Next Goal Wins Review: बॉक्स ऑफिस पर एक और बायोपिक ढेर, इस बार लगा हॉलीवुड के दिग्गज निर्देशक का नंबर
फिल्म ‘थॉर: लव एंड थंडर’ के बाद निर्देशक ताइका वाइटीटी की अगली फिल्म 'नेक्स्ट गोल विन्स' स्पोर्ट ड्रामा पर आधारित फिल्म है। निर्देशक ताइका वाइटीटी बहुत ही मस्तमौला इंसान हैं। उनकी यह खूबी उनकी फिल्मों में नजर भी आती है, लेकिन उनका यह तुक्का इस बार फिल्म 'नेक्स्ट गोल विन्स' में बैठता नजर नहीं आ रहा है। यह फिल्म पिछले साल 17 नवम्बर 2023 को अमेरिका में रिलीज हो चुकी है। अब हिंदी दर्शकों के बीच आज से सिनेमाघरों में रिलीज हुई है।
फिल्म 'नेक्स्ट गोल विंस' की कहानी अमेरिकी समोआ पुरुषों की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम की सच्ची घटना पर आधारित है जो अप्रैल 2001 में फीका विश्व कप के दौरान आस्ट्रेलिया से 31-0 से हार गई था। इस मैच के नतीजे के बाद क्वालिफिकेशन टूर्नामेंट के प्रारूप के बारे में बहस शुरू हो गई थी। साल 2014 में माइक ब्रेट और स्टीव जैमिसन ने इसी नाम की डॉक्यूमेंट्री बनाई थी जिसमें डच-अमेरिकी कोच थॉमस रॉन्गेन के अमेरिकी समोआ राष्ट्रीय फुटबॉल टीम का नेतृत्व करने के प्रयासों के बारे में बताया गया है। इसे दुनिया की सबसे कमजोर फुटबॉल टीमों में से बताया जाता है। थॉमस रॉन्गेन एक डच-अमेरिकी फुटबॉल कोच हैं, जिन्होंने अपने खेल और कोचिंग करियर का अधिकांश समय संयुक्त राज्य अमेरिका में बिताया है। इस फिल्म में थॉमस रॉन्गेन का किरदार माइकल फेसबेंडर ने निभाया है।
अमेरिकी समोआ पुरुषों की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम पर बनी डॉक्यूमेंट्री को काफी पसंद किया गया। निर्देशक ताइका वाइटीटी ने इसी विषय पर फिल्म 'नेक्स्ट गोल विन्स' का निर्माण यह सोचकर किया कि जब डाक्यूमेंट्री को लोगों ने बहुत पसंद किया तो अगर इसे फीचर फिल्म का रूप दिया जाए तो दर्शक फिल्म को और भी पसंद कर सकते हैं। लेकिन फिल्म में थोड़ी सी लिबर्टी लेने के चक्कर में फिल्म बीच-बीच में अपना असर खोती रहती है। फिल्म देखने के बाद लगता है कि एक वास्तविक कहानी को आलसी लेखन और उत्साहहीन चुटकुलों के भारी बोझ के नीचे कुचल दिया गया है।
जैसा कि फिल्म के शीर्षक 'नेक्स्ट गोल विन्स' से जाहिर होता है कि एक हारी हुई टीम अंत में मैच जीत कर यह साबित कर देती है कि किसी भी काम को अगर धैर्य, मेहनत से किया जाए तो सफलता मिलनी निश्चित हैं, ऊपर से अगर सही मार्गदर्शन मिल जाए तो सोने पर सुहागा। फिल्म की कहानी एक लाइन में सुनने में जितनी अच्छी लगती हैं, फिल्म उतनी ही बिखरी हुई है। निर्देशक वाइटीटी की फिल्मों की खासियत यह रही है कि फिल्म कैसी भी हो, उसमें कॉमेडी के पंचेज जरूर होते हैं, लेकिन उनका यह प्रयोग इस फिल्म में काम नहीं आया।
फिल्म में माइकल फेसबेंडर का किरदार बहुत गुस्से वाला दिखाया गया है, इसके पीछे उनकी अपनी पारिवारिक परेशनियां हैं, छोटी बेटी की मृत्यु एक कार दुर्घटना में गई और पत्नी किसी और के साथ रिलेशनशिप में हैं। उनकी इच्छा के विपरीत उनको अमेरिकन समोआ कोच बनाकर भेज दिया जाता है। इस किरदार का अपना एक अलग ही फ्रस्टेशन है, जो परदे पर नजर आता है, लेकिन इस किरदार को भी कॉमेडी करते देखकर हैरानी होती है। आमतौर पर जब हम किसी स्पोर्ट पर आधारित फिल्में देखते हैं तो ऐसा अनुभव होता है कि जैसे हम किसी स्टेडियम में बैठकर मैच देख रहे हैं, लेकिन फिल्म के निर्देशक इस फिल्म में ऐसा कोई अनुभव दर्शकों को नहीं करा पाए।
इस फिल्म को स्पोर्ट फिल्म ना कहकर अगर कॉमेडी फिल्म कहें तो ज्यादा बेहतर होगा। फिल्म में ऐसे कई दृश्य है जो हास्यास्पद लगते हैं, जिनका मूल कथानक से कुछ भी लेना देना नहीं है। फुटबॉल टीम में जिन कलाकारों का चयन किया गया है, वह अपनी क्षमताओं या व्यक्तिगत कहानियों को उजागर करने में असमर्थ है। फुटबॉल टीम में गैर-बाइनरी खिलाड़ी जयाह सेलुआ का किरदार ट्रांसजैंडर काइमाना ने निभाया हैं, अपनी भूमिका से वह जरुर प्रभावित करती है, लेकिन फिल्म में इस किरदार को जिस तरह से नायक की तरह अंत में पेश किया गया है, वह थोड़ा सा खटकता है। बाकी फिल्म के कलाकारों में ऑस्कर काइटली, डेविड फेन,राहेल हाउस,बेउला कोआले,विल आर्नेट, एलिजाबेथ मॉस की भूमिका ठीक ठाक रही हैं। एलिजाबेथ मॉस की हॉलीवुड की फिल्मों में जिस तरह का अभिनय ग्राफ है, उनके मुकाबले इस फिल्म में उनकी भूमिका बहुत ही प्रभावहीन है।