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Game Changer Review: ‘आरआरआर’ वाला जादू दोहराने से चूके राम चरण, भ्रष्टाचार की एक और कहानी लाए निर्देशक शंकर
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गेम चेंजर (हिंदी)
- फोटो : अ
Movie Review
गेम चेंजर (हिंदी)
कलाकार
राम चरण
,
कियारा आडवाणी
,
एस जे सूर्या
,
अंजलि
,
श्रीकांत
,
सुनील
और
ब्रह्मानंदन आदि
लेखक
कार्तिक सुब्बाराज
,
विवेक वेलमुरुगन
,
साई माधव बुर्रा
और
शंकर
निर्देशक
शंकर
निर्माता
राजू
और
शिरीष
रिलीज:
10 जनवरी 2024
रेटिंग
2/5
निर्देशक षणमुगम शंकर यानी एस शंकर की इस बात के लिए तारीफ तो जरूर होनी चाहिए कि उनके तकनीकी ज्ञान से भारतीय सिनेमा ने तमाम सारी नई बातें सीखी हैं। ऑस्ट्रेलिया में अपनी फिल्म ‘इंडियन’ (1996) लेकर गए शंकर ने इसी फिल्म में लोगों को ये भी बताया था कि आखिर टेलीफोन धुन में कोई लड़की कैसे हंस सकती है? इमोजी तो क्या तब तक तो मोबाइल फोन ही नहीं आए थे। शंकर की फिल्मों में सियासी और सरकारी भ्रष्टाचार अहम मुद्दा रहा है। फिल्म ‘इंडियन’ की जो थीम साल 1996 में थी, उसी थीम पर उनकी साल 2025 में आई फिल्म ‘गेम चेंजर’भी आधारित है। बस वह तमिल थी, ये तेलुगु में हैं। शंकर के करियर की पहली तेलुगु फिल्म। ये फिल्म दर्शकों से सवाल करती है। सरकार को कंपलसरी वोटिंग का विचार देती है और देश को बताती है क्या होता है, गेम चेंजर?
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गेम चेंजर (हिंदी)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आईएएस की महत्ता समझाने की कोशिश
फिल्म ‘गेम चेंजर’ की कहानी बहुत खास नहीं है। ये बस इतना बताती है कि एक सरकारी अधिकारी चाहे तो पूरे सिस्टम को बदल सकता है। खासतौर से एक आईएएस अधिकारी। कम लोगों को ही पता होगा कि किसी भी जिले में सेना बुलाने का अधिकार सिर्फ वहां के जिलाधिकारी को होता है और वह चाहे तो राज्य सरकार के किसी भी मौखिक आदेश को मानने से इनकार कर सकता है। राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के तौर पर काम करने वाले जिलाधिकारी की निष्ठा संविधान में होती है और यही शपथ हर आईएएस लेता है। कहानी यहां उत्तर प्रदेश के गुटखा माफिया को तबाह करने वाले आईपीएस राम के आईएएस बनकर नई पोस्टिंग पर आंध्र प्रदेश जाने की यात्रा से शुरू होती है। खुद पर जानलेवा हमला करने वाले जिन गुंडों की वह फिल्म के पहले सीन में जान बचाता है, उन्हीं गुंडों की जरूरत उसे बतौर मुख्य निर्वाचन अधिकारी फिल्म के क्लाइमेक्स में पड़ जाती है।
फिल्म ‘गेम चेंजर’ की कहानी बहुत खास नहीं है। ये बस इतना बताती है कि एक सरकारी अधिकारी चाहे तो पूरे सिस्टम को बदल सकता है। खासतौर से एक आईएएस अधिकारी। कम लोगों को ही पता होगा कि किसी भी जिले में सेना बुलाने का अधिकार सिर्फ वहां के जिलाधिकारी को होता है और वह चाहे तो राज्य सरकार के किसी भी मौखिक आदेश को मानने से इनकार कर सकता है। राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के तौर पर काम करने वाले जिलाधिकारी की निष्ठा संविधान में होती है और यही शपथ हर आईएएस लेता है। कहानी यहां उत्तर प्रदेश के गुटखा माफिया को तबाह करने वाले आईपीएस राम के आईएएस बनकर नई पोस्टिंग पर आंध्र प्रदेश जाने की यात्रा से शुरू होती है। खुद पर जानलेवा हमला करने वाले जिन गुंडों की वह फिल्म के पहले सीन में जान बचाता है, उन्हीं गुंडों की जरूरत उसे बतौर मुख्य निर्वाचन अधिकारी फिल्म के क्लाइमेक्स में पड़ जाती है।
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गेम चेंजर (हिंदी)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
भ्रष्टाचार विरोध से जन्मी सियासी पार्टी
फिल्म ‘पुष्पा 2’ भी एक औसत फिल्म है लेकिन उसे फिल्म के हीरो अल्लू अर्जुन के महिला वेशभूषा में किए गए एक्शन सीन ने बीते साल की ही नहीं बल्कि देश में अब तक बनी फिल्मों में सबसे कामयाब फिल्म बना दिया। संकेत साफ है कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक लोग सिनेमा देखने सिनेमाहॉल में आना चाहते हैं। बशर्ते फिल्म ऐसी हो जो गेम चेंज कर सके। फिल्म ‘गेमचेंजर’ शुरू होती है तो लगता भी है कि ये फिल्म ‘पुष्पा 2’ का हैंगओवर उतारने में सफल रहेगी। शंकर की चिर परिचित डबल रोल वाली कहानी का तड़का यहां भी है। शाहरुख खान के फिल्म ‘डर’ वाले किरदार की तरह हकलाने वाला नेता खदान कंपनियों के खिलाफ मोर्चा जमाता है। नेतागिरी चमक जाती है तो पार्टी बनाता है। फिर अपने हकलाने की वजह से सार्वजनिक मंच पर भाषण देने के लिए पार्टी के एक आम कार्यकर्ता को आगे बढ़ाता है। उद्योगपतियों से चंदा न लेने की कसम खाता है। पार्टी के पोस्टर, बैनर और कटआउट के खिलाफ नजर आता है। लेकिन, पार्टी के सत्ता तक पहुंचने के रास्ते में वह सब होता है जो देश के लोग दिल्ली में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली पार्टी के जरिये देख चुके हैं।
फिल्म ‘पुष्पा 2’ भी एक औसत फिल्म है लेकिन उसे फिल्म के हीरो अल्लू अर्जुन के महिला वेशभूषा में किए गए एक्शन सीन ने बीते साल की ही नहीं बल्कि देश में अब तक बनी फिल्मों में सबसे कामयाब फिल्म बना दिया। संकेत साफ है कि उत्तर से लेकर दक्षिण तक लोग सिनेमा देखने सिनेमाहॉल में आना चाहते हैं। बशर्ते फिल्म ऐसी हो जो गेम चेंज कर सके। फिल्म ‘गेमचेंजर’ शुरू होती है तो लगता भी है कि ये फिल्म ‘पुष्पा 2’ का हैंगओवर उतारने में सफल रहेगी। शंकर की चिर परिचित डबल रोल वाली कहानी का तड़का यहां भी है। शाहरुख खान के फिल्म ‘डर’ वाले किरदार की तरह हकलाने वाला नेता खदान कंपनियों के खिलाफ मोर्चा जमाता है। नेतागिरी चमक जाती है तो पार्टी बनाता है। फिर अपने हकलाने की वजह से सार्वजनिक मंच पर भाषण देने के लिए पार्टी के एक आम कार्यकर्ता को आगे बढ़ाता है। उद्योगपतियों से चंदा न लेने की कसम खाता है। पार्टी के पोस्टर, बैनर और कटआउट के खिलाफ नजर आता है। लेकिन, पार्टी के सत्ता तक पहुंचने के रास्ते में वह सब होता है जो देश के लोग दिल्ली में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली पार्टी के जरिये देख चुके हैं।
गेम चेंजर (हिंदी)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कहानी अच्छी, क्लाइमेक्स कमजोर
‘गेमचेंजर’ कौन होता है, वही जो खेल के नियम बदल दे। खेल के नतीजे बदल दे और खेल को उस मोड़ पर ले आए जहां सब बराबर नजर आएं। फिल्म ‘गेम चेंजर’ का हीरो राम यही करता है। गुस्सा उसकी नाक पर रहता है। इस पर नियंत्रण के वह जतन भी करता है। चिकित्सक दीपिका उसे पहली नजर में भाती है। उसी के लिए वह आईएएस बनता है। कहानी रूटीन होते ही भी फिल्म में अच्छे तरीके से गढ़ी गई है। लगने लगता है कि शंकर ने फिल्म का निर्देशन अपनी पिछली फिल्म ‘इंडियन’ से बेहतर किया है। तेलुगु सिनेमा में ‘ग्लोबल स्टार’ (?) कहलाने वाले राम चरण फिल्म में डबल रोल कर रहे हैं। कियारा आडवाणी जैसी हिंदी फिल्म निर्माताओं की ‘दुलारी’ फिल्म की हीरोइन है। लेकिन, शंकर का निर्देशन फिल्म के आखिर 45 मिनट में ऐसा लड़खड़ाता है कि सारे किए धरे पर ‘चुनाव आयोग’ फिर जाता है।
‘गेमचेंजर’ कौन होता है, वही जो खेल के नियम बदल दे। खेल के नतीजे बदल दे और खेल को उस मोड़ पर ले आए जहां सब बराबर नजर आएं। फिल्म ‘गेम चेंजर’ का हीरो राम यही करता है। गुस्सा उसकी नाक पर रहता है। इस पर नियंत्रण के वह जतन भी करता है। चिकित्सक दीपिका उसे पहली नजर में भाती है। उसी के लिए वह आईएएस बनता है। कहानी रूटीन होते ही भी फिल्म में अच्छे तरीके से गढ़ी गई है। लगने लगता है कि शंकर ने फिल्म का निर्देशन अपनी पिछली फिल्म ‘इंडियन’ से बेहतर किया है। तेलुगु सिनेमा में ‘ग्लोबल स्टार’ (?) कहलाने वाले राम चरण फिल्म में डबल रोल कर रहे हैं। कियारा आडवाणी जैसी हिंदी फिल्म निर्माताओं की ‘दुलारी’ फिल्म की हीरोइन है। लेकिन, शंकर का निर्देशन फिल्म के आखिर 45 मिनट में ऐसा लड़खड़ाता है कि सारे किए धरे पर ‘चुनाव आयोग’ फिर जाता है।
गेम चेंजर (हिंदी)
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सबसे दर्शनीय कुछ है तो गाना ‘जरगंडी’
कहानी के कन्फ्यूजन की मारी फिल्म ‘गेम चेंजर’ की गिनती उन फिल्मों में होने वाली है जो एक कमजोर कहानी के चक्कर में मात खा गईं। फिल्म की दूसरी हीरोइन अंजलि ने यहां मन्नत पूरी होने के लिए अंगारों पर चलने वाला एक सीन भी फिल्म ‘पुष्पा 2’ में अल्लू अर्जुन वाले सीन की तरह किया है लेकिन दोनों के असर में जमीन आसमान का अंतर है। और, यही अंतर ‘गेम चेंजर’ का गेम कर देता है। राम चरण के पास अभिनय की सीमित प्रतिभा है। उनके भाव अधिकतर दृश्यों में एक जैसे रहते हैं। जहां ज्यादा भाव दिखाने की जरूरत होती है, वहां वह चश्मा पहनकर भाव खाने लगते हैं। कियारा जरूर फिल्म में बेहद खूबसूरत लगी हैं, लेकिन उनके पास करने को कुछ खास है ही नहीं। फिल्म में सबसे अच्छा कुछ अगर है तो वह है गाना ‘जरगंडी’। शंकर का तकनीकी कौशल इस गाने के फिल्मांकन में दिखता है। बाकी फिल्म एक औसत फिल्म है। टाइमपास करने के लिए देखी जा सकती है। सियासी माहौल इसमें अच्छा बनाया गया है। अनिवार्य वोटिंग का मुद्दा भी बहुत सही उठाया गया। वोट न डालने वालों को अगर सरकारी सुविधाएं बंद कर दी जाएं तो न सिर्फ वोट प्रतिशत बढ़ सकता है बल्कि देश की सियासत का चेहरा भी बदल सकता है। लेकिन, आंध्र प्रदेश के एक आईएएस अफसर को यूपी के गुंडों की मदद से चुनाव नियंत्रित करने वाला दिखाकर फिल्म ने गेम चेंज होने से पहले अपना ही गेम बजा डाला है।
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