Ground Zero Movie Review: ‘ग्राउंड जीरो’ के सामने इमरान की इमेज बड़ी चुनौती, देशभक्ति का एक और चैप्टर पूरा
कहानी ये कोई 25 साल पहले की है। याद है ना उन दिनों पाकिस्तानी आतंकवादियों ने क्या क्या नहीं कर रखा था भारत में? संसद पर हुए हमले से लेकर तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक पर आत्मघाती हमले की तैयारी थी, और इन सारे आतंकी मंसूबों के तार जुड़े थे एक ही आतंकवादी से, जिसका नाम था राणा ताहिर नदीम उर्फ गाजी बाबा। गाजी बाबा को मार गिराया था सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवानों ने और इस टुकड़ी के लीडर थे कमांडेंट नरेंद्रनाथ धर दुबे। दुबे ने अपने शरीर पर गोलियां खाईं। लंबे समय तक कोमा में रहे। लेकिन, दुश्मन को नेस्तनाबूद करके ही दम लिया। दुबे की इस रोमांचक कहानी को परदे पर पेश किया है अभिनेता इमरान हाशमी ने।
काम नहीं आया इमरान का बड़ा जोखिम
इमरान हाशमी फिल्म ‘ग्राउंड जीरो’ की सबसे कमजोर कड़ी हैं। बीएसएफ अफसर के लिए जरूरी कद काठी होते हुए भी इमरान हाशमी एक बीएसएफ कमांडेंट के किरदार की तरफ जनता की सहानुभूतियों जोड़ने में नाकाम रहे हैं। ये तारीफ करने लायक बात है कि इमरान हाशमी ने अपने करियर के इस मोड़ पर ऐसा किरदार करने का जोखिम लिया। वह पहले फिल्म ‘सेल्फी’ और फिर फिल्म ‘टाइगर 3’ में अपनी इमेज तोड़ने की कोशिश बार बार कर रहे हैं। मेहनत भी ऐसे हर किरदार में उनकी तरफ से सौ फीसदी की जा रही है, लेकिन दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाने वाला करिश्मा उनकी शख्सियत में अब नदारद सा है। मुंबई के जिस सिनेमाघर में शुक्रवार दोपहर बाद ये फिल्म देखी गई, उसमें दर्शकों की जो संख्या रही, वह इमरान हाशमी की फिल्म के लिए टिकट खिड़की का शुभ संकेत तो नहीं ही हो सकता।
भावनात्मक रूप से कमजोर पटकथा
करीब 25 करोड़ रुपये के बजट में बनी फिल्म ‘ग्राउंड जीरो’ की दूसरी कमजोर कड़ी है इसका पूरा ग्राफ। फिल्म की पटकथा इतनी एकरस है कि बचपन में 15 अगस्त और 26 जनवरी को स्कूल में होने वाले अध्यापकों आदि के भाषण याद आने लगे। बच्चे अपनी मस्ती में हैं। टीचर अपनी खानापूरी करने में लगे हैं। बस हो गया राष्ट्रीय पर्व। राष्ट्रीयता की बात करने वाली इस दौर की फिल्में भी कुछ ऐसी ही बन रही हैं। ‘डिप्लोमैट’, ‘स्काईफोर्स’ और अब ‘ग्राउंड जीरो’। मुंबई में सक्रिय खास शोध समूह अलग अलग अलग समय में अलग अलग फिल्म निर्माताओं को चिन्हित करता है। उन्हें एक कहानी सौंपता है। निर्माता फिल्म भी बना देता है लेकिन न कहानी में कोई ऐसी बात हो पाती है जो दर्शकों को भावनात्मक रूप से उद्वेलित कर सके और न ही इसमें काम करने वाले कलाकारों को इन फिल्मों के बॉक्स ऑफिस नतीजो से कोई फर्क भी पड़ता है। अब ऐसी सारी फिल्में अक्षय कुमार तो कर नहीं सकते तो इमरान हाशमी भी कतार में आ लगे हैं।
Explainer: जहां शिकारे में थिरके शम्मी कपूर, वहां से क्यों दूर हुआ सिनेमा? पढ़ें कश्मीर से फिल्मों का नाता
एक ही निर्देशक की एक ही दिन दो फिल्में
फिल्म ‘ग्राउंड जीरो’ से मराठी फिल्मों के निर्देशक तेजस प्रभा विजय देओस्कर की हिंदी सिनेमा में बोहनी हो रही है। उनकी एक मराठी फिल्म ‘देवमानुस’ भी इसी शुक्रवार को रिलीज हुई है। एक ही दिन किसी कलाकार की दो फिल्में एक साथ रिलीज होने के मामले तो बहुतेरे हैं, किसी निर्देशक की एक ही दिन दो फिल्में रिलीज होने का ये मामला बिरला हो सकता है। तेजस को यहां अपने लेखकों संचित गुप्ता और प्रियदर्शी श्रीवास्तव से संवाद और बढ़ाना चाहिए था। पूरी फिल्म परदे पर यूं ही चलती जाती है। कहीं दर्शकों से जुड़ाव की न तो ये फिल्म कोशिश करती है और न ही इस फिल्म को बनाने के पीछे के मकसद से दर्शकों को जोड़ पाती है। ऐसा लगता है कि जैसे देशभक्ति का बस एक और सिलेबस है जिसे किसी तरह पूरा कर लेना है। कहानी कमांडेंट नरेंद्रनाथ धर दुबे की बाकमाल है। फिल्म ‘उरी द सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसी टीम होती तो यही फिल्म इस वीकएंड पर धमाल मचा रही होती। फिल्म का इमोशनल कनेक्ट न बन पाना इसकी तीसरी कमजोर कड़ी है।
Emraan Hashmi: 'ग्राउंड जीरो' में किरदार निभाने के लिए इन मुश्किलों से जूझे इमरान, अभिनेता ने किए कई खुलासे
क्लाइमेक्स तक आते आते हो गई देर
कमांडेंट नरेंद्रनाथ धर दुबे ने अगर ये फिल्म देखी होगी, तो उन्हें जरूर अपनी जवानी पर फिर से गुरूर हुआ होगा, बस वही एहसास ये फिल्म अगर एक आम नौजवान में भरने मे कामयाब हो जाती तो फिल्म जरूर अच्छा कारोबार भी करती। फिल्म की चौथी कमजोर कड़ी इसकी कास्टिंग है। हिंदी सिनेमा में इमरान हाशमी ने शुरू के 10 साल जिस तरह एक खास तरह के गानों और किरदारों के सहारे शोहरत और दौलत बटोरी है, वह फिल्म ‘ग्राउंड जीरो’ में उनके लिए बड़ी बाधा है। एक जाबांज अफसर के रूप में इमरान को देखने के बाद उन्हें इस किरदार में स्वीकार करने में दर्शकों को वक्त लगता है। इमरान के किरदार को परदे पर स्थापित करने के लिए फिल्म में जिस तरह के दुर्दांत विलेन की जरूरत थी, उसका डर क्लाइमेक्स को छोड़ पूरी फिल्म में बिल्डअप ही नहीं होता। गाजी बाबा के किरदार में रॉकी रैना वांछित असर लाने में भी नाकाम ही रहे। जोया हसन, साई तम्हणकर भी बस खानापूरी ही करते दिखे। हां, मुकेश तिवारी ने अपने किरदार का ताप बढ़ाने की कोशिश की है और दीपक परमेश, ललित प्रभाकर, गुनीत सिंह जैसे सहायक कलाकारों ने उनका साथ भी अच्छा दिया पर इनके किरदार ही इतने छोटे रहे कि इनका अच्छा अभिनय बेअसर रहा।
एक भी दमदार देशभक्ति गाना नहीं
बतौर निर्देशक तेजस प्रभा विजय देओस्कर ने सिर्फ अपने काम पर पूरा ध्यान रखा है, और उसमें वह पास भी हो गए, लेकिन एक निर्देशक का काम पूरी फिल्म को संभालना भी होता है। फिल्म अपनी पटकथा और संवादों में कमजोर है। चार चार गीतकारों के बावजूद फिल्म का एक भी गाना फिल्म की रिलीज से पहले हिट न हो पाना फिल्म की पांचवीं कमजोर कड़ी है। तारीफ करने लायक फिल्म में जो है वह है कमलजीत नेगी की शानदार सिनेमैटोग्राफी और विजय दहिया की एक्शन कोरियोग्राफी। चंद्रशेखर प्रजापति ने संपादन थोड़ा ढीला जरूर छोड़ दिया है लेकिन यहां भी असल जिम्मेदारी निर्देशक की ही तो है।