बेहतर अनुभव के लिए एप चुनें।
INSTALL APP

'बरेली की बर्फी' में स्वाद है या नहीं, जानिए इन 11 बातों से

रवि बुले Updated Sat, 19 Aug 2017 12:26 PM IST
विज्ञापन
बरेली की बर्फी
बरेली की बर्फी
ख़बर सुनें
पिछले एक हफ्ते से बॉक्स ऑफिस पर अक्षय कुमार की 'टॉयलेट: एक प्रेम कथा' धमाल मचाए जा रही है। इसे रोकने के लिए 'बरेली की बर्फी' आई है जिसमें हैं कृति सेनन, राजकुमार राव और आयुष्मान खुराना। तो क्या 'बरेली की बर्फी' की मिठास सभी की जुबान पर चढ़ेगी या फिल्म फीकी साबित होगी? जानिए इन 11 प्वाइंट्स में-
विज्ञापन


1. बरेली के मिश्रा सदन में रहने वाली बिट्टी मिश्रा (कृति सेनन) को पिता ने बेटे की तरह पाला है। वह पिता के पैकेट से सिगरेट निकाल कर पीती है, शराब से उसे परहेज नहीं, बड़ों का सम्मान करना उसने सीखा नहीं, आधी रात तक घर से बाहर रहती है, सारे शहर में डीजे की कमी पूरी करती है और खुली छत पर डांस करती है।


2. लड़के वाले बार-बार आते हैं और उसके ये गुण देख कर रिश्ता रिजेक्ट कर देते हैं। मां परेशान है। पिता को लगता है कि लड़की जब तक रहती है तब तक लगता है कब विदा होगी और जब जाने लगती है तो सोचते हैं कि उसके बिना कैसे रहेंगे।

पढ़ें: Twitter Review: बचकर रहना बहुतै 'कड़क' है ये बरेली की बर्फी

3. बिट्टी की सोच है कि आखिर उसमें क्या कमी है? उसमें जो बातें हैं, अगर वह किसी लड़के में हों तो क्या कोई गलत समझेगा? पिता समझाते हैं कि यह समाज है, भले ही हम इसे न मानें मगर रहना तो इसी के बीच है। 

4. मुद्दा यह कि क्या बिट्टी के लायक कोई लड़का मिलेगा? बिट्टी की शादी क्या कभी हो पाएगी? 'बरेली की बर्फी' इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढती है।

5. फिल्म की अच्छी बात यह कि कहीं-कहीं रोचक है। कुछ संवाद आकर्षक और गुदगुदाते हैं। रोमांस-कॉमडी का संतुलन है।

6. कृति सैनन किरदार में फिट हैं। संवाद अदायगी और हाव-भाव से वह भरोसा दिलाती हैं कि आने वाले दिनों में दीपिका पादुकोण की जगह ले सकती हैं।

7. फिल्म की मुश्किल यह है कि कस्बाई नायक-नायिका जरूरत से ज्यादा फिल्मी हैं। कहानी की रफ्तार धीमी है। फिल्म जब तक संभलती है क्लाइमेक्स आ जाता है, जो निराश करता है।

पढ़ें: 'बरेली की बर्फी' के इन टॉप-10 डायलॉग्स पर जमकर बजने वाली हैं सीटियां

8. अगर आपने अश्विनी अय्यर तिवारी कि 'निल बटे सन्नाटा' देखी है तो आपकी निराशा बढ़ जाएगी क्योंकि 'बरेली की बर्फी' जुबान पर खास मिठास नहीं छोड़ती। अश्विनी फिल्म को लगातार नाटकीय बनाए रखने की कोशिश करती हैं और इससे कहानी कमजोर पड़ती है।

9. सहज प्रवाह के अभाव में अंत आते-आते फिल्म फीकी पड़ जाती है। राजकुमार राव कमजोर किरदार में हैं। जिसकी जिम्मेदारी लेखकों की है।

10. आयुष्मान ने अपनी भूमिका ठीक ढंग से निभाई परंतु उनमें वह दमखम नहीं कि हीरो के रूप में अकेले फिल्म खींचें।

11. बिट्टी के मां-पिता के रूप में सीमा भार्गव और पंकज त्रिपाठी फिल्म को कई मौकों पर संभालते हैं। गीत-संगीत में उल्लेखनीय बात यहां नहीं हैं। फिल्म में रंग जरूर चटख हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
  • Downloads

Follow Us

X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00
X