Savi Movie Review: ‘इम्पोर्टेड’ कहानी में मॉडर्न सावित्री का तड़का, हर्षवर्धन राणे छूट गए कहीं हाशिये पर
दिव्या खोसला कुमार अब सिर्फ दिव्या खोसला हैं। खोसला की अंग्रेजी वर्तनी में एक अतिरिक्त एस के साथ। अंग्रेजी के अंक शास्त्र में जरूरत से ज्यादा यकीन करने वाले हिंदी सिनेमा के अंग्रेजी कहानियों के प्रति मोह का नया नमूना है, फिल्म ‘सावि’। फिल्म का नाम उस उपन्यास के पहले पन्ने पर सावित्री काट कर लिखा जाता है, जो फिल्म का एक अहम किरदार पूरी फिल्म में लिखने की कोशिश करता रहता है। कहानी मूल रूप से फ्रेंच फिल्म ‘पू एला (एनीथिंग फॉर हर)’ और इसके अंग्रेजी रीमेक ‘द नेक्स्ट थ्री डेज’ से ली गई है। बस हिंदी में बनाते समय इसमें पुरुष पात्र को स्त्री पात्र में और स्त्री पात्र को पुरुष पात्र में बदल दिया गया है।
फिल्म ‘सावि’ एक पत्नी के अपने पति को जेल की ऊंची ऊंची दीवारों से मुक्त कराने की मुहिम के साथ शुरू होती है और उसे अस्पताल से भगाने की कोशिशों के साथ औंधे मुंह आकर गिरती है। मूल फिल्मों में ये काम अपनी पत्नी को कैद से छुड़ाने के लिए पति करता है, लेकिन अगर वही कहानी यहां भी आ जाती तो निर्माता मुकेश भट्ट की फिल्म ‘राज’ की तरह यहां भी सत्यवान और सावित्री की कहानी का धार्मिक आवरण भला कैसे चढ़ता? ब्रिटेन के लिवरपूल में एक खुशहाल जिंदगी जी रहे भारतीय परिवार के घर में पुलिस घुसती है। पति को इस आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है कि उसने अपनी सहकर्मी का कत्ल कर दिया है। अदालती बहस का एक भी दृश्य फिल्म में नहीं है। उसे कानूनी तौर पर छुड़ाने की कहीं कोई कोशिश नहीं होती। सीधे मामला उस ‘मास्टर प्लान’ पर आ जाता है जिसे पत्नी ने अपने घर की दीवार पर बुना है। इन धागों की बुनावट सही करने में इसे मदद मिलती है उस अपराधी से जिसे जेल तोड़कर भागने का अनुभव है और कैद से छूटने के बाद लिखी जिसकी किताबें काफी लोकप्रिय हैं।
फिल्म ‘सावि’ की बात करने से पहले यहां ये जानना जरूरी है कि मूल फ्रेंच फिल्म ‘पू एला’ बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही थी और इसकी अंग्रेजी रीमेक ‘द नेक्स्ट थ्री डेज’ सुपरहिट। निर्देशक अभिनय देव इसके पहले ‘देल्ही बेली’ बना चुके हैं और ये बता चुके हैं कि परंपरागत हिंदी फिल्मों के प्रति उनका खास आकर्षण नहीं है। विदेशी फिल्मों को हिंदी में बनाने की निर्माता मुकेश भट्ट की मास्टरी रही है। उनकी कंपनी विशेष फिल्म्स से अब उनके भाई महेश भट्ट अलग हो चुके हैं तो अब विशेष एंटरटेनमेंट के नाम से उनकी कंपनी ये नई फिल्म बनाई है। फिल्म ‘सावि’ अपनी नींव से ही कमजोर फिल्म है। विदेश में पति को बचाने की कोशिशों में लगी सावि के सामने जो चुनौती है, उसमें कोई विलेन नहीं है। और, परिस्थितियों को खलनायक बनाने की परवेज शेख की कोशिश काफी कमजोर है।
विदेशी धरती पर देसी दर्शकों को लुभाने वाली कहानियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि फिल्म देखते समय इससे कोई जुड़ाव लोगों को महसूस नहीं होता है। दिव्या खोसला की जिद है एक काबिल अभिनेत्री बनने की और वह अभिनय भी अच्छा करती हैं, लेकिन उनके अभिनय की अपनी सीमाएं हैं। मनोज कुमार की तरह बार बार अपना हाथ चेहरे पर लाने की उनकी आदत है। नाट्यशास्त्र के नौ रसों का प्रकटन चेहरे के भावों से कैसे किया जा सकता है, इसकी बेसिक ट्रेनिंग उनकी अभी बाकी है। ‘सावि’ का किरदार ऐसा है कि वह पल पल रंग बदलता है और इस रंग बदलती दुनिया में इंसान की नीयत ठीक क्यों नहीं है, ये बताना फिल्म भूल जाती है। कानून को तोड़ने की कोशिश करने वाले किरदारों को छोटे छोटे कानूनों का पालन करते दिखाना जरूरी होता है ताकि जब वह बड़ा कानून तोड़ने की जिद में उलझें तो दर्शकों की भावनाएं उसकी भावनाओं से जुड़ सके। पर, ये हो न सका और अब ये आलम है कि न फिल्म की कहानी असर करती है, न इसके किरदार और न ही इसका गीत-संगीत।
फिल्म ‘सावि’ की पटकथा भी इसकी विलेन है। आगे-पीछे, पीछे-आगे भागती कहानी को निर्देशक अभिनय देव ने ऐसे बनाया है कि बस एक फिल्म बन जाए किसी तरह। न उनको दिलचस्पी है एक अच्छा सिनेमा बनाने में और न ही फिल्म के बाकी कलाकार एक बढ़िया फिल्म बनाने को कहीं भी उत्सुक नजर आते हैं। हर्षवर्धन राणे जैसे उम्दा कलाकार को एक जूनियर आर्टिस्ट की तरह इस्तेमाल करके छोड़ दिया गया है। बीते साल की ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘एनिमल’ और इस साल के पहले महीने में रिलीज हुई फिल्म ‘फाइटर’ में चमके अनिल कपूर ने ये फिल्म क्यों की, वही बता सकते हैं। उनके पहली बार परदे पर आने से एक आस बंधती है। लेकिन, फिर उनका बार बार रूप बदल बदलकर आना दर्शकों को और परेशान करने लगता है। अनिल कपूर की हिंदी सिनेमा में एक अलग शख्सियत रही है और फिल्म ‘सावि’ उस पर ठीक ‘रेस 3’ जैसा पानी फेर देती है।
फिल्म में अंग्रेजी कलाकारों की भरमार है। उनके बीच हिमांशी चौधरी की मेहनत गौर करने लायक है। एम के रैना जब भी अपनी बेटी से वीडियो कॉल पर बातें करते नजर आते हैं, अच्छे लगते हैं। चिन्मय सालसकर अपने कैमरे से और शान मोहम्मद अपने संपादन से फिल्म को इसकी कहानी के हिसाब से मदद करने की पूरी कोशिश करते हैं। लेकिन, फिल्म के तीन गीतकार और चार संगीतकार मिलकर भी एक भी हिट गाना दे पाने में विफल रहते हैं। अपने निधन से सिर्फ हफ्ता भर पहले रिकॉर्ड किया गया लोकप्रिय गायक के के का एक गाना भी फिल्म में है, लेकिन हबड़ तबड़ हो चुकी कहानी के बीच आया उनका गाना भी अपना असर छोड़ने में नाकाम ही रहता है।