Pippa Review: ईशान, प्रियांशु-मृणाल की तिकड़ी का कमाल, घी के पीपे की तरह दर्शकों के दिलों पर तैर गई ‘पिप्पा'
भारत-पाकिस्तान के बीच हुई सैन्य लड़ाइयां सिनेमा की दिलचस्पी का विषय हर कालखंड में रही हैं। न्यू मिलेनियल्स के दौर में उन सैन्य अफसरों पर फिल्में बनाने का एक चलन सा चल पड़ा है, जिनके नायक युवा रहे। ‘शेरशाह’ सब देख ही चुके हैं। ‘इक्कीस’ पर काम शुरू हो चुका है और इस बीच सीधे ओटीटी पर रिलीज हुई है फिल्म ‘पिप्पा’। 3 दिसंबर 1971 को आधिकारिक रूप से शुरू हुई भारत-पाकिस्तान की लड़ाई से कुछ दिनों पहले और उसके बाद पूर्वी पाकिस्तान की सीमा पर जो कुछ हुआ, उसकी कहानी है ‘पिप्पा’। एक रूसी टैंक को ये नाम 16 पंजाब रेजीमेंट के सैनिकों ने दिया और इसके जरिये सैन्य कौशल दिखाने की जिम्मेदारी रही सेना की 45 कैवलरी रेजीमेंट के पास। ये एक ऐसा टैंक है जो जमीन पर तो चल ही सकता था, पानी में भी तैर सकता था। एक लंबे रास्ते को नदी से पारकर जिस तरह से इन टैंकों ने पाकिस्तानी छावनी पर धावा बोला और फतेह हासिल की, उसकी कहानी है ये फिल्म। फिल्म आननफानन में जिस तरह ओटीटी पर रिलीज करने का एलान हुआ और कुछ ही दिन में बिना किसी ढंग के प्रचार प्रसार के फिल्म रिलीज भी हो गई, उसकी वजह है 1 दिसंबर को रिलीज होने जा रही फिल्म ‘सैम बहादुर’। वह कैसे, आइए समझते हैं।
हर हैरी पॉटर को जिस तरह जीवन में एक डंबलडोर की जरूरत होती है, वैसा ही कुछ हुआ कैप्टन बलराम मेहता के साथ जब सेना के पहले उभयचर (एम्फीबियस) टैंक के ट्रायल के दौरान उसने अपने सीओ (कमांडिंग ऑफिसर) का कहना न मान शरारत की। अनुशासनहीनता के दंड स्वरूप उसे डेस्क का काम मिला। फिर एक दिन उसे चुनौती दी गई इस पीटी 76 टैंक की तीन फौजियों को ले जाने की क्षमता को बढ़ाकर चार फौजियों के लिए जगह बनाने की। बंदे ने ये कर दिखाया और उसी समय आ पहुंचे तत्कालीन सेनाध्यक्ष सैम मानेकशॉ। सैम ने इस काबिल लड़के को तुरंत फ्रंट पर रवाना करने का हुक्म दिया और अब तक अपने परिवार में अपनी शरारतों के चलते सबके निशाने पर रहा ये नौजवान अपने शहीद फौजी पिता के बूट्स उठाकर चल निकलता है एक ऐसे मिशन पर जिसकी मिसाल दुनिया के इतिहास में दूसरी नहीं मिलती। भारत ने पाकिस्तान से युद्ध किया और बनाया एक नया देश बांग्लादेश। किसी दूसरे देश की आजादी के लिए पड़ोसी देश की सेना के लड़ने का ये अपने आप में इकलौता उदाहरण है।
1971 की लड़ाई पर पहले भी फिल्में बनी हैं और आगे भी बनती रहेंगी। कभी सनी देओल जैसी गर्जना परदे पर सुनाई देगी तो कभी पनडुब्बी में रहकर दुश्मन को चौंकाने के कारनामे परदे पर उतरेंगे। लेकिन, इस फिल्म का बात ही कुछ और है। फिल्म के निर्देशक राजा कृष्ण मेनन कहते भी हैं कि पहली बार जब उन्होंने ब्रिगेडियर बलराम सिंह मेहता की लिखी किताब ‘द बर्निंग चैफीज’ पढ़ी तो लगा कि ये फिल्म नहीं बन सकती क्योंकि इतना वजनी टैंक बनेगा कैसे और वह पानी पर तैरेगा कैसे? किस्मत उनकी भी अच्छी रही और हिंदी फिल्म दर्शकों की भी कि भारतीय सेना के पास ऐसा एक टैंक निकल आया। मेरठ के सैन्य कारखाने में इसकी मरम्मत हुई और फिल्म में ईशान के साथ जो टैंक परदे पर आया, वह असली पीटी 76 टैंक ही है। इस टैंक के हमले से धू धूकर जलते पाकिस्तान के चैफी टैंकों के नाम पर ही ब्रिगेडियर मेहता ने अपनी किताब का नाम रखा, द बर्निंग चैफीज।
एक खास कालखंड में बनने वाली फिल्मों में कलाकारों, निर्देशक, संगीत, संपादन, नृत्य संयोजन की खूब बातें होती हैं, यहां भी होंगी। लेकिन ऐसी किसी भी फिल्म की आत्मा जो शख्स रचता है, वह होता है इसका प्रोडक्शन डिजाइनर। मौजूदा समय मे जी रहे दर्शकों को पांच दशक पीछे ले जाने का और उसका पूरा एहसास कराने का ये काम बहुत ही शानदार तरीके से किया है ‘पिप्पा’ के प्रोडक्शन डिजाइनर मुस्तफा स्टेशनवाला ने। ऐसी फिल्में देखते समय दर्शकों के सामने चुनौती होती है कि कैसे वह अपना दिल फिल्म से लगाएं और फिल्म बनाने वालों के सामने चुनौती होती है कि शुरू के ही 20-25 मिनटों में वे ऐसा क्या कुछ दिखाएं कि दर्शक एकदम से उनकी कहानी के साथ हो लें। फिल्म ‘पिप्पा’ में ये दूसरा अच्छा काम किया है संगीतकार ए आर रहमान ने शेली के लिखे गाने ‘मैं परवाना’ के जरिये। एक खास तरह के खांचे में फिट होते जा रहे गायक अरिजीत सिंह का इस गाने में रहमान के संगीत के जरिये पुनर्जन्म हुआ है। विजय ए गांगुली के नृत्य निर्देशन के अलावा मंदिरा शुक्ला की कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग का भी इसी गाने में पूरा का पूरा इम्तिहान हो जाता है। मतलब कि फिल्म तकनीकी रूप से काफी मजबूत फिल्म है।
अब, आते हैं फिल्म के कलाकारों और इसके निर्देशन पर। राजा कृष्ण मेनन की पिछली फिल्म ‘शेफ’ अगर आपने देखी है तो आपको समझ आ ही गया होगा कि पारिवारिक रिश्तों की नब्ज समझने और उसे पकड़ने में उनका कोई सानी नहीं है। उसके पहले फिल्म ‘एयरलिफ्ट’ में वह ये दिखा चुके हैं कि किसी फिल्म को बनाने में उनके किरदारों की मानसिकता को परदे पर कैसे पेश किया जाता है, फिल्म ‘पिप्पा’ इन दोनों अच्छी फिल्मों से बेहतर निर्देशक बने राजा की बेहतरीन फिल्म है। केरल में पैदा होने के बावजूद हिंदी वह कमाल की बोलते हैं और शायद इसीलिए वह हिंदी पट्टी की पृष्ठभूमि वाली दो भाइयों और एक बहन की इस कहानी को बनाकर सम्मानजनक अंकों से उत्तीर्ण होने में कामयाब रहे। राजा कृष्ण मेनन की ये फिल्म कायदे से बड़े परदे पर रिलीज होनी चाहिए थी। फिल्म में जहां जहां पिप्पा पानी में तैरता है, उसे देखने का आनंद वैसे तो आईमैक्स परदे पर लेना चाहिए लेकिन वह न हो तो कम से कम सामान्य फिल्मी परदे पर तो इसे आना ही चाहिए था। फिल्म की साउंड डिजाइन और संगीत भी सिनेमाहॉल में दर्शक के चारों तरफ लगे स्पीकर्स के हिसाब से ही है।
कलाकारों में ईशान के साथ भी ये संयोग रहा कि 26 साल की उम्र में जंग लड़ने चले गए कैप्टन बलराम मेहता की कहानी फिल्माते वक्त वह भी इतने ही साल के थे। पंजाबी पृष्ठभूमि का उनका किरदार है। फौज में ही मेजर बड़े भाई राम से उसकी कतई पटती नहीं है। बहन राधा के साथ वह सुट्टा मारता है। मां दोनों भाइयों की इस अनबन की तड़प बस आंखों से बयां करती है। ईशान ने एक युवा फौजी के रूप में अच्छा काम किया है। पहले फौजी जासूस और फिर छोटे भाई के साथ दोस्ती बनाने के दृश्यों में प्रियांशु ने अपना असर छोड़ा है। मृणाल ठाकुर के लिए फिल्म में खास कुछ करने को नहीं है लेकिन फिल्म के सबसे अहम सीन में जब वह याहया खान का संदेश डिकोड करती हैं, तो उनके किरदार के होने का मतलब बन जाता है। सोनी राजदान का भी शानदार है। सैम मानेकशॉ के किरदार में कमल सदाना को देखना सुखद रहा। इंदिरा गांधी के किरदार में हालांकि फ्लोरा डेविड जैकब का चयन ठीक नहीं कहा जा सकता।
फिल्म ‘पिप्पा’ को इसके मुख्य कलाकारों के अलावा इसके जिन अन्य सहायक कलाकारों से भरपूर मदद मिलती है, वे हैं 45 कैवलरी के सीओ यानी चीफी बने चंद्रचूड़ राय, लेफ्टिनेंट यानी स्पीडी का किरदार कर रहे अर्जुन सिंह दुहन और रामफल के किरदार में सूर्यांश पटेल। सूर्यांश के किरदार के साथ स्पीडी की छेड़छाड़ वाला सीन एक गंभीर फिल्म में हास्य के लम्हे भी ले आता है। सी एंड ए में काम कर रहे अनिर्बान के रोल में सोहम मजूमदार का काम अच्छा है। और, इस सब ‘तोड़फोड़’ के बीच अपने अभिनय का एक अलग असर एक बार फिर छोड़ने में कामयाब रहे अभिनेता इनामुलल हक। इनामुल हिंदी सिनेमा में धीरे धीरे अपनी छाप छोड़ रहे हैं और अगर उनकी मेहनत कामयाब होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब वह किसी हिंदी फिल्म में मुख्य विलेन का किरदार करते भी नजर आ सकते हैं।