Life Hill Gayi Review: कुशा व दिव्येंदु की जोड़ी का सीजन का सबसे बड़ा फ्लॉप शो, दर्शकों की भी लाइफ हिल गई
डिज्नी प्लस हॉटस्टार के अगर आप सालाना ग्राहक रहे हैं और आपने इसका सब्सक्रिप्शन बीते साल ही ले रखा है तो इन दिनों ये ओटीटी रोज आपसे कुछ और पैसे मांगने की फरियाद करता दिखता है। पता नहीं होता इन ओटीटी का। वूट के सालाना सब्सक्रिप्शन का भी न जाने क्या ही हुआ। जहां वूट गया, वहीं ये भी जाने वाला है। डिज्नी प्लस हॉटस्टार वालों की लाइफ इतनी हिली हुई है कि अपने प्लेटफॉर्म पर ताजा ताजा रिलीज हुई वेब सीरीज ‘लाइफ हिल गई’ का प्रचार करना तक उन्हें याद नहीं रहा। निर्माता ने खुद अपने पैसे से मुंबई में इसकी प्रेस कांफ्रेंस की। सीरीज बस बनानी थी सो बना दी गई। किसी ने लगता है इसे देखा ही नहीं। ग्राहकों की चिंता न हॉटस्टार की तरफ से गौरव बनर्जी, नेहा सिन्हा और कर्ण गुप्ता ने की और न ही हिमश्री फिल्म्स की तरफ से अपूर्वा बजाज ने। इसे देखते देखते दर्शकों की भी लाइफ हिल सी गई है।
चारों खाने चित्त गिरी अरुषि की वेब सीरीज
कनाडा की एक चर्चित टीवी सीरीज है, ‘शिट्स क्रीक’। शहर से परेशान एक परिवार वापस आकर अपने गांव के करीब बसता है। शहरी रईसों की जीवन शैली से स्थानीय बाशिंदों की जीवन शैली और विचारों का टकराव होता है। और, करीब करीब इसी विचार पर बनी है वेब सीरीज ‘लाइफ हिल गई’। सीरीज का विचार खुद निर्माता अरुषि निशंक का बताया गया है। वैचारिक स्तर पर शहरी और ग्रामीण जीवन के मूल्यों की ये टकराहट दिखती भी काफी हास्यप्रद है, लेकिन अरुषि ने जिन कार्यकारी निर्माता अपूर्वा बजाज को इस सीरीज का क्रिएटिव हेड बनाया है, उन्होंने सीरीज की आत्मा समझे बगैर ही इस कहानी को चारों खाने चित्त कर दिया है।
बहुत धैर्य चाहिए ये सीरीज देखने के लिए
वेब सीरीज ‘लाइफ हिल गई’ की कहानी एपिसोड दर एपिसोड आगे बढ़ती है। एक धारा इसकी बहन-भाई की शिकायतों और शरारतों के साथ इन दोनों के पिता और उनके पुराने स्टाफ की तरंग के साथ बहती है, दूसरी धारा इनके आधुनिक विचारों के गांव वालों के पारंपरिक विचारों के टकराने से आगे बढ़ती है। दोनों धाराओं का संगम होगा कि नहीं, इसी पर सीरीज का सस्पेंस टिका है। मूल रूप से ये सीरीज एक कॉमेडी सीरीज मानी जा सकती है। अपूर्वा बजाज के मार्गदर्शन में इसे लिखा है, जसमीत सिंह भाटिया, सुप्रीत कुंदर और अक्षेंद्र मिश्रा। कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा मिलाकर जोड़े गए भानुमति के इस कुनबे के कुल छह एपिसोड देखना अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं है।
शहरी और ग्रामीण संस्कृति का टकराव
औसतन तीस मिनट के एपिसोड भी अगर किसी सीरीज के फास्ट फॉरवर्ड मोड में देखने का मन करने लग जाए तो पहली बात तो यह समझ आती है कि सीरीज की न तो कहानी में दम है और न ही इसकी पटकथा और इसके संवादों में। शहर से गांव पहुंचे लोगों ने जैसे कसम खा रखी है बात बात पर उन्हें ‘एलियन’ समझने की और ये ‘एलियंस’ भी हरकतें ऐसी करते हैं कि लगता ही नहीं कि ये सीरीज पहाड़ों की ही एक बेटी ने बनाई है। अरुषि चाहतीं तो इसे उत्तराखंड की लोक संस्कृति में रची बसी एक ऐसी सीरीज बना सकती थी, जो बाहर से आने वालों को अपने सूबे की सुंदरता अपनी आंखो से दिखाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कुछ देवभूमि से अनजान लेखक और कुछ उनकी लिखी अनगढ़ पटकथा, छह एपिसोड की ये सीरीज आखिर तक पहुंचते पहुंचते बोर कर देती है।
नहीं जमी दिव्येंदु और कुशा की जोड़ी
विनय पाठक जैसे काबिल कलाकार को वेब सीरीज ‘लाइफ हिल गई’ में दारूबाज प्राणी बनाकर उनकी अभिनय क्षमता का कहीं कोई कायदे का उपयोग ही नहीं किया है निर्देशक प्रेम मिस्त्री ने। दिव्येंदु का अपना एक अलग ही आभामंडल है। ‘इक्कीस तोपों की सलामी’ वह अब भी अपने हर किरदार में चाहते हैं और सच ये भी है कि गांववाली बनी जिन मुक्ति मोहन के चौबारे में उनका किरदार जूते पहनकर घुस जाता है, वह उनसे ज्यादा शहरी नजर आता है। मुक्ति मोहन ने ही इस पूरी सीरीज में सधा और संतुलित अभिनय किया है। दिव्येंदु और कुशा कपिला दोनों की ओवर एक्टिंग का एक दूसरे से कंपटीशन ही चलता रहता है। कबीर बेदी बस कंप्यूटर के बदलते स्क्रीन पर नमूदार होते रहते हैं। हेमंत पांडे जैसे कलाकार को अरसे बाद देख आस बंधी थी कि कुछ बेहतर वह इस बार कर दिखाएंगे लेकिन उनका किरदार भी कमजोर स्क्रिप्ट और खांचे में बंधे चरित्र चित्रण का शिकार हो गया है।