Longlegs Review: ‘लॉन्गलेग्स’ कातिल को पकड़ने निकले कानून के लंबे हाथ, निकोलस केज कमाल, मायका का मायाजाल
फिल्म ‘लॉन्गलेग्स’ के खत्म होने के बाद जब इसके एंड क्रेडिट्स परदे पर रोल होने शुरू होते हैं तो ये नीचे से ऊपर की तरफ न जाकर ऊपर से नीचे की तरफ आते हैं। देखने वाले को विचलित करते हैं। उसकी सिनेमा देखने का रूटीन सोच को झकझोरने की कोशिश करते हैं और दिमाग को परेशान भी करते हैं। ये तीन लाइनें हीं फिल्म ‘लॉन्गलेग्स’ का पूरा परिचय हैं। ऑसगुड रॉबर्ट ‘ऑज’ परकिंस द्वितीय ने अपना नाम बदलकर अपने दादा ऑसगुड परकिंस के नाम पर कर रखा है। फिल्म ‘साइको II’ (1983) में वह पहली बार कैमरे के सामने दिखाई दिए, जब उनकी उम्र कोई नौ साल की रही होगी। हॉरर की परंपरा को वह अब ‘लॉन्गलेग्स’ तक ले आए हैं, जहां वह इस श्रेणी की फिल्मों के शौकीनों को एक बिल्कुल अलग अनुभव देने की कोशिश में हैं।
ऑसगुड परकिंस की फिल्म ‘लॉन्गलेग्स’ बीती सदी के कालखंड की कहानी है। कहानी एफबीआई एजेंट ली हार्कर की है जिसे घटनाओं का पूर्वानुमान कुछ ऐसा होता है कि इसे उसका खास गुण मान लिया जाता है। एक सीरियल किलर केस की तफ्तीश में उसे शामिल किया जाता है। मामला कुछ कुछ समझ में भी आने लगता है। कूटभाषा में लिखे गए वाक्यों को वह समझने की कोशिश कर रही है। हत्याएं जो हो रही हैं उनमें घरों में किसी बाहरी की आमद के निशान नहीं मिल रहे हैं। हत्याएं घर का ही कोई सदस्य बहुत ही निर्मम तरीके से कर रहा है और पूरे परिवार को मारने के बाद खुद भी अपनी जान खो दे रहा है, लेकिन क्यों?
इसी ‘क्यों’ की तलाश में निकली ली हार्कर के जरिये लेखक-निर्देशक ऑसगुड परकिंग दर्शकों को विचलित करना चाहते हैं। हार्कर के किरदार में मायका मोनरो खुद भी विचलित नजर आती हैं। यूं लगता है कि जैसे 10 साल पहले रिलीज हुई अपनी फिल्म ‘इट फॉलोज’ से सीधे निकलकर वह इस फिल्म में चली आई हैं। उनका ध्यान कहीं और दिखता है और वह कहीं और। मायका की एक विचलित और मानसिक रूप से हिली हुई सी महिला की छवि बनाकर चलती फिल्म ‘लॉन्गलेग्स’ में कहानी परत दर परत खुलती चलती है और जो कुछ हॉरर फिल्मों के शौकीन इस कहानी के अगले दृश्य के बारे में सोच पाते हैं, कहानी ठीक उसके उलट खुलती है। ऑसगुड परकिंस की दर्शकों को लगातार विचलित करते रहने की ये तकनीक काफी हद तक कामयाब भी होती दिखती है। और, इसमें मायका का दमदार अभिनय उनकी पूरी मदद करता है।
डरावनी फिल्में देखने वाले दर्शकों का एक बड़ा वर्ग दुनिया के हर देश में हैं। इन दर्शकों को लक्षित करके हर भाषा में हर साल तमाम फिल्में भी बनती हैं। हिंदी दर्शक भले अभी तक ‘शैतान’ और ‘मुंजा’ जैसी फिल्मों में दिखने वाली डरावनी पैशाचिक परंपराओं में ही अटके हों, फिल्म ‘लॉन्गलेग्स’ बीती सदी मे जाकर एक ऐसी परंपरा की पोल खोलने की कोशिश करती है, जिसमे वूडू, सम्मोहन, विकर्षण और शैतानी ताकतों जैसी तमाम चीजें एक साथ घोल दी गई हैं। फिल्म में मायका मोनरो के सामने समस्याएं पैदा करने वाले किरदार को निकलस केज ने निभाया है। निकलस केज का अभिनय पसंद करने वालों का भी एक अलग फैनबेस है और फिल्म ‘लॉन्गलेग्स’ की सफलता में उनकी ये खलनायकी काफी काम आ सकती है। लेकिन, उनका जो रूप और रंग फिल्म में है, वह बहुत प्रभावशाली बन नहीं पाया है।
निर्देशक ऑसगुड परकिंस की फिल्म ‘लॉन्गलेग्स’ को पश्चिमी मीडिया एक कालजयी फिल्म बता रहा है। युवाओं में बेहद लोकप्रिय वेबसाइट रॉटेन टमेटोज तक अपनी मुंबइया पीआर एजेंसीस की पहुंच हुई या नहीं, ये तो पता नहीं लेकिन इसका इस फिल्म सौ फीसदी ‘ताजा’ होने का दावा इस फिल्म को देखने के बाद बहुत प्रभावित करता नहीं दिखता है। एंड्रेस अरोची टिनाएरो ने पूरी फिल्म में परकिंस की कल्पनाओं के मुताबिक कैमरे को प्रयोगात्मक कोणों पर रखते हुए दर्शकों को कुछ अलग छवियां दिखाने की कामयाब कोशिशें की हैं। कहीं कहीं फ्रेम बनाते समय वह किरदारों के सिर गायब कर देते हैं। एक कलाकार है और दूसरे कलाकार का सिर्फ धड़ फ्रेम में दिख रहा है। अज्ञात के आकर्षण को पनपने देने में उनके ये फ्रेम मददगार साबित होते हैं।
फिल्म के दोनों एडिटर्स ग्रेग एनजी और ग्राहम फोर्टिन का एक दृश्य से दूसरे दृश्य पर जाने का कौशल भी कई मौकों पर तारीफ का हकदार है। जिल्गी का संगीत भी सहायक है। लेकिन, फिल्म की कहानी में जैसे ही एफबीआई एजेंट, उसके पारिवारिक इतिहास, फिल्म का खलनायक और नायिका की मां के रास्ते मिलने शुरू होते हैं, फिल्म अपना आकर्षण खोने लगती है। हॉरर फिल्मों के विशिष्ट शौकीनों के लिए ये फिल्म जरूर एक दर्शनीय प्रयोग है, लेकिन कमर्शियल डरावनी फिल्मों देखने वाले आम दर्शकों के लिए ये फिल्म उनके धैर्य की परीक्षा लेती दिखती है।
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