं के दमदार किरदार
सत्यजीत रे ने 50 और 60 के दशक में महिलाओं पर आधारित फिल्में बनाईं और अपनी फिल्मों में महिलाओं के दमदार किरदार दिखाए। जिस वक्त में सिनेमा का मतलब हीरो और हीरो का मतलब पुरुष एक्टर होता था, उस दौर में सत्यजीत रे ने एक नहीं बल्कि कई फिल्मों में महिलाओं की कहानी और उनके संघर्ष को बखूबी दिखाया। जिस समय भारतीय फिल्मों में महिलाओं के लिए मौजूद विशिष्ट भूमिका या तो ग्लैमर व शारीरिक प्रदर्शन या आंखों को सुकून देने वाली होती थी, उस वक्त में रे ने इस परंपरा को तोड़ा। उन्होंने महिला किरदारों को मजबूती से पेश किया और उनके संघर्षों को दिखाया। इस फेहरिस्त में ‘देवी’, ‘चारुलता’, ‘महानगर’ और ‘घरे बाइरे’ जैसी उनकी फिल्में शामिल हैं।

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मानवीय संवेदनाएं और संबंधों पर जोर
सत्यजीत रे की फिल्मों में मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की अहमियत की प्रमुखता देखने को मिलेगी। उन्होंने अपनी फिल्मों के माध्यम से प्रेम, दुख, आशा और निराशा जैसी भावनाओं को दर्शाया, जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ती हैं। साथ ही उन्होंने मानवीय रिश्ते और उनमें पैदा होने वाली जटिलताओं को भी बड़े ही सलीके से पेश किया है।

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फिल्म पाथेर पांचाली और चारुलता के सीन - फोटो : आईएमडीबी

शब्दों से ज्यादा दृष्यों से कह जाते थे गंभीर बात
सत्यजीत रे की फिल्मों की सबसे बड़ी खासियत होती थी कि उनकी फिल्मों के दृष्य, डायलॉग से भी ज्यादा गहरी बात कर जाते थे और आपके दिमाग पर एक गहरी छाप छोड़कर जाते थे। रे की फिल्मों को देखने के बाद ऐसा लगता है, मानो वो ये बताना चाह रहे हों कि शब्दों की सीमा है, दृश्य की नहीं। फिर वो चाहें ‘नायक’ का ड्रीम सीक्वेंस हो या फिर ‘चारुलता’ में चारुलता और अमल के बीच की मार्मिक बातचीत, जो उनकी भावनाओं को दर्शाती है। 

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‘पाथेर पांचाली’ का ये दृष्य
उनकी सबसे यादगार फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ का एक दृश्य है जिसमें अपू और दुर्गा एक शहर जाती ट्रेन को देखने के लिए काशफूलों के बीच से भाग रहे हैं। काशफूल का खिलना शरद ऋतु के आगमन की घोषणा होता है, यह मौसम का परिवर्तन, रेल की गति और पात्रों की गति, कितना कुछ है जो एक ही दृश्य में घट रहा है बदल रहा है। क्या ही गांव और शहर, क्षण और यात्रा का अद्भुत मैटाफर रचता है यह दृश्य।

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सत्यजीत रे - फोटो : सोशल मीडिया

प्रासांगिकता
सत्यजीत रे की 50-60 के दशक से लेकर अगर आप 70-80 के दशक की फिल्मों को भी देखेंगे तो आपको उन फिल्मों में एक प्रासांगिकता यानी की रेलेवेंसी देखने को मिलेगी और आप उनसे जुड़ पाएंगे। वो अपनी फिल्मों में ऐसे मुद्दों को उठाते थे और इस तरह से दिखाते कि देखने वाला हर वर्ग उससे जुड़ाव महसूस कर पाता था।

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सटल पॉलिटिकल कमेंट्री
सामाजिक विषयों के साथ-साथ सत्यजीत रे की फिल्मोग्राफी में आपको एक सटल राजनीतिक दृष्टिकोण भी देखने को मिलेगा। जिसके जरिए वो राजनीतिक व्यवस्था पर तंज कसते थे और राजनीतिक भ्रष्टाचार व सामाजिक असमानता को बखूबी पेश करते थे। कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है ‘शतरंज के खिलाड़ी’ फिल्म में, जिसमें शतरंज के खिलाड़ियों का खेल बहुत ही प्रतीकात्मक है, जो सत्ता और सामाजिक असमानता को दर्शाता है। रे की कुछ फिल्में जो राजनीतिक दृष्टिकोण दिखाती हैं उनमें ‘अरण्य’, ‘जन अरण्य’, ‘गणशत्रु’, ‘घरे बायर’ और ‘प्रतिद्वंदी’  जैसी फिल्में शामिल हैं। इन फिल्मों में रे ने भारतीय समाज में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों को उजागर किया है। साथ ही लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाली राजनीतिक व्यवस्था को दिखाया है।

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सत्यजीत रे - फोटो : सोशल मीडिया

संगीत का महत्वपूर्ण और प्रभावी प्रयोग
सत्यजीत रे की फिल्मों का संगीत भी काफी प्रभावी और कहानी को और भी दमदार बनाने वाला होता था। रे ने अपने करियर की शुरुआत में शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों के साथ काम किया। जिनमें रविशंकर, विलायत खान और अली अकबर खान शामिल थे। बाद में रे ने खुद वेस्ट्रन म्यूजिक की समझ ली और वो खुद अपनी फिल्मों के लिए संगीत देने लगे। ‘तीन कन्या’ से शुरुआत करने के बाद रे ने खुद का संगीत देना शुरू कर दिया। रे की फिल्मों में कई तरह के संगीत की झलक देखने को मिलती है, जिनमें सोनाटा, फ्यूग्यू और रोंडो जैसे संगीत के प्रकार प्रमुख हैं।

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सत्यजीत रे की प्रमुख फिल्में - फोटो : अमर उजाला
कलात्मकता और प्रयोग
सत्यजीत रे ऐसे फिल्ममेकर थे जिन्हें जोखिम उठाना और अपनी फिल्मों में प्रयोग करना काफी पसंद था। इसीलिए 1964 में आई ‘चारुलता’ के बाद के दौर में रे ने अपनी फिल्मों का अंदाज बदला और अलग-अलग जॉनर की फिल्में बनाई। इस दौरान उन्होंने फैंटसी, साइंस फिक्शन, जासूसी और हिस्टोरिकल ड्रामा जैसे जॉनर की फिल्में भी बनाईं। रे ने इस दौरान प्रयोग भी किए। इस दौर की उनकी पहली प्रमुख फिल्म 1966 में आई नायक (हीरो) है, जो एक स्क्रीन हीरो की ट्रेन में यात्रा करने और एक युवा, सहानुभूतिपूर्ण महिला पत्रकार से मिलने की कहानी है। 1967 में रे ने ‘द एलियन’ नाम की एक स्क्रिप्ट लिखी थी। हालांकि, बाद में ये फिल्म पूरी नहीं हो सकी। इस दौर में रे ने बच्चों की कहानी ‘गोपी गाइन बाघा बाइन’ से लेकर ‘प्रतिद्वंदी’, ‘सीमाबद्ध’, ‘जन अरण्य’, ‘सोनार केला’ और ‘शतरंज के खिलाड़ी’ जैसी कई अलग-अलग जॉनर की फिल्में बनाईं।
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