Girls Will Be Girls Review: शुचि तलाती की फिल्म का मकसद सिनेमा या सनसनी? सीधे ओटीटी पर जाने पर जरूरी विमर्श
‘प्यार की राह में चलना सीख...’, ये उस गजल की पहली लाइन है जिसके बजते समय एक मर्द परदे पर दिखती बला की खूबसूरत महिला का ध्यान किसी न किसी तरह से अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश करता नजर आता है, तरीके तमाम आजमाए जाते हैं। लेकिन हर बार दूसरी लाइन बजते ही परदे पर लिखा आता है, ‘मेन विल बी मेन’। ‘गर्ल्स विल बी गर्ल्स’ का डीएनए इसी विज्ञापन का है। यहां दो लड़कियां एक ही मर्द का ध्यान अपनी तरफ खींचने का उपक्रम करती नजर आती है। एक लड़की अभी अभी 18 की हुई है लेकिन हरकतें उसकी ‘अम्मा’ जैसी हैं और एक उसकी ‘अम्मा’ है जिसे अपनी बेटी के कंपटीशन में बने रहने की मनोवैज्ञानिक बीमारी सी जान पड़ती है। निर्देशक शुचि तलाती की ये फिल्म विदेशी फिल्म फेस्टिवल्स में तमाम पुरस्कार जीतने के बाद भारतीय दर्शकों को ‘सुलभ’ हुई है। सेंसर सर्टिफिकेट इसका फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज के लिए निकलवाया गया है और शायद वहां तक फिल्म तमाम कोशिशों के बाद भी पहुंची नहीं तो इसे सीधे ओटीटी पर पहुंचा दिया गया है।
याद आएगी ‘मेरा नाम जोकर’ भी
फिल्म ‘गर्ल्स विल बी गर्ल्स’ को देखने के दो तरीके हैं। पहला तरीका इसका अभी अभी अपनी सौवीं जयंती के चलते फिर से चर्चा में आए बीती सदी के शो मैन राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ की पहली कहानी जैसा है। ऋषि कपूर ने इस फिल्म में उस स्कूली बच्चे का किरदार निभाया था, जिसे किशोरावस्था में अपनी अध्यापिका के प्रति दैहिक आकर्षण होता है और वह उसे पिकनिक के समय झरने पर लगभग निर्वस्त्र अवस्था में देखता है। फिल्म ‘गर्ल्स विल भी गर्ल्स’ का केंद्रीय पुरुष पात्र श्रीनिवास जब पहली बार अपनी नई नई गर्लफ्रेंड मीरा के साथ एकांत पाता है तो अपने उस अनुभव के बारे में बताता है जहां उसने अपनी मां को निर्वस्त्र अवस्था में देख लिया था। मीरा स्कूल की हेड प्रिफेक्ट है और उस पर विद्यार्थियों को अनुशासित रखने की महती जिम्मेदारी है लेकिन, उसके दिल में और घर दोनों में कुछ और ही गुल खिल रहा है।
बेटी के प्रेमी पर फिदा मां
फिल्म की एक दूसरी कहानी भी है जो मीरा की मां अनिला के नजरिये से फिल्म को आगे बढ़ाती है। अनिला अपने पति से दूर है। बेटी को किसी से फोन पर बात करते पाती है तो ये जानकारी हासिल कर ही लेती है कि उसके जीवन में कोई लड़का आ चुका है। उसके चेहरे का रंग बदलता है। बेटी को वह वैसे कपड़े पहनाना शुरू करती है जिसमें वह मादक दिख सके। उसके ‘बॉयफ्रेंड’ को बार बार घर बुलाती है। उसके कमरे में होते हुए भी नहाने के बाद बाथरूम से कमरे में आती है, अपने कपड़े उठाने, और तब, जब उसकी बेटी ये सब देख रही है। स्लीपओवर में मां-बेटी के बीच बहस होती है और अनिला साधिकार अपनी बेटी के बॉयफ्रेंड को अपने बिस्तर पर सुलाने लेकर चली जाती है। फिल्म का पूरा आधार वैसा ही है जैसा इसके एक दृश्य में श्रीनिवास के साथ होता है। मीरा उसे अपने स्पर्श से उत्तेजित तो करती है लेकिन बीच में ही छोड़कर चल देती है। फिल्म देखते समय इस बात की आशंका लगातार बनी रहती है कि मां और बेटी के बॉयफ्रेंड के बीच किसी भी पल कुछ भी घट सकता है।
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12 साल बाद फिर वही मनोवृत्ति
निर्देशक शुचि तलाती ने कोई 12 साल पहले एक शॉर्ट फिल्म बनाई थी, ‘मे एंड ऐश’। वहां भी कहानी एक युवक की गर्लफ्रेंड की मौजूदगी में उसकी एक्स गर्लफ्रेंड के उसी छत के नीचे रहने आ जाने की है। एक दशक से ज्यादा समय के बाद भी शुचि कथन के स्तर पर अगर अपनी पहली फिल्म के कथानक पर ही अटकी हैं तो ये उनकी ऋणात्मक निर्देशकीय तरक्की है। फिल्म ‘गर्ल्स विल भी गर्ल्स’ की कहानी उन्होंने मानसिक स्तर पर दर्शकों को उद्वेलित और उत्तेजित बनाए रखने के हिसाब से लिखी है और एक ही फिल्म में चल रही दो कहानियों को उन्होंने परदे पर फिल्माने के लिए तीन काबिल कलाकारों का साथ भी पाया। फिल्म के शुरू होते ही ये भी खासतौर से बताया जाता है कि फिल्म के सारे दैहिक संभोग दृश्य वयस्क कलाकारों के ऊपर ही फिल्माए गए हैं और इसमें किसी अवयस्क कलाकार का उपयोग नहीं किया गया है। शुचि की तारीफ यहां इस बात के लिए की जा सकती है कि फिल्म एक दिशा से किशोरावस्था के बालक बालिकाओं की मनोवृत्तियों के भीतर झांकती आगे बढ़ती है, दूसरी दिशा से ये फिल्म एक प्रौढ़ महिला के एक नवयुवक को अपनी तरफ आकर्षित करने के प्रयासों को सहलाते हुए आगे बढ़ती है। दोनों कहानियां का जहां क्रॉस ओवर होता है, वह बिंदु फिल्म के क्लाइमेक्स पर आता है जब दोनों स्त्रियों का ‘असलियत’ का अंदाजा होता है।
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विदेशी दर्शकों को लक्षित कर बनी फिल्म
फिल्म ‘गर्ल्स विल बी गर्ल्स’ हिंदी फिल्म दर्शकों के मनोस्तर पर खरी नहीं उतरती। इसकी प्रशंसा विदेश में खूब हो चुकी हो लेकिन फिल्म ‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’ की तरह इसका सामाजिक ताना बाना स्पष्ट नहीं है। सिनेमा को कालजयी होने के लिए अपने समाज को प्रभावित करना जरूरी है और शुचि तलाती के तीनों मुख्य किरदार इसी में फेल हो जाते हैं। प्रीति पाणिग्रही, कनी कुश्रुति और केशव बिनॉय किरन तीनों किसी सेमी पॉर्न फिल्म के थ्रीसम की तरफ बढ़ते दिखने वाले एहसासों के साथ परदे पर बार बार आते हैं। प्रीति का अभिनय शुरू के दृश्यों में काफी अच्छा है। अंतरंग दृश्यों में भी जिस तरह उनकी आखें आसपास के माहौल पर नजर रखती है, वहां उनका अभिनय प्रभावी है लेकिन फिल्म के उत्तरार्ध में उनका अभिनय एकरस हो गया है। कनु कुश्रुति का अभिनय भी यहां खास नहीं है सिवाय उस एक दृश्य के जिसमें वह डांस करती नजर आती हैं। फिल्म का एक विभाग खासतौर से तारीफ के काबिल है और वह है साउंड डिजाइन। फिल्म की तकनीकी टीम में अधिकतर महिलाएं ही हैं और शायद ऐसा किसी फिल्म फंड से अनुदान पाने के लिए किया गया हो, क्योंकि बाकी कहीं कोई फर्क इस फिल्म में महिला प्रधान फिल्म होने के चलते दिखता नहीं है।