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Film Review: बोरियत के साथ कन्फ्यूज करती है 'नूर'

Fri, 21 Apr 2017 02:15 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Fri, 21 Apr 2017 02:15 PM IST
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'Noor' Movie Review Starring Sonakshi Sinha, Kanan Gill, Purab Kohli & Shibani Dandekar
'नूर' फिल्म रिव्यू
निर्माताः टी सीरीज
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निर्देशकः सुनील सिप्पी

सितारेः सोनाक्षी सिन्हा, कनन गिल, पूरब कोहली

रेटिंग **
 
रवि बुले

पाकिस्तानी राइटर सबा इम्तियाज के उपन्यास ‘कराची! यू आर किलिंग मी’ पर आधारित 'नूर' लंबे एकालाप जैसी है। जो आगे बढ़ती हुई बोरियत बढ़ाती जाती है। एक फ्रीलांस इंटरनेट जर्नलिस्ट के नजरिये से मुंबई को देखने की कोशिश उबाऊ है। फिल्म यह कहने की कोशिश जरूर करती है कि मुंबई और उसके जैसे तमाम आधुनिक बढ़ते शहर लोगों की जिंदगी खत्म कर रहे हैं। उनमें जीवन के खतरे बढ़ रहे हैं। संवेदनाएं मर रही हैं। परंतु यह सब बेहद सतही अंदाज में यहां है। न पत्रकार की पैनी नजर है और न लेखन की खूबसूरती। नूर (सोनाक्षी सिन्हा) परेशान है कि उसका वजन उसके ट्विटर फॉलोअर्स की संख्या से ज्यादा है और जिस एजेंसी से वह जुड़ी है, उसका बॉस रिसर्च आधारित स्टोरीज की जगह उसे सनी लियोनी का इंटरव्यू लाने जैसा ‘नॉन सीरियस’ काम सौंपता है!

नूर के किरदार की तरह कहानी कन्फ्यूज है। न ठीक-ठीक प्यार है और न करियर। यहां मानव अंगों की चोरी/तस्करी का मामला उठाया गया है, जो निश्चित अंजाम तक नहीं पहुंचता। रसूखदारों को संदेह का लाभ दिया गया। नूर इंटरनेट की आभासी और मायावी दुनिया जैसी रची गई है। अतः मनोरंजन भी फुसफुसा है। इंटरवेल तक जरूर नूर की निजी दुनिया में आज के वर्चुअल वर्ल्ड वाले युवाओं की तस्वीर सामने आती है लेकिन दूसरे हिस्से में वह भी गायब है। पहले हिस्से की घटनाओं को समेट लेने की कोशिश, खोखले नतीजे सामने लाती है। कैमरे की आंख से मुंबई को नए ढंग से दिखाने में भी फिल्म नाकाम है।
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कमजोर है कहानी और स्क्रिप्ट

'Noor' Movie Review Starring Sonakshi Sinha, Kanan Gill, Purab Kohli & Shibani Dandekar
'नूर' फिल्म रिव्यू
सोनाक्षी सिन्हा असमंजस में हैं कि फिल्मी इमेज के ऊंट को किस करवट बैठाएं। रूमानी छवि (लुटेरा) और एक्शन गर्ल (अकीरा) के रूप में वह फ्लॉप रहीं। अब नूर में किशोरवय युवतियों की तरह दिखने-व्यवहार करने की कोशिश है लेकिन गैर-जरूरी कॉमिक अंदाज उन्हें ‘जर्नलिस्ट’ से ‘जोकर’ में बदल देता है। सोनाक्षी को देख कर कभी नहीं लगताः तुम आ गए हो नूर आ गया है।

कनन गिल नाजुक छोरे जैसे हैं। उनमें हीरो वाला दम नहीं। पूरब कोहली जरूर अपनी भूमिका में असर पैदा करते हैं। मगर उनकी कहानी छोटी-सी है। लंदन में जीवन का लंबा समय बिताने वाले निर्देशक सुनील सिप्पी की यह पहली फिल्म है। तकनीकी नजरिये से फिल्म पर उनकी पकड़ है परंतु कहानी और स्क्रिप्ट कमजोर थी तो वह क्या करते। उनकी दूसरी फिल्म का इंतजार करना चाहिए। इन दिनों फिल्मों में पुराने गाने रीमिक्स द्वारा बर्बाद किए जा रहे हैं। नूर में ‘गुलाबी आंखें’ के साथ यही किया गया है।

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