नकली है बिपाशा, रानी और दीपिका की आवाज?
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‘जिस्म’ में बिपाशा बासु के मादक डायलॉग, 'रॉकस्टार' में नरगिस फ़खरी की नखरीली आवाज़ और 'ग़ुलाम' में रानी मुखर्जी की चुलबुली आवाज़ से अगर आप प्रभावित हैं तो आपके लिए ये जानना ज़रूरी है कि वो आवाज़ें इन अभिनेत्रियों की नहीं हैं।
पर्दे पर दिखती इन छवियों के पीछे आवाज़ देकर उसमें रंग भरने का काम करती हैं कुछ ऐसी कलाकार आवाज़ें जिनके चेहरे लोग नहीं पहचानते। ये डबिंग आर्टिस्ट फ़िल्म उद्योग के लिए बेहद अहम हैं लेकिन अक्सर फ़िल्मों के क्रेडिट में इनका नाम भी शामिल नहीं होता। इनका नाम मोना शेट्टी है।
फिर कौन देता है यह आवाज?
मोना शेट्टी ने बचपन से ही आवाज़ के इस्तेमाल के गुर सीखने शुरू किए। माता-पिता विज्ञापनों की दुनिया से जुड़े थे सो वास्ता जल्दी पड़ा और धीरे-धीरे डबिंग की दुनिया में क़दम रख दिया।
मोना बताती हैं, ‘‘मुझे बचपन में की गई सबसे पहली रिकॉर्डिंग तो याद नहीं है लेकिन पहली हिन्दी फ़िल्म 'सोल्जर' थी जिसके लिए प्रीति ज़िंटा के लिए आवाज़ दी। रानी मुखर्जी के लिए ‘ग़ुलाम’, अमीषा पटेल के लिए ‘कहो ना प्यार है’, काजोल के लिए ‘दुश्मन’, दीपिका पादुकोण के लिए ‘ओम शांति ओम’ सहित कई फिल्मों में बहुत सारी अभिनेत्रियों के लिए डब किया है।
मैंने इतनी ज़्यादा आवाज़ें रिकॉर्ड की हैं कि अब तो याद भी नहीं है।’’मोना कहती हैं कि उन्हें आज की अभिनेत्रियों में कटरीना और दीपिका के लिए आवाज़ देने में अच्छा लगता है।
हालांकि वो बताती हैं, ‘‘जब कलाकार नया होता है और उसमें अपनी आवाज़ की डबिंग करने का उतना आत्मविश्वास नहीं होता तो हमारी ज़रूरत पड़ती है। हालांकि आज की अभिनेत्रियां जैसे दीपिका पादुकोण, कटरीना कैफ़ अब ख़ुद ही डबिंग करने लगी हैं।’’
हर अभिनेत्री के लिए अलग रियाज
मोना बताती हैं, ‘‘हर फ़िल्म में आवाज़ देने के लिए भी ऑडिशन तो होता ही है। वहीं हम ये देख लेते हैं कि अभिनेत्री की बोलचाल का तरीक़ा, आवाज़ की पिच, हावभाव क्या है। चुनौती होती है उस आवाज़ के साथ अपनी आवाज़ पूरी तरह से मैच करने की ताकि वो नकली ना लगे।’’
फ़िलहाल मोना अपनी वॉयस कंपनी चला रही हैं जहां वो दुनिया भर की फ़िल्मों को अलग-अलग भाषाओं में डब करने का काम करवाती हैं।
इस क्षेत्र में लंबा अर्सा बिताने के बाद मोना मानती हैं कि इस काम के सकारात्मक पक्षों में अपनी इच्छा से काम की आज़ादी और बेहतर काम से मिलने वाली वाहवाही का सुख तो है लेकिन कुछ स्थितियों में बदलाव ज़रूरी है।
मोना कहती हैं, ‘‘श्रेय मिलने का जहां तक सवाल है उसमें दिक्क़त आती है। किसी को पता ही नहीं होता कि किसी फ़िल्म में अभिनेत्री की आवाज़ उसकी अपनी नहीं किसी डबिंग कलाकार की है। कुछ फ़िल्मों में नाम लिख भी दिया जाता है लेकिन अभिनेत्री की सहमति के बाद ही। कई हीरोइनों को डर होता है कि इससे उनकी लोकप्रियता प्रभावित हो सकती है।’’
श्रीदेवी की हिंदी आवाज़ निकालता है कौन?
श्रीदेवी को आवाज नम्रता देती हैं। नम्रता साहनी फ़िलहाल दो टीवी चैनलों के लिए आवाज़ देती हैं लेकिन उऩकी शुरुआत हुई थी रेडियो के ज़रिए और धीरे-धीरे एक्टिंग का सिलसिला भी चल निकला लेकिन आख़िरकार उनका करियर बना आवाज़ की जादूगरी।
नम्रता कहती हैं, ‘‘परिवार वालों ने तो मुझे पूरी आज़ादी दी कि मैं जो चाहे करूं लेकिन बाहर के लोग अक्सर हैरान होते थे कि जब तुम ऐक्टिंग करती हो तो ये वॉयस देने का काम करने की क्या ज़रूरत है।"
वो कहती हैं, "लोग इसे निचले दर्जे का काम समझते थे। पर मेरे लिए ये एक सोचा-समझा चुनाव था। आप देखिए उस वक्त जो अभिनेत्रियां मेरे साथ काम कर रही थीं वो आज कुछ नहीं कर रही हैं जबकि मैं अब भी काम रही हूं।’’
अपनी सबसे पहली यादगार डबिंग की बात करते हुए नम्रता कहती हैं, ‘‘उस वक्त श्रीदेवी बहुत बड़ी अभिनेत्री बन चुकी थीं और उनकी फ़िल्में हिंदी में डब होने लगीं। मैंने श्रीदेवी की जिस फ़िल्म के लिए आवाज़ दी वो थी 'आदमी और अप्सरा'। उसके बाद मैंने श्रीदेवी की बहुत सारी दक्षिण भारतीय फ़िल्मों को हिंदी में डब किया। मैंने मनीषा कोईराला के लिए भी बहुत डब किया है।’’