आज भी युवा दिलों पर राज करते हैं पंचम दा

Anuradha Goel Updated Mon, 20 Aug 2012 01:36 PM IST
pancham da still rules the heart of youth
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भारतीय सिनेमा में पंचम दा के नाम से मशहूर राहुल देव बर्मन ने फिल्मी संगीत की दुनिया ही बदल दी। 'चिंगारी कोई भड़के', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'पिया तू अब तो आजा' जैसे गीतों से बर्मन साहब ने युवा दिलों को अपना कायल बना लिया।
बहुत कम उम्र यानी कि 54 वर्ष में वे अपने लाखों चाहने वालों को छोड़ गए। आज पंचम दा की 72वीं जयंती है। इस मौके पर पंचम दा के जीवन से जुड़े कुछ दिलचस्प पहलूओं डालते हैं एक नज़र।

संगीत की ताजगी ने युवाओं को लुभाया
आरडी बर्मन के संगीत में इतनी मधुरता, ताजगी और नयापन था कि वे युवाओं के भी खासे चहेते थे। बर्मन साहब ने भारतीय और पश्चिमी संगीत को मिला कर ऐसी धुनें तैयार की जिसके लोग दीवाने हो गए। उनके निधन के कई सालों बाद भी अधिकतर रीमिक्स आरडी बर्मन की धुनों पर ही तैयार हुए और यूथ में पॉपुलर हुए।

सुजॉय घोष आरडी बर्मन के बहुत बड़े फैन हैं और यह बात उन्होंने ‘झंकार बीट्स’ बनाकर जाहिर भी की। सन् 2003 में रिलीज झंकार बीट्स में ऐसी धुनों को लिया गया जो आरडी बर्मन की पहचान हैं। हाल में रिलीज सुजॉय की फिल्म कहानी के बैकग्राउंड म्युजिक में भी आरडी बर्मन के हिट हिंदी और बांग्ला गीत सुनाई देते हैं।

अब फिल्म ‘विक्की डोनर’ की जोड़ी आयुष्मान और यामी गौतम को लेकर आरडी बर्मन पर एक फिल्म बनाने की तैयारी चल रही है।   

बर्मन साहब का नाम पंचम दा कैसे पड़ा?
बर्मन साहब का नाम पंचम दा कैसे पड़ा इसके पीछे एक दिलचस्प वाकया है। एक बार जब फिल्म एक्टर अशोक कुमार ने देखा कि राहुल देव छुटपन में ही बार-बार संगीत का पांचवा स्वर 'पा' शब्द दोहरा रहे हैं तो उन्होंने तभी इनका नाम पंचम दा रख दिया जो कि आज तक मशहूर है।

तीन बार मिला फिल्मफेयर अवार्ड
पंचम दा ने अपने जीवनकाल में लगभग 300 फिल्मों को संगीत दिया। बतौर संगीत निर्देशक बर्मन साहब को तीन बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक अवार्ड नवाजा जा चुका है। घर में ही संगीत का माहौल होने के कारण पंचम दा को बहुत दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ा। इन्होंने अपने कैरियर की शुरूआत अपने पिता मशहूर संगीतकार सचिनदेव बर्मन के साथ सहायक के रूप में की।

पश्चिमी संगीत को भारतीय संगीत में मिलाकर बर्मन साहब ने कई प्रयोग किए जिनमें इन्हें खासी सफलता भी मिली। 70 के दशक में राजेश खन्ना, किशोर कुमार और आरडी बर्मन की तिकड़ी ने खासी धूम मचाई। फिल्म 'शोले' के मशहूर गीत 'महबूबा महबूबा' से आरडी बर्मन साहब की आवाज से एक अलग पहचान बनी।

अपने फिल्मी कैरियर में बर्मन साहब ने बंगला, तमिल, तेलगु, और मराठी फिल्मों के लिए काम किया और अपनी मधुर आवाज से लाखों दिलों पर राज किया। आर डी बर्मन साहब ने फिल्म 'छोटे नवाब' (1961) में पहली बार संगीत दिया लेकिन वास्तव में फिल्म 'तीसरी मंजिल' (1966) से इनके कैरियर को उड़ान मिली।

आशा और आरडी बर्मन की जुगलबंदी
पंचम दा की ही तरह आशा भोंसले को भी नई चीजें करना पसंद था और उन्हें पंचम दा के संगीत से सजे हुए गीतों को गाना भी अच्छा लगता था। खुद आशा जी कहती हैं, '...हमारे बीच संगीत से प्रेम बढ़ा, न कि प्रेम से हम संगीत में नजदीक आए।'

आशा जी ने बर्मन साहब के निर्देशन में 'ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली', 'ओ मेरे सोना रे सोना' और 'आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा' जैसे गीतों में अपनी मधुर आवाज दी। इन दोनों की जुगलबंदी लोगों को बहुत पसंद आई और ये गीत भी खूब पॉपुलर हुए।

बर्मन दा की अंतिम फिल्म '1942 लव स्टोरी' ऐसी फिल्म थी जिसमें इन्होंने आखिरी बार संगीत दिया। इस फिल्म का संगीत भी यूथ में काफी पॉपुलर हुआ। आज भी संगीत के इस जादूगर की आवाज और संगीत लोगों के दिलों में घर किए हुए है।

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