Khoj Parchaiyo Ke Uss Paar Review: 35 साल पुरानी फिल्म की कहानी पर बनी वेब सीरीज, न वो चली और न इसमें कोई दम
रामसे ब्रदर्स वाले केशू रामसे ने कोई 35 साल पहले अपनी पारिवारिक परंपरा से हटकर एक सस्पेंस थ्रिलर फिल्म बनाने की कोशिश की, नाम था उस फिल्म का ‘खोज’। ऋषि कपूर और नसीरुद्दीन शाह जैसे सितारों वाली इस फिल्म की कहानी भी वही थी जो जी5 पर प्रसारित हो रही वेब सीरीज ‘खोज-परछाइयों के उस पार’ की है। 20 से 25 मिनट के कुल जमा सात एपिसोड और सबकी कुल अवधि मिलाकर इतनी जितनी दो घंटे 20 की एक आम फीचर फिल्म की इन दिनों होती है। शायद फिल्म के रूप में ही बनी होगी ये सीरीज। फिर इसे बनाने वालों और इसे जी5 पर प्रसारित करने का निर्णय लेने वालों को लगा कि इसे सीरीज रूप में प्रसारित कर देते हैं, दर्शकों को क्या ही पता चलने वाला है कि फिल्म बनी थी या सीरीज?
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साल 1989 में रिलीज हुई फिल्म ‘खोज’ और वेब सीरीज ‘खोज-परछाइयों के उस पार’, दोनों की कहानी एक ही है। एक बेचारा सा दिखने वाला पति अपनी पत्नी के गुम हो जाने की जानकारी देने पुलिस के पास आता है। उम्मीद यही कि पुलिसवाले लापता पत्नी को खोज दें। पुलिस कोशिश भी यही करती दिखती है। फिर पत्नी लौट आती है। लेकिन, ये समस्या का हल नहीं, उसकी शुरुआत है। पति का कहना है कि ये उसकी पत्नी है ही नहीं। तो जो पत्नी बनकर आई है, वह कौन है? और, अगर ये पत्नी नहीं है तो फिर असली पत्नी कहां है? दो लाइन के सूत्र के हिसाब से कहानी रोचक लग सकती है लेकिन दर्शकों ने न 35 साल पहले वाली फिल्म ‘खोज’ को कोई तवज्जो दी और न ही वेब सीरीज ‘खोज-परछाइयों के उस पार’ में उनकी खास रुचि नजर आती दिख रही है।
वेब सीरीज ‘खोज-परछाइयों के उस पार’ के कलाकार शारिब हाशमी और अनुप्रिया गोयनका अच्छे कलाकार हैं। दोनों का अभिनय कई कहानियों में लोगों को रुचिकर लगा भी होगा, लेकिन यहां ये सीरीज देखकर लगता है कि दोनों ने बस अपनी अपनी फीस के एवज में ये काम कर दिया। दोनों को देखकर ही बताया जा सकता है कि कितनी अरुचिपूर्ण ढंग से वे ये किरदार कर रहे हैं। पुलिस अफसर के रोल में आमिर दलवी हैं। इस किरदार को गढ़ा तो पंचगनी की ‘चौकी’ में तैनात पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में ही गया है, लेकिन भाषा, चाल चलन और बात करने का तरीका, इसका किसी हवलदार जैसा ही है। कहानी और किरदार दोनों स्तर पर ये सीरीज पहले एपिसोड से ही पकाने लगती है।
निर्देशक परेश बरुआ ने अतीत में ‘गली गली सिम सिम’, ‘गुटर गूं’, ‘सीआईडी’ और ‘अदालत’ जैसे धारावाहिकों के निर्देशन में हाथ बंटाया है। वेब सीरीज ‘खोज-परछाइयों के उस पार’ के निर्देशन में भी टीवी धारावाहिकों वाले ब्लॉक फ्रेम ही ज्यादा नजर आते हैं। वह अपनी सीरीज को किसी लोकप्रिय जासूसी उपन्यास की तरह बनाने की कोशिश तो करते हैं और हर एपिसोड के आखिर में कुछ न कुछ सस्पेंस भी लाने की कोशिश करते हैं लेकिन मुझे लगता है कि इसके हर एपिसोड से पहले एक वैधानिक चेतावनी जरूर होनी चाहिए कि ये सीरीज अपने जोखिम पर देखें। जी5 के ग्राहक आप बन चुके हैं तो इसमें तो अब कुछ नहीं किया जा सकता लेकिन अगर आपको अपने वीकएंड के ढाई घंटे बचाने हैं तो इस सीरीज को स्किप कर देने से भी ज्यादा कुछ जाएगा नहीं।
वेद, मीरा और अमोल साठे की इस कहानी में फिल्म ‘खोज’ देखकर वेब सीरीज ‘खोज-परछाइयों के उस पार’ के पटकथा और संवाद लेखक अजय दीप सिंह ने यहां वहां अपने स्तर से कुछ फेरबदल करने की कोशिश की है लेकिन, उपन्यास लेखक बनने की कोशिश में लगे कोतवाल की पुलिसिया कार्यप्रणाली देखकर खीझ पैदा होती है। वेद के किरदार में शारिब और मीरा के किरदार में अनुप्रिया ऐसा कुछ खास करते नहीं है जो दर्शकों को बांध सके। सब कुछ ठीक वैसे ही होता चलता है जैसा कि हिंदी सिनेमा के दर्शक इस सीरीज को देखते हुए सोचते चलते हैं। शारिब ने इससे कहीं जटिल किरदार अपने करियर में किए है लेकिन यहां उनको अपने निर्देशक और लेखक से कोई मदद नहीं मिलती। अनुप्रिया गोयनका के किरदार के इर्द गिर्द बुना रहस्य इतना हल्का है कि कोई भी इसके आर पार देख सकता है। सीरीज की सिनेमैटोग्राफी और म्यूजिक में भी कुछ ऐसा नहीं है जिसके लिए ये सीरीज देखने की संस्तुति की जा सके।