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Open Letter: हीरोइन का जरा सा अपडेट वर्जन आपको नाकाबिले बर्दाश्त क्यों?
विनीता वशिष्ठ
Updated Sat, 25 Feb 2017 09:59 PM IST
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आपको पत्र लिखते वक्त जद्दोजहद में हूं कि आपका विरोध करूं या आपको आईना दिखाऊं। 'लिप्स्टिक अंडर माई बुर्का' रिलीज रोककर आपने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आप भारतीय सिनेमा को समझना ही नहीं चाह रहे हैं।
जेम्स बॉन्ड के किस सीन को काटकर आप ये समझने लगे हो कि आप कुछ भी कर सकते हो। संवेदनशीलता के नाम पर दरअसल आप अभिव्यक्ति की आजादी रोक रहे है। औरतों पर बनी किसी भी फिल्म से आपको इतनी मिर्ची क्यों लगती है। इससे पहले 'एंग्री इंडियन गोडेसेज' पर भी आपने ऐसा ही ड्रामा किया था।
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मुझे समझ नहीं आता कि महिलावादी फिल्मों की बात आते ही आप इतने दकियानूसी और संकुचित क्यों हो जाते हो। फिल्म में हीरो को तो सुपरमैन, हीमैन दिखा दोगे लेकिन हीरोइन का जरा सा अपडेट वर्जन आपको नाकाबिले बर्दाश्त क्यों है?
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'लिप्स्टिक अंडर माई बुर्का' में आपको बुर्का पर आपत्ति है, क्यों भई, बुर्के ने क्या कर डाला, वो कोई सेक्स से जुड़ा शब्द थोड़ी ना है जो उसे छिपाया जाए।
कहा जा रहा है कि आपको इस फिल्म के सेक्स दृश्य हजम नहीं हो रहे लेकिन दूसरी कई बी ग्रेड फिल्मों में बेहूदे और लगभग नग्न आइटम नंबर को पचाने के लिए कौन सा चूरन खाते हैं आप। उन फिल्मों में ऐसा क्या होता है जो समाज के लिए देखना इतना जरूरी है कि आप बिना चश्मा उतारे ही पास कर डालते हो। अपने गिरेबान में झांक कर देखो, ऐसे पैमाने पर दोगलापन सही नहीं।
इस फिल्म में उन चार औरतों का जिक्र है जो आगे के सपने देखती हैं। कुछ अलग सोचना और करना चाहती है। सीधे तौर पर वो हमारे मर्दवादी समाज को चुनौती देना चाह रही हैं कि हमारे लिए सोचना औऱ सब कुछ तय करना बंद करो, वो सब हम खुद ही कर लेंगे, तुम बस खुद को सुधार लो।
अब इस पर आपकी आपत्ति कतई जायज नहीं। अब आप क्या सोचे बैठे हैं कि बस हीरो वाली फिल्में ही दिखाएं जाए जिसमें वो सुपरमैन और औरत अबला ही बनी रहे।
टीवी सीरियलों में तो वैसे ही महिला किरदारों का बेड़ा गर्क कर रखा है, सिंदूर, सुहाग और सौतन से इतर बेचारी कुछ सोच ही नहीं पा रही। बड़े परदे पर इसकी बची खुची कसर तुम पूरी कर रहे हो। संभल जाइए इससे पहले कि जनता आपके फैसले पर ऐतराज करते हुए सड़क पर उतर आए और आपकी छवि को नुकसान पहुंचे।
आपको फिल्म में गालियों पर भी ऐतराज है। भूल गए क्या, हमारी फिल्मों में गालियां आपत्तिजनक कब से होने लगी। ओंकारा औऱ डेली बेली में प्रवचन थे क्या।
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि इस पिक्चर को मुंबई फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म का ऑक्सफैम अवॉर्ड दिया गया है। अब कुछ सोच समझ कर ही दिया गया होगा, कुछ तो खास देखा होगा अवॉर्ड देने वालों ने, सवाल ये है कि वो खास आपको क्यों नहीं दिखा, क्या आप संस्कारी भारत के मिशन पर चल रहे हैं।
टोक्यो वालों ने भी इसे 'द स्पिरिट ऑफ एशिया' प्राइज़ दे डाला है। यानी बाहर वाले भी फैन हो गए इसके, बस आपको समझ न आ रहा इसका कॉन्सेप्ट। चेत जाइए कहीं स्लमडॉग वाला हाल न हो जाए कि बाहर ऑस्कर मिल जाए और तब आप खींसे निपोरते हुए फिल्म को सर्टिफिकेट दें।
मेरे प्यारे बोर्ड, इससे पहले भी आप अपने दोगले मापदंडों को लेकर जनता के निशाने पर रहे हो। आरोप लगते हैं कि आप मनमर्जी करते हो, जहां चाहे कांट छांट करते हो, मर्जी से सर्टिफिकेट बांटते हो।
मेरी सलाह है कि आप पहले खुद को बदलें और फिर समाज को। संस्कार से जुड़ा मुद्दा सामाजिक है और उस समाज पर छोड़ दिया जाए तो बेहतर होगा। आप सिनेमा और उससे जुड़ी उन बारीकियों पर ध्यान दें जो दर्शक वर्ग से जुड़ी है।
स्वयंभू संस्कारी ठेकेदार बनने से अच्छा है कि भारत के सिनेमा को थोड़ा मुखर होने दें। ये आपके लिए भी अच्छा है और भारत के लिए भी। यहां का समाज सांस ले रहा है, जिंदा है और मुखर होने की कोशिश कर रहा है। इस कोशिश में भागीदार बनो न कि रोड़ा।