Exclusive: ‘धुरंधर में राकेश बेदी ने बढ़ाई उम्मीद’, देवेन भोजानी ने टाइपकास्ट होने पर जताई चिंता
Deven Bhojani Interview: फिल्मों और थिएटर के लोकप्रिय अभिनेता देवेन भोजानी ने इंडस्ट्री में खुद के टाइपकास्ट किए जाने पर बात की। जानिए राकेश बेदी को लेकर उन्होंने क्या कुछ कहा…
विस्तार
करीब 40 साल से कॉमेडी के जरिए ऑडियंस को एंटरटेन करने वाले अभिनेता देवेन भोजानी अब गुजराती फिल्म 'धबकारो' में बिल्कुल अलग भूमिका में नजर आएंगे। उन्हें ‘जो जीता वही सिकंदर’, ‘साराभाई वर्सेस साराभाई’ और ‘तारा’ जैसे चर्चित प्रोजेक्ट्स के लिए जाने जाता है। लेकिन इस बार उनका किरदार बिल्कुल हटकर रहने वाला है। इस फिल्म के जरिए वह इमोशनल और लेयर्ड किरदार में दिखाई देंगे। अमर उजाला से खास बातचीत में उन्होंने अपने करियर, टाइपकास्टिंग, 'धुरंधर' में राकेश बेदी की कास्टिंग और इस फिल्म के अनुभव पर खुलकर बात की।
राकेश बेदी ने हमारे लिए भी रास्ता खोला
देवेन भोजानी कहते हैं, 'राकेश बेदी का उदाहरण बहुत अच्छा है। लंबे समय तक उन्हें कॉमेडी में ही देखा गया। ‘धुरंधर’ उनके लिए गेम चेंजर रही है। लोगों ने उनके काम को जिस तरह सराहा, वो बहुत जरूरी था। मैं आदित्य धर और मुकेश छाबड़ा को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने ऐसा रिस्क लिया।
मैंने मुकेश छाबड़ा को मैसेज करके कहा कि राकेश बेदी और गौरव गेरा जैसे कलाकारों को, जो कई साल से कॉमेडी के लिए जाने जाते हैं, उन्हें इस तरह के किरदार में कास्ट करना वाकई बड़ी बात है।
इससे मेरे जैसे एक्टर्स के लिए उम्मीद बढ़ती है कि शायद हमें भी हिंदी सिनेमा में अलग नजरिए से देखा जाए। हमें टेस्ट किया जाए या हमें ऐसे मौके मिलें। जैसे मुझे ‘धबकारो’ में मौका मिला, वैसे ही हमें अलग-अलग तरह के किरदार करने के मौके मिलते रहें, ताकि हम अपने अंदर के अलग-अलग पहलुओं को सामने ला सकें।’
कॉमेडी मेरी ताकत भी बनी और मेरी सीमा भी
देवेन मानते हैं कि कॉमेडी ने उन्हें पहचान दी, लेकिन उसी ने उन्हें एक दायरे में भी सीमित कर दिया। वह कहते हैं, ‘मैंने कॉमेडी बहुत की है और मुझे उस पर गर्व है, क्योंकि कॉमेडी करना सबसे मुश्किल होता है। लेकिन सच्चाई यह है कि मुझे उसी में सीमित कर दिया गया। लोगों ने मान लिया कि मैं सिर्फ यही कर सकता हूं, जबकि मेरे अंदर और भी बहुत कुछ है।’
इंडस्ट्री के नजरिए पर खुलकर बात करते हुए देवेन ने कहा कि एक बार आपने जो कर लिया, लोग आपको उसी में फिट कर देते हैं। ‘जो जीता वही सिकंदर’ के बाद मुझे लगातार हीरो के दोस्त के रोल मिलने लगे। एक बार नौकर का रोल किया तो उसी तरह के कई ऑफर आ गए।
लोग रिस्क नहीं लेना चाहते, वही कास्ट करते हैं जो उन्होंने पहले देखा होता है। मुझे लगता है कि लोग एक्टर को उतना ही देखते हैं, जितना उन्होंने पहले देखा होता है, उससे आगे सोचते ही नहीं।