36 Days Review: रीमेक के दलदल में फिर फंसा अप्लॉज एंटरटेनमेंट, विशाल फूरिया की सीरीज में न थ्रिल है, न सस्पेंस
विशाल फूरिया के निर्देशन में संभावनाएं असीम हैं। हॉलीवुड फिल्म ‘लॉन्गलेग्स’ की एक खास स्क्रीनिंग पर उनका परिचय उनकी डेब्यू फिल्म ‘लपा छपी’ और ‘छोरी’ के निर्देशक के रूप में दिया गया। काजोल के साथ एक हॉरर फिल्म ‘मां’ भी वह बनाने वाले हैं और इन सबके बीच उनकी वेब सीरीज अक्सर चर्चाओं से बाहर हो जाती हैं। विशाल ने ‘क्रिमिनल जस्टिस’, ‘मिसिंग स्टोन’ और ‘फॉरेंसिक’ जैसी कई वेब सीरीज निर्देशित की हैं और उनकी वेब सीरीज देखकर हर बार यही लगता है कि सिनेमा वह मन से बनाते हैं और सीरीज सिर्फ पैसे कमाने के लिए। इस धारणा को और पुष्ट करती है उनकी नई वेब सीरीज ’36 डेज’।
रीमेक से अप्लॉज की एक और मोहब्बत
मनोरंजन जगत में जब बीते कई साल से ‘कंतारा’ से लेकर ‘केजीएफ’ और ‘कल्कि’ जैसी कहानियों की धूम मची हुई है, कोई सौ अरब डॉलर का बीते साल राजस्व जुटाने वाली कंपनी आदित्य बिड़ला ग्रुप की कंपनी अप्लॉज एंटरटेनमेंट अब भी विदेशी कहानियों को देसी चोला पहनाने में जुटी हुई है। बीबीसी स्टूडियोज से इसकी कोई लंबी ‘डील’ दिखती है और अब तक कोई आधा दर्जन सीरीज इसी कंपनी की पहले बन चुकी सीरीज पर अप्लॉज बना चुकी है। दिक्कत यहां ये है कि हिंदी में ओटीटी सीरीज देखने वाले अब विदेशी वेब सीरीज भी खूब देख रहे हैं और ओरिजिनल के अलावा उनका ध्यान अब कहीं टिकता नहीं है। अप्लाज की ताजा सीरीज ’36 डेज’ बीबीसी स्टूडियोज की कोई 10 साल पहले शुरू हुई सीरीज ’35 डेज’ का रीमेक है और गोवा की पृष्ठभूमि पर बनी है।
मनोहर कहानियों से ऊब रहे हिंदी दर्शक
ध्यान देने वाली बात यहां ये है कि हिंदी भाषी दर्शक जब ‘मिर्जापुर’ के तीसरे सीजन को देखने के बाद बेहद कमजोर सीरीज बताने से नहीं चूक रहे तो भला ट्रेलर से ही कमजोर दिख रही ’36 डेज’ को कितना देखना भी पसंद करेंगे। ओटीटी का सारा गणित किसी सीरीज या फिल्म के व्यूज पर आधारित रहता है, लोग देखने के बाद उसके बारे में कह क्या रहे हैं, इससे ओटीटी प्रबंधन को खास लेना देना होता नहीं है। अप्लॉज का गणित भी कुछ कुछ ऐसे ही चौपड़ी पर चल रहा है। नेहा शर्मा हैं, चंदन रॉय सान्याल हैं, पूरब कोहली और अमृता खानविलकर जैसे जाने पहचाने चेहरे हैं तो बनाने वाले को लगता यही है कि दर्शक स्वाद बदलने के लिए तो सीरीज देख ही लेंगे।
अनुकूलन हिंदी भाषियों के ही अनुकूल नहीं
लेकिन, क्राइम सीरीज ’36 डेज’ के सामने दिक्कत ये है कि ये एक विदेशी सीरीज का एसी कमरों में बैठकर किया गया हिंदी अनुकूलन है। यही कहानी अगर किसी देसी पृष्ठभूमि में बदली गई होती तो ये एक अच्छी अपराध कथा बन सकती थी। यहां कहानी फराह जैदी के कत्ल से शुरू होती है और इस गुनाह की गुत्थियां सुलझाने के लिए 36 दिन पीछे जाकर वहां से कड़ियां जोड़नी शुरू करती है। कई अलग अलग कहानियां इस एक सीरीज में चल रही हैं। आठ एपिसोड हैं कुल इस सीरीज के और उसमें इतने सारे किरदारों के जाले बुने गए हैं कि कई बार यूं लगता है कि लिखकर रख लेना चाहिए कि कौन क्या है, किस एपिसोड में?
अनुमानित दिशा में चलती कमजोर कहानी
वेब सीरीज ’36 डेज’ अपने पहले ही एपिसोड में औंधे मुंह गिरती है। हाउसकीपिंग स्टाफ को इशारा मिलता है किसी अनहोनी का और पहले सीन से ही पता चलना शुरू हो जाता है कि आगे क्या होने वाला है? अगर आपको इस बात में मजा आता है कि जो आपने सोचा वही परदे पर घटित होता दिखता जा रहा है, तो आप इस सीरीज का आनंद ले सकते हैं अन्यथा इस पूरी सीरीज के आठों एपीसोड में लेखन और निर्देशन के नाम पर नया या चौंकाने वाला कुछ नहीं है।
सुशांत दिवगीकर बने एक्टर नंबर वन
अदाकारी के मामले में भी वेब सीरीज ’36 डेज’ बहुत ही औसत सीरीज है। चंदन रॉय सान्याल की ओवर एक्टिंग ‘इरिटेट’ करती है। नेहा शर्मा के जिम्मे मर्दों को लुभाने का काम है। ये काम वह कहानी में भी करती हैं और दर्शकों के लिए परदे पर भी। लेकिन उनके हर फ्रेम में पता नहीं क्यों लगता है कि उनकी खातिर ही पोस्ट प्रोडक्शन टीम ने खासी मेहनत की है। पूरब कोहली और श्रुति सेठ फिर भी एक पॉवर कपल के रूप में खुद को पेश करने में सफल होते दिखते हैं। शारिब हाशमी और अमृता खानविलकर के अभिनय में भी दोनों की मेहनत दिखती है। अमीरों के बीच फंसे नव धनाढ्यों की जिंदगी ऐसी ही होती है। ट्रांसजेंडर किरदारों को ऐसे ही कलाकारों से कराने की कोशिश सराहनीय है और सुशांत दिवगीकर अपने अभिनय से यहां प्रभावित भी करते हैं। देखा जाए तो सबसे सटीक अभिनय सीरीज में उन्हीं का है।