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Hindi News ›   Entertainment ›   Samwad 2025: Manoj Muntashir Shukla talks about Adipurush Movie at Amar Ujala Samwad event Lucknow

Samwad 2025:‘आदिपुरुष’ पर बोले मनोज मुंतशिर- ‘वो जीवन की सबसे बड़ी गलती थी’, बताया विवाद ने क्या-क्या सिखाया

Fri, 18 Apr 2025 05:53 PM IST
ज्योति राघव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला Published by: ज्योति राघव Updated Fri, 18 Apr 2025 05:53 PM IST
सार

Amar Ujala Samwad 2025: अमर उजाला संवाद के दूसरे दिन इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में चर्चा जारी है। आज 18 अप्रैल को गीतकार व पटकथा लेखकर मनोज मुंतशिर ने कार्यक्रम में शिरकत की है। जानते हैं उन्होंने क्या कहा?

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Samwad 2025: Manoj Muntashir Shukla talks about Adipurush Movie at Amar Ujala Samwad event Lucknow
मनोज मुंतशिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमर उजाला के दो दिवसीय वैचारिक संगम संवाद कार्यक्रम का आगाज गुरुवार से लखनऊ में गोमती नगर के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में हो चुका है। आज शुक्रवार को संवाद के दूसरे दिन गीतकार व लेखक मनोज मुंतशिर शुक्ला ने शिरकत की। इस दौरान उन्होंने अपने संघर्ष, मुंबई पहुंचने और गीतकार बनने की यात्रा पर बात की। जानते हैं..

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संवाद के मंच पर मनोज से पूछा गया कि लाइफ के सबसे बड़ा विवाद ‘आदिपुरुष’ के बाद जिंदगी ने क्या मोड़ लिए। कहां से गुजरी और क्या सिखाया? 
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इसके जवाब में मनोज मुंतशिर बोले, ‘लाइफ में कोई तजुर्बा बुरा नहीं होता सब अच्छे होते हैं। आदिपुरुष एक गलती थी एक भूल थी। जिसके लिए मुझे मेरे देश ने, मेरे भारतवर्ष ने, अवध की इस मिट्टी ने बहुत बड़ा दिल दिखाते हुए माफ कर दिया। 

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क्या याद रखूं कि कितने पत्थर फेंके गए
मनोज ने आगे कहा, ‘आप मुझसे पूछ रहे है तो मैं यह सोच रहा हूं कि मैं क्या याद रखूं कि मुझ पर कितने पत्थर फेंके गए या फिर मैं ये याद रखूं कि इतनी सारी गलतियों के बाद सभी ने मुझे गले से लगा लिया। कहना चाहूंगा कि ‘तेरी आंखों के दरिया का उतरना भी जरूरी था, मोहब्बत भी जरूरी थी और बिछ़डना भी जरूरी था।’

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Samwad 2025: Manoj Muntashir Shukla talks about Adipurush Movie at Amar Ujala Samwad event Lucknow
मनोज मुंतशिर - फोटो : अमर उजाला

‘आदिपुरुष’ ने मुझे दोस्त और दुश्मन में फर्क समझाया
मनोज ने आगे कहा, ‘मेरे जीवन में शायद आदिपुरुष भी जरूरी थी ताकि मैं सबकी कदर कर पाऊं। मैं सही और गलत समझ पाऊं। मैं यह समझ पाऊं कि दोस्त कौन है और दुश्मन कौन है। मैं ये जान पाऊं कि जो लाेग आपके साथ भीड़ बनकर आते हैं वो एक तरफ लेकिन जो लोग आपको कभी फाेन नहीं करते, आपके बुरे वक्त में आपके साथ पिलर की तरह खड़े हो जाते हैं।’

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देश से किया वादा
आगे मनोज ने देश की जनता से एक वादा करते हुए कहा, ‘आज मैं अपने आप को ज्यादा मजबूत पाता हूं और ज्यादा सुदृढ़ पाता हूं। देश से किया वादा आज फिर दोहराता हूं कि मैं जीवन में अब ऐसा कुछ नहीं करूंगा कि मेरी मिट्टी का और मेरे अपने लाेगों का सिर झुके।’

1100 रुपये में भजन लेखन की शुरुआत
मनोज मुंतशिर ने आगे कहा, 'फिल्म 'आदिपुरुष' तक सिर्फ मैं फिल्मों में गाने लिख रहा था। बड़ी-बड़ी फिल्मों के गाने ही लिखता था। 'आदिपुरुष' के बाद मैंने 1100 रुपये में भजन लिखे। मेरे सामने हमेशा दो रास्ते थे कि आप अपनी लोकप्रियता को कैसे भुनाएं। आप इसने निजी फायदे के लिए भी भुना सकते हैं और अपने सनातन के लिए भी भुना सकते हैं। मैं अपनी लोकप्रियता को अपने सनातन के लिए भुना रहा हूं। जय श्रीराम'।

'मुश्किल वक्त में राम की शरण में गया'
मनोज मुंतशिर ने संवाद में कहा, 'हर कोई मुश्किल में राम की शरण में जाता है। मैं भी मुश्किल में राम की शरण में गया। उस वक्त मुझे कोई सुख नहीं मिल रहा था। तब मुझे लगा कि राम के चरणों में ही अपने शब्द पुष्प अर्पित कर पाऊं। तो मुझे भगवान श्रीराम ने वाणी की शक्ति दी थी। शब्दों की शक्ति दी तो मैंने उन्हें अर्पित कर दी। मैंने सोचा निरंतर उन्हीं के लिए लिखूंगा।

लेखन की जब बात आती है, कोई लिखता क्यों है? यह प्रेरणा कहां से आती है?
मुंतशिर ने कहा, 'लिखने की एक वजह होनी चाहिए कि आपके अंदर कुछ उबल रहा है, तभी लिखना चाहिए। नहीं तो बेकार है। तुलसीदास ने कहा, 'मुझसे तो राम ने लिखवाया, वह मैंने लिखा'। इसलिए ईश्वर जब लिखवाए तब लिखो। भगवान डिक्टेशन न दे तो कोई नहीं लिख सकता। अगर परमात्मा आपका हाथ पकड़कर न लिखवाए तो कोई शेक्सपीयर नहीं लिख सकता।

आप अपने आपको किस परंपरा के गीतों में सबसे ज्यादा जुड़ा पाते हैं?
18 मार्च 1999 वह तारीख थी, जब मैंने पुष्पक एक्सप्रेस से 362 रुपये का टिकट लेकर ट्रेन पकड़ी थी। तब मेरे लिए फिल्मी गीतों का मतलब इतना था कि साहित्य और लोकप्रियता के बीच क्या कोई स्वीट पॉइंट है, ऐसी जगह जहां लिटरेचर आम आदमी से मिल जाए। मुझे वह फिल्मी गीतों में दिखाई दिया।

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