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आतंकी अफजल गुरु की पत्नी बनने पर टीवी की सीता का बड़ा बयान, खोले कई गहरे राज

Sat, 02 Jun 2018 12:15 PM IST
रवि बुले
रवि बुले Updated Sat, 02 Jun 2018 12:15 PM IST
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Dipika Chikhalia statement about her charater in ghalib in special interview

साल 1980 के दशक के आखिर में दीपिका चिखलिया दूरदर्शन के चर्चित धारावाहिक रामायण में सीता बनकर दर्शकों के दिलों में बस गई थीं। फिर राजनीति में उतरीं। उसके बाद ऐसी खोईं कि मीडिया को ढूंढना पड़ा। दो दशक तक पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के बाद वह अभिनय में लौट रही हैं। उनकी फिल्म 'गालिब' की शूटिंग पूरी हो चुकी है। रामायण के दिनों, राजनीतिक, घर-परिवार और वापसी पर दीपिका चिखलिया से रवि बुले की विशेष बातचीत...

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रामायण से पहले आपने कुछ फिल्में की थीं। उन दिनों फिल्म एक्टरों का टीवी में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। आप कैसे तैयार हुईं?
जब मैं क्लास नाइंथ में थी तो राजश्री प्रोडक्शंस ने फिल्म 'सुन मेरी लैला' में ब्रेक दिया। फिर कुछ फिल्मों के बाद जब मैं फ्री बैठी थी तो राजश्री की तरफ से सीरियल 'पेइंग गेस्ट' के लिए पूछा गया। मैं उन्हें न नहीं कर सकती थी। नटराज स्टूडियो मुंबई में सीरियल का काम हो रहा था, वहीं रामानंद सागर के परिवार के सीरियल भी शूट हो रहे थे। मुलाकातों के दौरान एक-डेढ़ महीने में उन्होंने मुझे दादा-दादी और विक्रम-वेताल जैसे सीरियल ऑफर किए। मैंने वह कर लिए। तब टीवी को इडियट बॉक्स कहते थे और शर्म की बात थी कि आप फिल्मों से आकर यहां काम कर रहे हैं। कुछ समय बाद सागर परिवार ने रामायण की योजना बनाई। उन्होंने मुझे सीता के रोल के लिए कहा और पांच-सात लुक टेस्ट तथा ऑडिशन के बाद मुझे फाइनल कर लिया गया।

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Dipika Chikhalia statement about her charater in ghalib in special interview

दूरदर्शन पर रामायण का वह दौर आज लोगों को याद है। प्रसारण के समय भक्तिमय माहौल और रास्तों पर जैसे कर्फ्यू लगा हो। आपके पास क्या यादें हैं?
ईमानदारी से कहूं तो शुरुआती पांच-छह महीने हमें पता ही नहीं था कि सीरियल का कितना क्रेज है। उमरगांव में हम सिर्फ शूटिंग करते थे। हर महीने एक से 28-30 तारीख तक हमसे समय लिया जाता और बीच में कभी दो-एक दिन छुट्टी मिलती थी तो घरवालों से मिल लेते थे। बाकी समय सिर्फ काम करते, खाते और सोते थे। फोन आज जैसा नहीं था। छह महीने बाद अचानक देखा कि देशी-विदेशी मीडिया स्कूली बच्चों के ट्रिप धार्मिक संत हमसे मिलने आ रहे हैं।

इसका मतलब कि टीवी पर आपने सीरियल आम लोगों की तरह नहीं देखा?
शूटिंग के दौरान जो मॉनिटर पर देख लेते थे वही देखा। बाद में भी इतने व्यस्त थे कि नहीं देख पाए।

पहली बार इस सीरियल और सीता के किरदार में अपनी लोकप्रियता का एहसास कब हुआ?
जब पापा जी, रामानंद सागर, ने मुझे और अरुण गोविल, को बताया कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी हमसे मिलना चाहते हैं। दिल्ली बुलाया है। तब दिमाग की बत्ती पहली बार जली कि यह सीरियल कितना बड़ा हो चुका है। हम मिलने गए। फिर कई अनुभव हुए। मैंने खुद शादी के ऐसे कार्ड देखे हैं जिन पर नोट लिखा होता था कि रामायण सीरियल के प्रसारण के बाद ही हस्तमिलाप का कार्यक्रम होगा।

Dipika Chikhalia statement about her charater in ghalib in special interview

परिवार ने आपकी इस सफलता या सीता की छवि को कैसे लिया?
मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे। परिवार में यही था कि नॉरलम ढंग से रहो। सफलता सिर पर मत चढ़ने दो। मैं खुद इंडस्ट्री से बहुत कनेक्ट नहीं थी। यह सब जो हो रहा था तब मैं बमुश्किल 18 साल की थी।

आपसे सीता की छवि जुड़ी थी। माता-पिता की चिंता लड़की के विवाह की होती है। आपके लिए किस तरह से लड़का देखा गया?
मैं तब 24 साल की थी। तीन प्रस्ताव थे। दो विदेश से थे। मैं विदेश नहीं जाना चाहती थी। मैं वैष्णव संप्रदाय से हूं और मेरे ससुर का इसमें बड़ा नाम-सम्मान है। मेरे माता-पिता को लगता था कि यह परिवार मेरे लिए अच्छा रहेगा। उन्होंने लड़का देखा और मुझसे कहा कि मिल लो। मैं मिली और दो दिन बाद रोका हो गया। उन दिनों मैं लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थी। रोका हुआ और मैं चुनाव के लिए नामांकन भरने निकल पड़ी। यह साल 1991 की बात है।

आपको राजीव गांधी ने मिलने बुलाया था और चुनाव आप भाजपा की तरफ से लड़ी थी। ऐसा क्यों?
वह अलग तरह की मुलाकात थी। मेरे पिता जनसंघ की विचारधारा के करीब रहे हैं। जब चुनाव लड़ने का प्रस्ताव आया तो पिता ने कहा सोच लो। मेरी राजनीति में दिलचस्पी नहीं थी। आडवाणी जी ने प्रस्ताव दिया था तो मैं भाजपा की सदस्य बनी। चुनाव लड़ने के लिए गोधरा और बड़ौदा में से एक चुनना था तो मैंने बड़ौदा चुना। मैंने सोच समझ कर कुछ नहीं किया था। बस चीजें होती गईं।

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Dipika Chikhalia statement about her charater in ghalib in special interview

लेकिन राजनीति से बहुत जल्दी बाहर हो गईं, क्यों?
साल 1991 में शादी हुई। 1993 में मेरी बड़ी बेटी हुई। वह 20 दिन की थी और मुझे अविश्वास प्रस्ताव में हिस्सा लेने संसद में जाना पड़ा जबकि हमारे घरों में प्रसव के बाद महिलाएं 40 दिनों तक बाहर नहीं निकलती। अत: ये दो काम एक साथ मैं नहीं कर सकती थी। मुझे पूरा ध्यान परिवार पर देना था। राजनीति से मेरा मन हट गया। मैं हर काम पूरे मन से करती हूं। आधे मन से कुछ नहीं करती।

अब आप फिल्मों में वापस आ रही हैं। गालिब में आप आतंकी अफजल गुरू की पत्नी और उसके बेटे की मां बनी हैं। फिल्म पर विवाद भी हो सकता है?
फिल्म ऑफर हुई तो मैं असमंजस में थी। विषय सुनने के बाद मैं चाहती थी कि यह फिल्म सेक्युलर हो और कहानी भाजपा के पक्ष में मुड़े। अन्यथा यह मेरी सीता वाली इमेज के भी विपरीत जा सकता था। मैं अपनी सीता वाली इमेज को तोड़ कर लोगों का दिल दुखाने का काम नहीं करना चाहती। फिर बातचीत करके हमने फिल्म के अनुकूल ही दो-तीन बदलाव किए। फिल्म मैंने इसलिए भी की क्योंकि यह किरदार अलग था। मैं मुस्लिम महिला के रोल में हूं। जो बुर्का-दुपट्टा पहनती है। कोई मेकअप नहीं। फिल्म एक मां के बारे में है कि विपरीत हालात में वह कैसे बेटे को पढ़ा-लिखा कर काबिल बना रही है। जिससे बेटा 10वीं की बोर्ड की परीक्षा में राज्य में अव्वल आता है। एक मायने में यह काफी मीनिंगफुल सिनेमा है।

फिल्म क्या आपके किरदार के साथ आतंकी अफजल गुरू का कोई दृश्य है?
एक दृश्य है लेकिन यह फिल्म इन लोगों के बारे में नहीं है। मूल रूप से यह कहानी अफजल गुरू के बेटे गालिब के जीवन और हालात से प्रेरित है। तब भी आप इसे बायोपिक नहीं कह सकते क्योंकि बहुत सी बातों में कहानी कहते हुए छूट ली गई है। इसमें कश्मीर के हालात पर अहम बातें हैं।

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