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Do Patti Review: गाली देती ‘सिमरन’ को देख चौंके नेटफ्लिक्स के दर्शक, ‘दो पत्ती’ की कहानी निकली सबसे कमजोर कड़ी

Sun, 27 Oct 2024 12:47 PM IST
Pankaj Shukla पंकज शुक्ल
Updated Sun, 27 Oct 2024 12:47 PM IST
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Do Patti Movie Review by Pankaj Shukla Kajol Kriti Sanon Kanika Singh Dhillon Shaheer Sheikh Tanvi Brijendra
Do Patti Review - फोटो : अमर उजाला
Movie Review
दो पत्ती
कलाकार
काजोल , कृति सेनन , तनवी आजमी , शाहीर शेख , बृजेंद्र काला , प्राची शाह पांड्या , चितरंजन त्रिपाठी और विवेक मुश्रान आदि
लेखक
कनिका सिंह ढिल्लों
निर्देशक
शशांक चतुर्वेदी
निर्माता
कृति सेनन, कनिका सिंह ढिल्लों
रिलीज:
25 अक्तूबर 2025
रेटिंग
2/5

फिल्म ‘गांधी’ में अपने अभिनय के लिए ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाले अभिनेता बेन किंग्सले (असली नाम – कृष्णा पंडित भानजी) ने अमिताभ बच्चन के साथ कोई 14 साल पहले एक फिल्म की, ‘तीन पत्ती’। लीना यादव इसकी निर्देशक थीं और इसी फिल्म से श्रद्धा कपूर ने बड़े परदे पर पहला कदम भी रखा। कहानी ताश के पत्तों से यूं जुड़ी कि बड़े बच्चन का गणित के प्रोफेसर का किरदार तीन पत्ती के खेल की प्रायिकता (probability) पर काम कर रहा है। ‘दो पत्ती’ जैसा कोई खेल तो नहीं होता लेकिन यहां दो पत्ती दरअसल ताश की गड्डी की उस दुक्की से मुखातिब है जिसके कार्ड पर दो पत्तियां होती हैं। हीरो यहां हुकुम का इक्का है, ये फिल्म की लेखक कनिका सिंह ढिल्लों फिल्म के शुरू में ही बता देती हैं।

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Do Patti Movie Review by Pankaj Shukla Kajol Kriti Sanon Kanika Singh Dhillon Shaheer Sheikh Tanvi Brijendra
Do Patti Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

डबल रोल की कमजोर कहानी
हिंदी फिल्मों में अगर आपको दिलचस्पी हो और आपको शायद ये पता भी हो कि दिलीप कुमार की फिल्म ‘राम और श्याम’ की साउथ रीमेक के हिंदी रीमेक अधिकार खरीदकर जब रमेश सिप्पी ने फिल्म ‘सीता और गीता’ बनाई तो ये फिल्म हेमा मालिनी के लिए हिंदी सिनेमा की नंबर वन हीरोइन बनने की सीढ़ी बनी थी। ऐसा ही कुछ पंकज पाराशर की फिल्म ‘चालबाज’ ने श्रीदेवी के लिए किया। दिलीप, हेमा और श्री, तीनों कलाकार इन फिल्मों में अपने अभिनय के लिए वाहवाही पाने वाले कलाकार रहे। फिल्म ‘दो पत्ती’ में भी सीता और गीता का जिक्र खूब है। कृति सेनन की ये ख्वाहिश भी खूब साफ साफ नजर आती है कि वह किसी तरह खुद को हिंदी सिनेमा की काबिल अदाकारा के रूप में परदे पर पेश करना चाहती हैं और वह भी ऐसी फिल्म में जिसकी पूरी कहानी का सूत्रधार उनका किरदार खुद हो। ‘मिमी’ के लिए उन्हें नेशनल फिल्म अवार्ड मिला और साल 2021 में सीधे ओटीटी पर रिलीज इस फिल्म के बाद से कृति का ऐसा ही कुछ कर दिखाने का संघर्ष जारी है।

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Do Patti Movie Review by Pankaj Shukla Kajol Kriti Sanon Kanika Singh Dhillon Shaheer Sheikh Tanvi Brijendra
Do Patti Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

दो पत्ती नहीं एक फूल दो माली
‘सीता और गीता’ व ‘चालबाज’ की तरह कृति सेनन ने भी फिल्म ‘दो पत्ती’ में दो किरदार निभाए हैं। एक चतुर, चालाक और चंट शैली का और दूसरा बेचारी, दुखियारी और बात बात पर रो देने वाली सौम्या का। दोनों जुड़वा बहनें हैं। पढ़ाई के लिए एक को बचपन में हॉस्टल भेजा गया। और, वह बिल्कुल हिंदी फिल्म की हीरोइन की तरह कहानी में री एंट्री ऐन उस दिन मारती है, जब दूसरी को नया नया बॉयफ्रेंड मिला है। दुनिया जहान में इसे भी यही लडका पसंद आता है। कहानी जो पूरी दुनिया में कहीं भी जा सकती थी, वह एक घर में आ सिमटती है और वह भी एक ऐसे मर्द के आसपास जिसके पास कारोबार तो हजारों करोड़ का है लेकिन इतनी रईसी न उसके पिता की बातचीत में झलकती है और न ही उसके खुद के किरदार में। 

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Do Patti Movie Review by Pankaj Shukla Kajol Kriti Sanon Kanika Singh Dhillon Shaheer Sheikh Tanvi Brijendra
Do Patti Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

काजोल का बेहद कमजोर किरदार
फिल्म ‘दो पत्ती’ शुरू होती है तो कनिका के प्रोडक्शन हाउस कथा पिक्चर्स का बेहतरीन एनीमेशन लोगो दिखता है। पूरी फिल्म की सबसे अच्छी चीज भी यही है। कृति की कंपनी ब्लू बटरफ्लाई का एनीमेशन मुकाबले में उन्नीस तो दूर पंद्रह, सोलह पर जाकर भी नहीं अटकता है। उत्तराखंड पुलिस की दरोगा बनीं काजोल का किरदार हरियाणवी की टांग तोड़ता हुआ अजीबोगरीब संवाद बोलता रहता है और कनिका को भी बिना गाली वाले पुलिस किरदार बनाने की आदत नहीं है। भारतीय न्याय संहिता के जमाने में ये दरोगा अब भी ‘पीनल कोड’ पर अटकी हैं। विद्या ज्योति नामक इस किरदार का परिचय कराने वाले दृश्य में जिस तरह बत्ती आती जाती रहती है, वह भी स्क्रिप्ट में इस किरदार को लेकर कतई नहीं की गई मेहनत को दर्शाती है। फिल्म मर्डर मिस्ट्री तो नहीं है, लेकिन सस्पेंस थ्रिलर बनने की कोशिश करती है और इसमें काजोल के स्लो मोशन शॉट्स न उन्हें लेडी सिंघम जैसा रुतबा दे पाते हैं और न ही एक सस्पेंस फिल्म के लिए जरूरी शातिर दिमाग पुलिसवाले का।

Do Patti Movie Review by Pankaj Shukla Kajol Kriti Sanon Kanika Singh Dhillon Shaheer Sheikh Tanvi Brijendra
Do Patti Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

डबल रोल की डबल मेहनत पड़ी भारी
कृति सेनन की कहानी यहां मनोहर कहानियों जैसी है। हवा पूरी है। पर गुब्बारा बहुत ऊपर जाता नहीं है। शैली और सौम्या दोनों के सरनेम सूद हैं। लड़का भी इन दोनों को सूद ही मिलता है, ध्रुव सूद। राठी ही कर लेते तो क्या दिक्कत है। ‘कभी कमरे से चली जाओ, कभी किचन से चली जाओ, कभी हॉस्टल चली जाओ और अब यहां से भी चली जाओ’, जैसे ‘देवदास’ से टीपे संवाद उनके किरदार को कमजोर ही बनाते हैं। वह एक किरदार में ‘आदिपुरुष’ की जानकी जैसी दिखना चाहती हैं और दूसरे में ‘भेड़िया’ की डॉ. अनिका। लेकिन मामला ‘गणपत’ की जस्सी जैसा होता नजर आता है। कृति की शोहरत आइटम नंबर हीरोइन जैसी रही है। हीरोइन बनने की उनकी पिछली पांच कोशिशों में रंग तो बहुतेरे हैं, लेकिन उनका इंद्रधनुष बनना अब भी बाकी है। यहां भी फिल्म की पटकथा उनका बहुत भला नहीं करती। ‘जा रांझण रांझण रांझण, हीर ने तैनू छोड़ दिया’ जैसे विरह के गानों में उनके चेहरे के भाव उभरते नहीं हैं और जहां मोहब्बत वाले भाव चाहिए थे, वहां बजाय इश्क की लाली के, ठंड से उनका चेहरा लाल होता नजर आता है।

Do Patti Movie Review by Pankaj Shukla Kajol Kriti Sanon Kanika Singh Dhillon Shaheer Sheikh Tanvi Brijendra
Do Patti Review - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

निर्देशन में नहीं दिखी धार
कमर्शियल फिल्मों के उस्ताद कहलाने वाले शशांक चतुर्वेदी की ये पहली फिल्म है और फिल्म के लीड कलाकारों और राइटर का दबाव उन पर साफ नजर आता है। हीरो हीरोइन नजदीक आते हैं, तो ‘एनिमल’ के गाने ‘पहले भी तुमसे मिला मैं’ का प्रील्यूड सा बजता सुनाई देता है। दोनों घूमने निकलते हैं तो सीधे फिल्म ‘गुलाम’ के आमिर खान और रानी मुखर्जी बन जाते हैं। या तो कनिका ने ये सब लिखा इसीलिए कि शशांक को ये सब क्या ही पता होगा, लेकिन दर्शकों से कुछ छुपता कहां है। वैसे ही जैसे फिल्म के एक सीन में वीजे कहती नजर आती है, ‘दाई से पेट छुपा रही है..!’ काजोल के किरदार वीजे का सेटअप यहां अपने भाई को भी जेल भेज देने का है और पेबैक है शातिराना ढंग से गढ़े गए सबूतों से 13 साल की सजा पाने वाले ‘अपराधी’ की मदद करने की कोशिश करने का। दोनों का असर परदे पर बहुत हल्का है। थ्री एक्ट में लिखी गई ऐसी कमजोर फिल्मों के साथ दिक्कत यही है कि फर्स्ट एक्ट को किसी तरह झेल गए दर्शक, सेकंड एक्ट तक आते आते बोर हो चुके होते हैं। कनिका की आदत अपना सारा मसाला थर्ड एक्ट में उड़ेलने की रही है लेकिन मामला यहां जमा नहीं है।

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