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कुछ ऐसे हैं दिलीप साहब

Tue, 11 Dec 2012 04:38 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Tue, 11 Dec 2012 04:38 PM IST
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facts abouts dilip kumar

आज दिलीप कुमार का 90वां जन्मदिन है। हिंदी फिल्मों में पिछले 6 दशक से सक्रिय दिलीप साहब एक नेकदिल संवदेनशील इंसान भी हैं। अपने जन्मदिन के मौके पर खुद से जुड़ी कुछ बातें उन्होंने कुछ इस तरह से पेश कीं,

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पेशावर में बचपन की यादें
मेरा बचपन दादी और नानी के घरों में खूब बीता है। मैं शुरुआती दौर से ही खेलकूद में आगे रहा। बचपन की यादें आज भी मेरे जेहन में जिंदा है। फुटबॉल मैच और खासतौर से वह आश्रम कभी नहीं भूल सकता। इस आश्रम में हम सभी बच्चे बैठ कर कई खेल खेलते थे और मेरी नानी मां मुझे कहानियां सुनाया करती थी।
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पैसों को अहमियत नहीं दी
मैंने कभी अपनी जिंदगी में पैसों को बहुत अहमियत नहीं दी। चूंकि मैं जिंदगी को जीता था, न कि उसे जोड़ता या घटाता था। मैने हमेशा वही किया जिसे करके मुझे मानसिक शांति मिली है। मुझे खेलने का शौक बचपन से रहा है। अपनी उम्र के बच्चों से लेकर मैने बड़े लोगों के साथ भी मस्ती की है। प्राण साहब, जो हमारे बेहद अजीज हैं। उनके घर पर तो हमेशा अंत्याक्षरी का माहौल हुआ करता था। हम डम शराड खूब खेला करते थे। मैं ऐसी ऐसी फिल्मों का नाम बच्चों को जान बूझ कर देता था कि वह समझ ही नहीं पाते थे।
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खाने का रहा हूं शौकीन
मैं और प्राण साहब दोनों ही खाने के शौकीन थे। हम दोनों की जोड़ी जब भी जमती तब वह खाने पर ही पूरी होती। हम दोनों उस मौके पर यहां-वहां की बातें किया करते। फिल्मी बातें तो बहुत ही कम होती। इस मौके पर तरह-तरह का खाना बनता, खासकर बिरायनी कबाब तो हम दोनों का ही फेवरेट हुआ करता। हम जी भरके इसका लुत्फ उठाते। 

साहित्य से लगाव
मैं सिनेमा और साहित्य को दो अलग चीजें मानता ही नहीं। मेरे लिए सिनेमा साहित्य एक तरह का साहित्य ही है। सहादत हसन मंटो, मुंशी प्रेमचंद्र, बंकिम चटर्जी इन सभी को देख कर पढ़ कर मैंने सिनेमा को समझा। उस दौर के निर्देशकों ने साहित्य को हमेशा अहमियत भी दी। लेकिन बाद के दौर के सिनेमा से साहित्य धीरे-धीरे कर गायब होता गया।

 ठुकरा दिये थे हॉलीवुड फिल्मों के ऑफर
हिंदी फिल्मों से प्यार करने वाले दिलीप कुमार ने हॉलीवुड फिल्मों के कई ऑफर ठुकरा दिए। उन्होंने वर्ष 1962 में बनी हॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म 'लारेंस ऑफ अरेबिया' में काम करने से इंकार कर दिया था। इस फिल्म में उन्हें जिस किरदार को निभाने के लिए ऑफर दिया जा रहा था, वह बाद में मिस्र के अभिनेता ओमर शरीफ को दिया गया। दिलीप कुमार

के सामने यह ऑफर खुद डेविड लीन लेकर आये थे। 'थीफ ऑफ बगदाद' जैसी विश्व प्रसिद्ध फिल्म बनाने वाले निर्देशक अलेक्जेंडर भी दिलीप को लेकर ताजमहल फिल्म बनाना चाहते थे। दिलीप साहब ने उस फिल्म को लेकर भी बहुत उत्साह नहीं दिखाया।

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