जमनापार-2 रिव्यू: उसूल और महत्वाकांक्षा के बीच फंसे लड़के की कहानी, विजय राज दमदार; दो एपिसोड के बाद बदले सुर
Jamnapaar Season 2 Web Series Review: वेब सीरीज 'जमनापार' का दूसरा सीजन रिलीज हो गया है। इसमें पूर्वी दिल्ली की स्थिति और लाइफस्टाइल को दिखाया गया है। पूर्वी दिल्ली की वर्किंग क्लास की जिंदगी को दिखाया गया है। कैसी है सीरीज? पढ़िए रिव्यू
विस्तार
वेब सीरीज 'जमनापार' साल 2024 में रिलीज हुई थी। इसमें सीए के छात्र शांतनु बंसल उर्फ शैंकी (ऋत्विक साहोरे) के जरिए दिल्ली के जमनापार इलाके की स्थिति और परिस्थिति दिखाई गई। एक ऐसा इलाका जो साउथ दिल्ली और अन्य शहर से अलग है, जहां विकास थोड़ा कम है। इस सीरीज का दूसरा सीजन रिलीज हो चुका है। पिछला सीजन जहां खत्म हुआ, वहां से नए सीजन की कहानी शुरू हुई है। शो में लक्ष्मी नगर में जन्मे, पले-पढ़े शैंकी के संघर्ष को दिखाया गया है। वह दो रास्तों के बीच फंसा है। एक रास्ता नैतिक मूल्यों वाला है, जिस पर चलने की शिक्षा शैंकी को अपने पिता से मिली है, दूसरा रास्ता उसकी महत्वाकांक्षाएं पूरी करता है, लेकिन उसूलों से समझौते की शर्त पर। सीरीज में पूर्वी दिल्ली के जमनापार इलाके की जद्दोजहद को दिखाया गया है। साथ ही वहां की रोचक दुनिया की तस्वीर भी दिखाई गई है।
क्या है कहानी?
शैंकी बंसल का सीए का लाइसेंस एक स्कैंडल में सस्पेंड हो चुका है। वह अपने पिता (वरुण बडोला) की कोचिंग में पढ़ाता है। पिछले सीजन में जहां, शैंकी के अपने पिता के साथ रिश्ते तनावपूर्ण थे। वहीं, इस सीजन के शुरुआती एपिसोड में दोनों एक-दूसरे को समझ रहे हैं और सहारा बन रहे हैं। करीबी इतनी बढ़ती है कि एक शाम दोनों साथ में ड्रिंक करते दिखे हैं। शैंकी के सीए का लाइसेंस बहाल हो जाता है। वह इंटरव्यू देता है, मगर लाइसेंस सस्पेंशन का 'धब्बा' उसे नीचा दिखाता है। आखिर में वह तय करता है कि अपने पिता के कोचिंग सेंटर में ही सहयोग करेगा। मगर, लौटता है तो कोचिंग सेंटर में आग लग चुकी होती है। यहां से शुरू होता है शैंकी और उसके पिता का संघर्ष। खाक हो चुके कोचिंग इंस्टीट्यूट के रेनोवेशन का काम कराना है, लेकिन पैसे की किल्लत है। दोनों अपने-अपने स्तर पर पैसे की व्यवस्था करने जुट जाते हैं। मदद अपनों से भी मांगी जाती है। इसी मुश्किल वक्त में बाप-बेटे के सुधर चुके रिश्तों में एक बार फिर तल्खी आती है। शैंकी के सामने एक तरफ पैसे की जरूरत है और दूसरी तरफ नैतिक सिद्धांत हैं। इसी जद्दोजहद में मुलाकात होती है शौकीन भैया (विजय राज) से, जिनकी एंट्री सीरीज में भी ट्विस्ट लाती है और शैंकी की जिंदगी में भी। आखिर क्या होता है आगे? पैसे की पावर जीतती है या नैतिक मूल्य? यह सीरीज में देख सकते हैं।
अभिनय
शैंकी की भूमिका में ऋत्विक साहोरे ने जमनापार के युवा की भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है। संघर्ष, महत्वाकांक्षाएं, इमोशंस और फैमिली वैल्यू हर भाव उनके चेहरे पर दिखा है। वरुण बडोला इस सीजन में भी पिता की भूमिका में जमे हैं। एक पिता की जिम्मेदारियों और चिंता को भी उन्होंने अपने किरदार से उकेरा है और एक संवेदनशील कोचिंग मास्टर की जिम्मेदारियों को भी। इस बार सीरीज में चार चांद लगाए हैं विजय राज ने। हालांकि, शौकीन भैया के किरदार से उन्होंने 'जमनापार 2' में नए रंग भरे हैं। इनके अलावा अनुभा फतेहपुरिया, सृष्टि गांगुली रिंदानी, द्रुव सहगल, अनुष्का कौशिक और अंकिता सहगल भी अपनी-अपनी भूमिकाओं में जमे हैं।
निर्देशन
सीरीज का दूसरा सीजन, निर्देशन की कसौटी पर दूसरे के मुकाबले थोड़ा कमजोर है। सीरीज में कुल 10 एपिसोड हैं। शुरुआती दो एपिसोड शानदार तरीके से चलते हैं। साफ-सुथरे हैं। जमनापार के आम परिवारों की झलक दिखाने की कोशिश की गई है। पारिवारिक माहौल है। मगर, तीसरे एपिसोड से इसकी कहानी एक अलग एंगल पर मुड़ जाती है। पारिवारिक माहौल वाली सीरीज में अचानक गाली-गलौज आ जाती हैं। शौकीन भैया की एंट्री के बाद यह सीरीज अलग सुर और राह पकड़ लेती है। आगे ऐसे ट्विस्ट आते हैं कि ईयरफोन की जरूरत पड़ने लगती है। हालांकि, कुछ चीजें शानदार दिखाई हैं। साउथ दिल्ली और जमनापार के कोचिंग इंस्टीट्यूट के बीच की प्रतिस्पर्धा दिखाई गई है। दिल्ली में कूड़े के पहाड़ की तस्वीर चुटीले अंदाज में उकेरी गई है। हालांकि, कुछ सीन ऐसे हैं, जहां जमनापार वालों के लाइफस्टाइल पर मानों तंज कसा गया हो। सिनैमोटोग्राफी की बात करें तो अच्छी है। दिल्ली मेट्रो से यमुना की दुर्दशा का दृश्य दिखाया गया है।
देखें या नहीं देखें
यह सीरीज अमेजन एमएक्स प्लेयर पर मुफ्त में उपलब्ध है। कनॉट प्लेस, साउथ दिल्ली और अन्य इलाकों से अलग भी दिल्ली की एक तस्वीर देखना चाहते हैं तो इस सीरीज को देख सकते हैं। इसे परिवार के साथ न देखें। हां! दोस्तों के साथ देख सकते हैं, इसे आप ज्यादा एंजॉय कर पाएंगे।