डिजिटल रिव्यू: 'शोले गर्ल' में एक्शन-इमोशन है, ड्रामा है और हैं सुपरस्टार बनाने वाले गुमनाम हीरो!
- मूवी रिव्यू: शोले गर्ल (फिल्म)
- कलाकार: बिदिता बाग, चंदन सान्याल, आदित्य लखिया आदि
- निर्देशक: आदित्य सपरोतदार। कथा-पटकथा: फैजल अख्तर, श्रावणी देवधर
- रेटिंग: ****
विस्तार
‘भाग रेशमा, भाग! आज तेरी छोटी बहन की शादी का सवाल है!’ फिल्म शोले में भले ये संवाद डबिंग के बाद ‘भाग धन्नो भाग, आज तेरी बसंती की इज्जत का सवाल है!’ हो गया हो लेकिन इस सीन की शूटिंग पर देश की पहली महिला स्टंट कलाकार यही बोल रही थीं, नाम है रेशमा पठान। जी5 पर रिलीज हुई फिल्म शोले गर्ल उन सारे लोगों को सलाम है जिन्होंने परदे के पीछे गुमनाम रहकर ना जाने कितने सुपरस्टार बनाए लेकिन खुद कभी सितारे न बन सके।
फिल्म शोले गर्ल की कहानी उस दौर से शुरू होती है जब देश में सबका पेट भरने को पर्याप्त अन्न तक नहीं होता था। चावल की तस्करी होती थी और रेशमा का पहला साबका पुलिस से इसी के चक्कर में पड़ता है। परिवार का पेट भरने के लिए मुंबई की सड़कों पर वह कलाबाजियां खाकर चवन्नियां जुटाती है और यहीं एक दिन एक स्टंट डायरेक्टर उसके हुनर को पहचानता है। रेशमा ने उस दौर में स्टंट का काम शुरू किया जब हीरोइनों के सारे स्टंट भी लड़के ही किया करते थे।
फिल्म में एक दृश्य हैं जहां शोले देखकर निकल रहे लोग हेमा मालिनी की बहादुरी की तारीफ कर रहे हैं और पास खड़ी रेशमा के दिल का दर्द छलक आता है कि उसकी मेहनत कोई नहीं पहचान रहा है। उसका दर्द तब भी झलकता है जब वह कहती है, ये हाथ घोड़े की लगाम पकड़ने के लिए बने हैं। ब्याह की चूड़ियां पहनने को नहीं। बिदिता के चेहरे पर इस सीन में जो भाव आते हैं और अगले ही सीन में जिस तरह मजबूती के साथ वह फिर कैमरे के सामने जा खड़ी होती हैं वह देखने लायक है।
बड़े परदे पर रिलीज होती तो शर्तिया सुपरहिट होती
70 के दशक में महिला सशक्तीकरण की ये एक ऐसी कहानी है जो बड़े परदे पर भी रिलीज होती तो शर्तिया सुपरहिट होती। फिल्म की जान है बिदिता बाग का रेशमा पठान के किरदार में बदल जाना। बिदिता के कमाल के अभिनय के चलते फिल्म देखते समय आपका कलेजा कई बार मुंह को आएगा।
बिदिता के इस किरदार में कमाल का ग्राफ है। वह अपने पिता से पिटती है पर मार खाती रहती है। गली का शोहदा उसे गाली देता है तो वह अकेले आधा दर्जन गुंडों को धो डालती है। साथ काम करने वाला कंधे को हाथ लगाता है तो वह झटककर आगे चल देती है। सुपरस्टार उसे दबोचने की कोशिश करता है तो वह पलटकर करारा जवाब देती है। तबस्सुम के मशहूर टीवी कार्यक्रम फूल खिले हैं गुलशन गुलशन वाला इंटरव्यू कमाल का क्लाइमेक्स है फिल्म का।
फिल्म में चंदन सान्याल ने भी कमाल का अभिनय किया है। रेशमा के गुरुजी बने चंदन ने ही फिल्म को कहीं थकने नहीं दिया है। रास्ते में कलाबाजियां करती लड़की का हुनर पहचानने वाला सीन हो या फिर अस्पताल में पड़ी रेशमा को फिर से शोले का तांगा वाला सीन करने के लिए सेट पर लाने से पहले परेशान होने वाला सीन। चंदन ने अपना हुनर इस किरदार पर चस्पा कर दिया है। फिल्म के संवाद दमदार हैं। ये कभी रुलाते हैं तो कभी आपका कलेजा मुंह को ले आते हैं।
और, ये सब कुछ कायदे से जमा है तो इसके लिए सबसे ज्यादा तारीफ की हकदार हैं श्रावणी देवधर जिन्होंने इस कहानी पर फिल्म बनाने का सोचा और फिल्म के निर्देशक आदित्य सरपोतदार। फैजल अख्तर की स्क्रिप्ट बहुत चुस्त और रफ्तार वाली है। बाकी कैमरा, एडिटिंग, कॉस्ट्यूम, मेकअप और बैकग्राउंड म्यूजिक सब सीधे आपको सत्तर के दशक में पहुंचा देते हैं। नेटफ्लिक्स की रोमा अगर ऑस्कर जीतकर ला सकती है तो जी5 की शोले गर्ल को कम से कम राष्ट्रीय पुरस्कार लाना तो बनता है।