Apurva Review: जुगनू भैया बनकर राजपाल ने दिखाई अभिनय की नई रोशनी, रात के अंधेरे में रोशन हुईं तारा
सिनेमाघरों में बीते रविवार को रिलीज हुई फिल्म ‘टाइगर 3’ का जो भी हल्ला जारी हो, अगर आपको वाकई खून खराबे भरी ‘स्लैशर’ फिल्में या ‘एनएच 10’ जैसी रोड मूवी फिल्में पसंद हैं तो फिल्म ‘अपूर्वा’ आपके लिए इस हफ्ते की फिल्म है। निर्माता मुराद खेतानी और स्टार स्टूडियोज ने निर्देशक निखिल नागेश भट्ट को एक ऐसी फिल्म बनाने का मौका दिया है, जिसके लिए मुंबई के आम फिल्म निर्माता शायद ही तैयार हों। निखिल ने निर्माता, निर्देशक अनुराग कश्यप की शागिर्दी में लंबा वक्त गुजारा है। फिल्म ‘सालन’ से उनका डेब्यू हुआ और उनकी पिछली फिल्म ‘हुड़दंग’ अपने कलाकारों के औसत से कमतर प्रदर्शन के चलते किसी को याद भी नहीं होगी। लेकिन, निखिल के लिए ये फिल्म उनकी पहली ठोस पहचान बना सकती है। इस तरह की हिंसात्मक फिल्मों का विश्व सिनेमा में अपनी एक अलग स्थापित श्रेणी है और मसाला फिल्मों से ऊबे दर्शक इन फिल्मों के तयशुदा दर्शक होते हैं। फिल्म इसके कलाकारों को भी अपनी भिन्न अभिनय क्षमता दिखाने का बेहतरीन मौका देती है।
खत्म हुआ 14 साल का वनवास
निखिल नागेश भट्ट ने फिल्म ‘अपूर्वा’ की कहानी कोई 14 साल पहले लिखी थी और एक तरह से ये उनका वनवास खत्म करने वाली फिल्म भी है। कहानी सिर्फ इतनी सी ही है कि शादी तय हो जाने के बाद एक युवती अपने प्रेमी के वर्क सिटी जाकर उसके जन्मदिन पर सरप्राइज देना चाहती है, लेकिन रास्ते में ही उसका अपहरण हो जाता है। एक पूरी रात वह कैसे इन खूनी हमलावरों से बचने की कोशिशें करती है, इसी पर पूरी फिल्म बनी है। निखिल ने कमाल इसकी पटकथा लिखने में किया है। एक बहुत ही छोटी सी कहानी पर कोई पौने दो घंटे की फिल्म बनाने में उन्होंने अपनी सारी सिनेमाई सीख का इस्तेमाल कर लिया है। लोकेशन एक ही है, कलाकार भी पहले से तय हैं और कहानी के अंत का भी दर्शकों को आभास हो ही जाता है लेकिन इस सबके बावजूद ये उनकी पटकथा ही है जो कम से कम संवादों के जरिये सिर्फ अपनी दृश्यावलियों के सहारे दर्शकों के मन में रहस्य, रोमांच और डर पैदा करती रहती है। निखिल का निर्देशन भी यहां काबिले तारीफ है और वह इसलिए कि उनके पास राजपाल यादव को छोड़कर दूसरा कोई सिद्धहस्त कलाकार नहीं है। फिल्म का पूरा भूगोल, कैमरे का संचालन, दृश्य प्रकाश संयोजन की जो परिकल्पना निखिल ने अधिकतर एक रात में बीतती फिल्म के लिए की है, उस पर सिनेमा के सुधी निर्माताओं का ध्यान अब जाना ही है।
लीक से इतर कहानियों का सगुन
एक्सेल एंटरटेनमेंट के मिनी थियेटर में हुए फिल्म ‘अपूर्वा’ के प्रिव्यू के बाद निखिल नागेश भट्ट खुद समीक्षकों की प्रतिक्रिया जानने के लिए मौजूद थे। उनके चेहरे पर जो भाव था, वह हर उस फिल्म निर्देशक का होता है जिसकी अभी अभी देखी गई फिल्म पर उसका आगे का करियर टिका हो। और, फिल्म देखकर निकलने अधिकतर समीक्षकों से मिलकर उनके चेहरे के ये भाव थोड़ी देर में ही खुशनुमा भी हो गए। मुराद खेतानी की गिनती हिंदी सिनेमा के दिग्गज फिल्म निर्माताओं में होती है। ‘कबीर सिंह’ के बाद उनकी अगली बड़ी फिल्म ‘एनिमल’ है, और इतनी मेगाबजट फिल्मों के बीच में अगर वह ‘अपूर्वा’ जैसी छोटे बजट की फिल्म पर भी भरोसा दिखाते हैं, ये नए निर्देशकों के लिए भी एक शुभ संकेत ही है कि लीक से इतर फिल्मों के कद्रदान इस जमाने में भी हैं, बस दिक्कत ये है कि ऐसी फिल्मों को सिनेमाघरों में रिलीज करने के लिए इन दिनों की बड़ी फिल्म कंपनियां तैयार नहीं हो रहीं और, निर्माताओं को इन दिनों सिनेमाघरों में फिल्म चलाने के पैसे भी देने पड़ते हैं तो वह एक ही फिल्म पर दो रिस्क लेने से भी कतराते हैं।
राजपाल यादव के अभिनय का रुआब
फिल्म ‘अपूर्वा’ एक तरह से देखा जाए तो राजपाल यादव की फिल्म है। फिल्म ‘जंगल’ का सिप्पा अगर आपको याद हो तो समझा जा सकता है कि राजपाल की अभिनय क्षमता का पूरा इस्तेमाल हिंदी सिनेमा में कम ही हुआ है। अधिकतर फिल्मों में एक कार्टून टाइप का कॉमेडी कलाकार बना दिए जाने वाले राजपाल ने यहां खूंखार और क्रूर लुटेरों के गैंग लीडर का किरदार निभाया है। गाड़ी को साइड न देने पर आगे वाली गाड़ी को ओवरटेक कर ड्राइवर को गोली मार देने के किस्से उत्तर भारत में आम हैं। लेकिन, जिस तरह से राजपाल का किरदार जुगून भैया यहां बस के सहायक को मारता है और इस दौरान राजपाल के चेहरे पर जिस तरह के भाव रहते हैं, वे देखने लायक है। कुछ कुछ छोटा गब्बर जैसा है उनका किरदार। कम ऊंचाई वाले खलनायकों का परदे पर अपना एक अलग तिलिस्म होता है और ये अगर सिनेमा के मौजूदा दौर के निर्देशक, निर्माता समझ पाए तो राजपाल यादव के लिए यहां से हिंदी सिनेमा में एक नई पारी शुरू हो सकती है।
फिल्म ‘अपूर्वा’ में शीर्षक किरदार तारा सुतारिया को मिला है। अपनी हर फिल्म से पहले एक नए अफेयर को लेकर सुर्खियां बनाने वाली तारा को ये समझना होगा कि इश्क मोहब्बत के किस्से किसी भी कलाकार को अब दर्शकों के मन में इज्जत नहीं दिलाते। ये मिलती है उनके काम और किरदार से। इस मायने में तारा ने इस बार पूरा मन लगाकर काम किया है। सगाई के दौरान लड़का देखने जाना और वहां रखे समोसे के बारे में लड़के से पूछना कि क्या ये उसने बनाए हैं, दिलचस्प है। और, इस दौरान तारा के चेहरे के भाव भी उनकी सहजता को स्थापित करते हैं। अपहरण के बाद रात में चार खूंखार दरिंदों से बचने की कोशिशों के दौरान भी उनका अभिनय अच्छा है हालांकि इस दौरान रोशनी कम होने और चेहरे पर धूल मिट्टी लग जाने से उन्हें भाव प्रकटन की अपनी कमजोरियां छुपाने में मदद भी मिलती है। तारा सुतारिया का अभिनय स्टार किड्स के रूप में लॉन्च हुए हाल फिलहाल की अभिनेत्रियों से बेहतर भी बन पड़ा है। तारा को बजाय बड़े निर्देशकों के पीछे भागने के अच्छी कहानियों पर फोकस करना चाहिए और यही उनकी अभिनय यात्रा को मजबूती दे सकते हैं।
हथौड़ा त्यागी में ही अटके अभिषेक बनर्जी
निखिल नागेश भट्ट की इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी हैं, इसके दूसरे खलनायक अभिषेक बनर्जी। अमिताभ बच्चन सरीखी जैकेट पहने और पूरी छाती खोलकर घूमते अभिषेक ने सूखा का ऐसा किरदार किया है जो घूम फिरकर उनके हथौड़ा त्यागी के किरदार के ही आसपास का है। अभिषेक बनर्जी का वेब सीरीज ‘पाताललोक’ के किरदार से अब तक आगे न बढ़ पाना बतौर अभिनेता उनके लिए घातक हो रहा है। उनसे बेहतर अभिनय फिल्म में गैंग के दूसरे सदस्य बने सुमित गुलाटी और आदर्श गुप्ता ने किया है। धैर्य करवा के लिए फिल्म में खास करने लायक कुछ है नहीं और एक गाने और तीन चार सीन के साथ ही वह क्लाइमेक्स को प्राप्त हो जाते हैं। फिल्म का संगीत औसत से कमतर है। ऐसी फिल्मों में कम से कम एक ऐसा गाना जरूर होना चाहिए जो दहशत के माहौल में, रात के अंधेरे में दोबारा बजे तो पूरा माहौल ही बदल दे। हॉन्टिंग सॉन्ग की तरह। फिल्म में एक इशारा इस तरफ है कि कैसे गांव देहात के युवा महिलाओं के साथ किए जाने वाले अपराधों के वीडियो बनाकर वायरल करते रहते हैं और दूसरा इशारा इस तरफ कि हालात कैसे भी हों, युवतियां अगर अपना हौसला न खोएं तो हो सकता है कि अंधेरी सुरंग के दूसरी तरफ रोशनी भी हो।