Ek Thi Begum Review: दाऊद को मारने निकली सपना दीदी की दमदार कहानी, देखिए कौन-कौन बने मुजरिम
डिजिटल रिव्यू: एक थी बेगम (वेब सीरीज)
कलाकार: अनुजा साठे, अंकित मोहन, राजेंद्र शिसाटकर, अजय गेही, चिन्मय मांडलेकर, रेशम, अभिजीत चव्हाण आदि
निर्देशक: सचिन दारेकर
ओटीटी: एमएक्स प्लेयर
रेटिंग: दो स्टार
विस्तार
अब भी फिल्में और वेब सीरीज देखने वाले तमाम लोगों को लगता है कि डाटा बेस इकट्ठा करने वाली वेबसाइट आईएमडीबी की रेटिंग मायने रखती है। हकीकत ये है कि अगर आपके संपर्क में सिर्फ हजार लोग ऐसे हैं जिनके अमेजन प्राइम पर घर का सामान खरीदने का एकाउंट है तो आप अच्छी से अच्छी फिल्मों की रेटिंग की बैंड इस वेबसाइट पर बजा सकते हैं। जैसा कि पिछले दिनों दीपिका पादुकोण ने अपनी फिल्म छपाक को लेकर खुलेआम कहा भी। दीपिका का जिक्र यहां इसलिए क्योंकि लाइमलाइट से गायब हो चुके निर्देशक विशाल भारद्वाज ने कभी दीपिका को लेकर ही सपना दीदी नाम की एक फिल्म बनाने की बात कही थी। वो सपना दीदी जिसने दुबई जाकर दाऊद को मारने का सपना देखा।
एक थी बेगम उसी सपना की कहानी है। एक अच्छी कहानी मिलना और उस पर एक अच्छी वेबसीरीज या फिल्म बनाना दो अलग अलग बातें हैं। पहली बात तो ये कि एक थी बेगम हिंदी में बनी नहीं है, हिंदी में डब की गई है। ये सीरीज मूलत: मराठी में बनी और लॉकडाउन में पब्लिक को बुद्धू बनाने के लिए हिंदी में डब करके रिलीज कर दी गई लेकिन ये जो पब्लिक है वो सब जानती है। ऐसा नहीं कि सीरीज बिल्कुल ही देखने लायक नहीं है। पूरी कहानी को कम एपीसोड में कहने की कोशिश की जाती तो ये साल की बेहतरीन कहानी हो सकती थी। इस कहानी के बस छह या ज्यादा से ज्यादा सात एपीसोड की ही तासीर है। 14 एपीसोड तो दर्शकों पर ज्यादती है।
कहानी सिंपल सी है। दाऊद टाइप के दुबई में बैठे अपराधी मकसूद का एक चेला मुंबई में हीरोइन का कारोबार फैलाना चाहता है। जहीर नाम का दादा इसके खिलाफ है। मकसूद के लोकल चेले नाना से उसका पंगा होता है। पहले नाना का भाई मारा जाता है और फिर जहीर। जहीर की बीवी अशरफ इसका बदला लेने का फैसला करती है। उसको सही ठहराया जा सके इसलिए पहले उसे कानूनी लड़ाई लड़ते और फिर खुद कानून बन जाते दिखाया जाता है। कहानी शुरू यहीं से होती है, बाद में कहानी फ्लैशबैक में घूमती फिरती फिर वापस वहीं आती है।
इतनी दमदार कहानी पर एमएक्स प्लेयर चाहता तो एक सुपरहिट वेब सीरीज बना सकता था। लेकिन, बताते हैं कि एमएक्स प्लेयर में इतने ज्ञानी लोग हैं कि खुद जाकर डायरेक्टर को लोकेशन पर निर्देशन सिखाने लगते हैं। इनकी सीरीज बनाने वाले निर्देशक गरीब की गाय की तरह हां में हां मिलाते रहते हैं और नतीजा दर्शकों को भुगतना होता है। ओटीटी चूंकि फ्री में सीरीज दिखाने का दम भरता है लिहाजा कहीं भी कभी भी यूट्यूब की माफिक ब्रेक भी झेलना होता है। सीरीज की सबसे बड़ी कमजोरी इसका निर्देशन ही है। और निर्देशक की कमजोरी ये है कि उसे एपीसोड डिवीजन का ज्ञान नहीं है, कहानी को कैसे आगे बढ़ाना है इसका भान नहीं है और अपनी बात कलाकारों से मनवा सके इतना मान नहीं है।
तो कलाकार यहां कैमरा ऑन होते ही अपने हिसाब से एंगल लेते दिखते हैं। मकसूद बने अजय गेही को दाऊद जैसा दिखने का गुमान इतना है कि वह खुद को वंस अपॉन ए टाइम मुंबई का इमरान हाशमी समझने लगते हैं। नाना बने राजेंद्र ओवरएक्टिंग का शिकार हुए हैं और पुलिस इंस्पेक्टर तावड़े बने अभिजीत चव्हाण का मेलोड्रामा भी थोड़ा ज्यादा हो गया है। पूरी सीरीज में बस दो ही कलाकार जमते हैं एक तो जहीर के रोल में अंकित मोहन और दूसरी बेगम के रोल में अनुजा साठे। अनुजा साठे को यही सीरीज हिंदी सिनेमा के कलाकारों के साथ मिलने का मौका मिला होता तो बात कुछ और ही होती। उन्होंने अपनी तरफ से पूरा जोर लगाया लेकिन साथ में हैया कहने वाले कमजोर निकले। वेब सीरीज एक थी बेगम को अमर उजाला रिव्यू में मिलते हैं दो स्टार।