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केवल कामुक दृश्यों से नहीं चल सकती फिल्म: इम्तियाज अली
रवि बुले/अमर उजाला, मुंबई
Updated Thu, 07 Apr 2016 11:57 AM IST
सार
- वेब क्रांति दुनिया के हर देश में हो रही है। अतः उसके हिसाब से कंटेंट की जरूरत पड़ रही है। सो वह बनाया जा रहा है।
- गांव-कस्बे में भी जाइए तो पाएंगे कि वहां लोग समझ रहे हैं कि इंटरनेट आ गया है और मनोरंजन बदल रहा है।
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विस्तार
जब वी मैट, रॉकस्टार, हाईवे और तमाशा जैसी फिल्मों के मेकर इम्तियाज अली ने अपनी शॉर्ट फिल्म इंडियाटुमॉरो यू-ट्यूब पर रिलीज की है। वह मानते हैं कि वेब की तेजी से फैलती दुनिया बड़े पर्दे का रंग-रूप बदल सकती है। नई मनोरंजन क्रांति को लेकर इम्तियाज अली से बातचीत की रवि बुले ने।
-वेब के लिए हमारे यहां तैयार हो रहा कंटेंट (लघु सिनेमा) ज्यादार सेक्स विषयक है। मेकर सोचते हैं कि इससे जल्दी और ज्यादा हिट मिलेंगे। आपकी फिल्म भी रेडलाइट एरिये में है। नायिका जिस्मफरोशी के पेशे में है। ऐसा क्यों?
- यह शुरुआत है और शायद इसलिए ऐसा हो रहा है। दूसरों का नहीं कह सकता लेकिन मेरी फिल्म में मैंने सेक्स तो नहीं दिखाया है। हां, रेड लाइट एरिया है और नायिका वहां की है। सेंसरशिप दृश्यों और भाषा दोनों की होती है। यहां फिल्म मेकर को उससे आजादी है।
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-क्या इस आजादी से फिल्मों पर कोई फर्क पड़ेगा? वहां तो सेंसर से सबको परेशानी है!
- हर मेकर फिल्म के अलावा भी कुछ बनाना चाहता है और वेब का कंटेंट उसे वह आजादी देता है। अगर वह पूरी तरह से अपने मन की फिल्म वेब के लिए बना पाता है तो बड़े पर्दे के लिए बनने वाला सिनेमा धीरे-धीरे प्योर हो जाएगा। जैसे मेरी ही फिल्म की बात करें तो इस फिल्म में जो पांच मिनट में मैंने दिखाया, जो मैं लंबे समय से बनाना चाहता था, जब वी मैट में उसे नहीं डालूंगा क्योंकि अपनी यह बात रखने के लिए मेरे पास दूसरा प्लेटफॉर्म आ गया है।
-सिनेमा की प्योरिटी से आपका क्या मतलब? क्या वह शुद्ध-सात्विक हो जाएगा?
- मेरे कहने का मतलब है कि मेकर के लिए यह और स्पष्ट हो जाएगा कि उसे बनाना क्या है। वह एक बात कहते-कहते दूसरी बात उसमें नहीं मिलाएगा। हम आपके हैं कौन जैसी फिल्म में उसे हीरो-हीरोइन के अंतरंग सीन डालने की जरूरत महसूस नहीं होगी। उसके पास हर तरह की फिल्म बनाने का विकल्प होगा।
-यानी इससे सिनेमा बनाने वालों के लिए और साफ हो जाएगा कि उसके दर्शक कौन हैं!
- बिल्कुल। यह स्पष्ट रहेगा कि एक फिल्म पारिवारक दर्शकों के लिए है और दूसरी पूरी तरह वयस्कों के लिए। पोर्न की कैटेगिरी की भी अलग हो जाएगी। जिसे जो देखना होगा वही देखेगा।
-तो क्या अभी तक सिनेमा में घालमेल चल रहा था?
- आप देखिए कि बीच में ऐसा दौर आया था, जब इंडस्ट्री के सामने पायरेसी का संकट था। तब फिल्म में कुछ खास दृश्य रचे जाते थे कि दर्शक उसे घर में बैठ कर नहीं देख सकता, अतः उसे सिनेमाहॉल में आना ही पड़ता। निर्माता समझ गए कि अगर फिल्म में सेक्स सीन डाले तो दर्शक उसे देखने हॉल में ही आएगा तो वैसी फिल्में बनने लगीं।
-फिल्मों में कामुक दृश्यों के महत्व के बावजूद हाल के महीनों में आई सेक्स कॉमेडी फिल्में नहीं चलीं!
- सिर्फ सेक्स सीन डालने और उसकी बातें करने से कोई फिल्म चल भी नहीं सकती। अगर ऐसा होता तो लोग पोर्न ही बनाते। सिर्फ सेक्सुअल कंटेंट की वजह से हमारे देश में फिल्म नहीं चल सकती।
-कहा जा रहा है कि वेब क्रांति सिनेमा के व्यवसाय को बदल देगी। आप क्या इससे सहमत हैं?
- वेब क्रांति दुनिया के हर देश में हो रही है। अतः उसके हिसाब से कंटेंट की जरूरत पड़ रही है। सो वह बनाया जा रहा है। गांव-कस्बे में भी जाइए तो पाएंगे कि वहां लोग समझ रहे हैं कि इंटरनेट आ गया है और मनोरंजन बदल रहा है।
-वेब से मनोरंजन का बिजसने कैसे बदलेगा?
-वेब के कंटेंट का रिवेन्यू मॉडल क्या होगा इसके बारे में अभी कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता। प्रयोग चल रहे हैं। जो पैसा लग रहा है, उसकी रिकवरी तो होगी क्योंकि मुफ्त में कभी कुछ नहीं होता। टीवी में जब सीरियल बनने शुरू हुए थे तब भी चिंता थी कि बना तो देंगे पर पैसा कैसे वापस आएगा? मगर धीरे-धीरे प्रयोजक आए और सब ठीक हो गया। विदेश में नेट के कंटेंट का रिवेन्यू मॉडल तय है, हमारे यहां भी हो जाएगा।
-फिलहाल डिजिटल कंटेंट बनाने वाले अक्सर कहते हैं कि बजट नहीं है। कुछेक बड़े मनोरंजन उद्यमियों को छोड़ दें तो बाकी के कंटेंट ऐक्टरों-डायरेक्टरों की प्रयोगशाला बन गए हैं।
-ऐसा नहीं है। बिना बजट के ये कंटेंट कैसे बन सकता है। यह जरूर है कि रिवेन्यू मॉडल तय नहीं होने से समस्याएं हैं। जैसे मैंने अपनी फिल्म बनाई तो इसमें मुझे दो कलाकारों और एक बड़े कैमरे के साथ एक दिन शूटिंग करनी पड़ी। जिसका बजट था। परंतु बाकी आउटडोर मैंने आईफोन से शूट कर लिया। अभी जो भी बातें हों, मुझे लगता है कि एक दिन हमारे देश में बड़े बजट में भी वीडियो कंटेंट शूट होगा।
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-वेब के लिए हमारे यहां तैयार हो रहा कंटेंट (लघु सिनेमा) ज्यादार सेक्स विषयक है। मेकर सोचते हैं कि इससे जल्दी और ज्यादा हिट मिलेंगे। आपकी फिल्म भी रेडलाइट एरिये में है। नायिका जिस्मफरोशी के पेशे में है। ऐसा क्यों?
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- यह शुरुआत है और शायद इसलिए ऐसा हो रहा है। दूसरों का नहीं कह सकता लेकिन मेरी फिल्म में मैंने सेक्स तो नहीं दिखाया है। हां, रेड लाइट एरिया है और नायिका वहां की है। सेंसरशिप दृश्यों और भाषा दोनों की होती है। यहां फिल्म मेकर को उससे आजादी है।
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-क्या इस आजादी से फिल्मों पर कोई फर्क पड़ेगा? वहां तो सेंसर से सबको परेशानी है!
- हर मेकर फिल्म के अलावा भी कुछ बनाना चाहता है और वेब का कंटेंट उसे वह आजादी देता है। अगर वह पूरी तरह से अपने मन की फिल्म वेब के लिए बना पाता है तो बड़े पर्दे के लिए बनने वाला सिनेमा धीरे-धीरे प्योर हो जाएगा। जैसे मेरी ही फिल्म की बात करें तो इस फिल्म में जो पांच मिनट में मैंने दिखाया, जो मैं लंबे समय से बनाना चाहता था, जब वी मैट में उसे नहीं डालूंगा क्योंकि अपनी यह बात रखने के लिए मेरे पास दूसरा प्लेटफॉर्म आ गया है।
-सिनेमा की प्योरिटी से आपका क्या मतलब? क्या वह शुद्ध-सात्विक हो जाएगा?
- मेरे कहने का मतलब है कि मेकर के लिए यह और स्पष्ट हो जाएगा कि उसे बनाना क्या है। वह एक बात कहते-कहते दूसरी बात उसमें नहीं मिलाएगा। हम आपके हैं कौन जैसी फिल्म में उसे हीरो-हीरोइन के अंतरंग सीन डालने की जरूरत महसूस नहीं होगी। उसके पास हर तरह की फिल्म बनाने का विकल्प होगा।
-यानी इससे सिनेमा बनाने वालों के लिए और साफ हो जाएगा कि उसके दर्शक कौन हैं!
- बिल्कुल। यह स्पष्ट रहेगा कि एक फिल्म पारिवारक दर्शकों के लिए है और दूसरी पूरी तरह वयस्कों के लिए। पोर्न की कैटेगिरी की भी अलग हो जाएगी। जिसे जो देखना होगा वही देखेगा।
-तो क्या अभी तक सिनेमा में घालमेल चल रहा था?
- आप देखिए कि बीच में ऐसा दौर आया था, जब इंडस्ट्री के सामने पायरेसी का संकट था। तब फिल्म में कुछ खास दृश्य रचे जाते थे कि दर्शक उसे घर में बैठ कर नहीं देख सकता, अतः उसे सिनेमाहॉल में आना ही पड़ता। निर्माता समझ गए कि अगर फिल्म में सेक्स सीन डाले तो दर्शक उसे देखने हॉल में ही आएगा तो वैसी फिल्में बनने लगीं।
-फिल्मों में कामुक दृश्यों के महत्व के बावजूद हाल के महीनों में आई सेक्स कॉमेडी फिल्में नहीं चलीं!
- सिर्फ सेक्स सीन डालने और उसकी बातें करने से कोई फिल्म चल भी नहीं सकती। अगर ऐसा होता तो लोग पोर्न ही बनाते। सिर्फ सेक्सुअल कंटेंट की वजह से हमारे देश में फिल्म नहीं चल सकती।
-कहा जा रहा है कि वेब क्रांति सिनेमा के व्यवसाय को बदल देगी। आप क्या इससे सहमत हैं?
- वेब क्रांति दुनिया के हर देश में हो रही है। अतः उसके हिसाब से कंटेंट की जरूरत पड़ रही है। सो वह बनाया जा रहा है। गांव-कस्बे में भी जाइए तो पाएंगे कि वहां लोग समझ रहे हैं कि इंटरनेट आ गया है और मनोरंजन बदल रहा है।
-वेब से मनोरंजन का बिजसने कैसे बदलेगा?
-वेब के कंटेंट का रिवेन्यू मॉडल क्या होगा इसके बारे में अभी कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता। प्रयोग चल रहे हैं। जो पैसा लग रहा है, उसकी रिकवरी तो होगी क्योंकि मुफ्त में कभी कुछ नहीं होता। टीवी में जब सीरियल बनने शुरू हुए थे तब भी चिंता थी कि बना तो देंगे पर पैसा कैसे वापस आएगा? मगर धीरे-धीरे प्रयोजक आए और सब ठीक हो गया। विदेश में नेट के कंटेंट का रिवेन्यू मॉडल तय है, हमारे यहां भी हो जाएगा।
-फिलहाल डिजिटल कंटेंट बनाने वाले अक्सर कहते हैं कि बजट नहीं है। कुछेक बड़े मनोरंजन उद्यमियों को छोड़ दें तो बाकी के कंटेंट ऐक्टरों-डायरेक्टरों की प्रयोगशाला बन गए हैं।
-ऐसा नहीं है। बिना बजट के ये कंटेंट कैसे बन सकता है। यह जरूर है कि रिवेन्यू मॉडल तय नहीं होने से समस्याएं हैं। जैसे मैंने अपनी फिल्म बनाई तो इसमें मुझे दो कलाकारों और एक बड़े कैमरे के साथ एक दिन शूटिंग करनी पड़ी। जिसका बजट था। परंतु बाकी आउटडोर मैंने आईफोन से शूट कर लिया। अभी जो भी बातें हों, मुझे लगता है कि एक दिन हमारे देश में बड़े बजट में भी वीडियो कंटेंट शूट होगा।