Bambai Meri Jaan Review: दाऊद की इमेज सुधारती चौंकाने वाली वेब सीरीज, अविनाश, मेनन और निवेदिता का यादगार अभिनय
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‘गुनाह दो किस्म के होते हैं। एक खुदा और बंदे के बीच। और, एक बंदे और बंदे के बीच। खुदा रहमानुर रहीम है, वह बंदे को माफ करता है। बंदे खुदा नहीं होते, वह माफ नहीं करते।’ ये संवाद वेब सीरीज ‘बंबई मेरी जान’ का आखिरी संवाद है। बोलती है, देश के मोस्ट वांटेड आतंकवादी करार दिए जा चुके उस अंडरवर्ल्ड डॉन की बहन जो अपने भाइयों और उसके सिपहसालारों के बंबई से दुबई भाग जान के बाद अपने सबसे बड़े भाई के कातिलों से आखिरी बदला लेती है। कहानी डोंगरी से दुबई की है। लेकिन, 10 एपिसोड की ये कहानी उस शख्स को हीरो बना देती है जिसकी तलाश में देश के तमाम सूबों की पुलिस और खुफिया एजेंसियां न जाने कब से लगी हुई हैं। इन दिनों इतिहास फिर से लिखा जा रहा है। फैशन है अब ये। तो, जो काम जावेद अख्तर ने अपने जोड़ीदार सलीम खान के साथ मिलकर कोई 48 साल पहले रिलीज हुई फिल्म ‘दीवार’ मे किया था, उसका अगला चैप्टर उनके बेटे फरहान अख्तर ने अपनी टीम के साथ मिलकर ‘बंबई मेरी जान’ में रचा है।
नेटफ्लिक्स पर अभी हाल ही में एक सीरीज रिलीज हुई, ‘द हंट फॉर वीरप्पन’। एक दुर्दांत अपराधी के हालात के हाथों मजबूर अपनी बेटियों से बेपनाह प्यार करने वाले पिता और अपनी पत्नी से ऑडियो कैसेट के जरिये प्रेम का इजहार करने वाले इंसान की कहानी बनाकर। इस सीरीज में वीरप्पन का चरित्र शोधन किया गया। अब बारी प्राइम वीडियो की है। दाऊद इब्राहिम पर हिंदी सिनेमा में तमाम फिल्में बनी हैं। कभी सीधे नाम लेकर तो कभी बिना उसका नाम लिए। ‘बंबई मेरी जान’ दूसरी किस्म की वेब सीरीज है। ये दाऊद की जिंदगी की पिक्चर है। बिल्कुल शुरू से। ‘दीवार’ अगर याद हो तो उसका सिलसिला भी कुछ कुछ ऐसे ही शुरू होता है। परवीन बाबी और अमिताभ बच्चन वाले बेडरूम सीन जैसा सीन भी यहां है। यहां भी एक लाचार मां है। कोसती है खुद को। भरोसे और मोहब्बत के बीच पिसती ये मां अपने बड़े बेटे की शादी से ठीक पहले खुद पर लानत भेजती है कि वह न एक अच्छी बीवी बन सकी और न एक अच्छी मां। न वह अपने शौहर को ज्यादा गुस्सा करने से रोक सकी और न बेटे को चोरी करने से।
ये तीन भाइयों और एक बहन वाले परिवार की कहानी है। बड़ा भाई प्रेमचंद की कहानी ‘बड़े भाई साहब’ जैसा सलूक करता रहता है। मंझला भाई अपने बाप की बेइज्जती का बदला लेने को शहर के सबसे नामी डॉन का अखाड़ा जला देता है। इसके पहले ये बाप शहर में अपराध मिटाने की ठानता है। खाकी वर्दी का रौब वह समझता है। बीवी से प्यार करता है और अपने ही दोस्त के कातिल को शहर से तड़ीपार होने की मदद के चक्कर में नौकरी से हाथ धो बैठता है। मंझले बेटे को वह अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ाता है। बड़ा वाला बार बार भीतर ही भीतर घुटता रहता है कि उसे क्यों सरकारी स्कूल में डाला? जिसे अंग्रेजी वाले स्कूल में डाला, उसको पढ़ने से ज्यादा क्रिकेट का मैच जीतने में दिलचस्पी है। सामने वाली टीम से फिक्सिंग करना भी वह बचपन में ही सीख लेता है। बकरीद पर बकरा चोरी करता है तो बाप उसकी पुलिस वाली बेल्ट से धुलाई करता है। इस पिटाई में दाहिनी गाल पर बना जख्म उसकी जिंदगी भर की पहचान बन जाता है।
कहानी पूरी फिल्मी है। गाना भी है इसमें, जिंदगी पिक्चर है। जो छोटा बब्बन के आने पर बजता है। छोटा बब्बन शार्प शूटर है। जिस युवती के सपने देखते देखते वह 14 घंटे का बस का सफर पूरा करता है, वही उसे दूसरे के साथ रंगरेलियां मनाते मिलती है। फिर? फिर क्या, गोली सीधे ललाट के पार। छोटा बब्बन भी डी कंपनी में शामिल होता है। फिर आगे क्या होता है? ये शायद ‘मुंबई मेरी जान’ के दूसरे सीजन में दिखेगा। देखने में ऊपर तौर पर ये कहानी है तो एक पुलिसवाले के बेटे के बंबई का सबसे बड़ा डॉन बनने की लेकिन इस कहानी में इतनी सारी अंतर्कथाएं हैं कि इनके इंद्रधनुष सीरीज देखने वाले को आखिरी एपिसोड तक चैन नहीं लेने देते। इसमें एक लाचार बाप है जो ईमानदारी का सेहरा उतारकर हाजी का गुलाम बनता है। एक मां है जिसे अपने बच्चों की हरदम फिक्र लगी रहती है। अफगानिस्तान से आया हुआ एक पठान है। और, एक और डॉन है जो दक्षिण भारत से आकर धारावी पर राज करता है
शुजात सौदागर निर्देशित वेब सीरीज ‘बंबई मेरी जान’ एक तरह से ये स्थापित करने की कोशिश करती है कि दाऊद जो बना, उसमें उसकी कोई गलती नहीं। उसने क्रीम रोल चुराया तो अपनी गर्लफ्रेंड को खिलाने के लिए। बकरा चुराया तो भूख मिटाने के लिए। हाजी से बकरीद में भी ईदी ली तो उसे वह अपनी मां को देता है। एस हुसैन जैदी की किताब ‘डोंगरी टू दुबई’ के इस फिल्मी रूपांतरण में किरदारों के नाम बदल दिए गए हैं। शुजात ने शॉट ऐसे ऐसे सजाए हैं कि ध्यान कहीं बंटता नहीं है। हेनरी स्विंडल ने इस कहानी का संपादन इतनी चुस्त तरीके से किया है कि एक प्रशस्ति गान को कथित काल्पनिक कहानी के जरिये कैसे दर्शकों के दिलो दिमाग में एक शातिर पटकथा के जरिये उतारा जा रहा है, इसका भान शायद ही दर्शकों को हो सके। और, यही इस वेब सीरीज की जीत है। चैतन्य चोपड़ा और रेंसिल डिसिल्वा की लिखी पटकथा वेब सीरीज ‘बंबई मेरी जान’ की असली जान है और संवाद लेखन है दलाल बंधुओं, अब्बास और हुसैन ने। दोनों दलाल भाइयों ने मुंबई के डोंगरी इलाके की जितनी भी गालियां अब तक सीखी हैं, सब की सब यहां खर्च कर दी हैं। हां, वन लाइनर दोनों ने कमाल के लिखे हैं। ऐसे लेखकों को ‘ब्रह्मास्त्र’ सरीखी फिल्मों के संवाद क्यों नहीं लिखने चाहिए, अयान मुखर्जी ये सीरीज देखकर समझ सकते हैं।
वेब सीरीज ‘बंबई मेरी जान’ की जान इसकी कास्टिंग भी है। कास्टिंग बे नामक एजेंसी ने इसमें छोटे से छोटा किरदार बहुत बारीकी से छांटा है। सुनील पलवल, विवान भटेना, लक्ष्य कोचर, नवाब शाह, अमायरा दस्तूर सब अपनी अपनी जगह कहानी के नगीने बनकर निकलते हैं। सकीना के भाई का किरदार करने वाले कलाकार आलोक पांडे ने अपने अभिनय से इस कहानी का जो टेंट पोल बनाया है, वही इस सीरीज का असली टर्निंग प्वाइंट बनता है। पठान बने नवाब शाह और हाजी के किरदार में सौरभ सचदेवा खूब चमके हैं। लेकिन, ये सीरीज के के मेनन, अविनाश तिवारी, निवेदिता भट्टाचार्य और कृतिका कामरा के नाम है। के के मेनन का किरदार इस कहानी का सूत्रधार भी है। वह इसके दृश्यों को कभी अपने शानदार अभिनय तो कभी अपनी जानदार आवाज से साधते चलते हैं। उनका ये नया अवतार गौर करने लायक है। अभिनय की हर नई पारी को वह विराट कोहली की तरह खेल रहे हैं। उन्हें भी अभिनय के खेल के सारे सचिन तेंदुलकरों से जल्द से जल्द आगे जो जाना है।
‘खाकी द बिहार चैप्टर’ में चंदन महतो बने अविनाश तिवारी इस हफ्ते एक साथ दो क्राइम वेब सीरीज में आए हैं। ‘काला’ अभी देखी नहीं है तो उसका तो पता नहीं लेकिन ‘बंबई मेरी जान’ में वह अमिताभ बच्चन की तरह विजय पाते दिखते हैं। कद काठी उनकी साधारण है लेकिन अभिनय बहुत ही वजनदार। मस्जिद के लिए चंदा वसूलते वसूलते हफ्ता वसूलने लग जाने वाले लुक्खे का बंबई के सबसे बड़े डॉन बनने तक का उनके किरदार का ग्राफ अविनाश के अभिनय से ही सही ऊंचाई पाता है। ये सीरीज देखकर उनके पास कराची से फोन आ जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। इतनी दाद तो अविनाश के लिए बनती है। अब्दुल्ला के किरदार में विवान भटेना, बड़े भाई के किरदार में जितिन गुलाटी और पुलिस अफसर के किरदार में शिव पंडित ने भी इस सीरीज को एक अलग कहानी बनाने में बहुत मदद की है। सुपारी किलर के तौर पर सुमित व्यास और छोटा बब्बन के किरदार में आदित्य रावल सीरीज के सरप्राइज आइटम हैं।
सीरीज के भावुकता भरे दृश्यों को संभालने का जिम्मा निवेदिता भट्टाचार्य के पास है। एक पुलिस वाले की बीवी और एक डॉन की मां का उनका ये किरदार लंबे समय तक याद किया जाएगा। निवेदिता का अपने करियर का ये अब तक का सर्वश्रेष्ठ अभिनय है। कृतिका कामरा की भाव भंगिमाएं भले फिल्म ‘हसीना पारकर’ की श्रद्धा कपूर की याद दिलाती हों, लेकिन बाप को मारने आए कातिल का काम तमाम करने वाले दृश्य से लेकर आखिरी एपिसोड में कुर्सी पर टांग ऊंची करके बैठने की उनकी अदाएं कमाल की हैं। डॉन की माशूका के रूप में अमायरा दस्तूर जब अपने बाप की तौहीन करने वाले आशिक को घर से बाहर निकल जाने को कहती हैं तो वह दृश्य उनको भी तालियों का हकदार बनाता है।
सीरीज ‘बंबई मेरी जान’ तकनीकी रूप से भी बहुत समृद्ध है। जॉन श्मिट की सिनेमैटोग्राफी इसकी कहानी को इसके अलग अलग कालखंडों की हकीकत के करीब ले जाने में सबसे ज्यादा मदद करती है। ऑडियो कलेक्टिव का संगीत, अनिर्बान सेनगुप्ता की साउंड डिजाइन, मेलेनी डिसूजा के तैयार किए हेयर स्टाइल व मेकअप और बीबी जेबा मिराई के डिजाइन किए हुए कपड़े भी तारीफ के हकदार हैं। और, तकनीकी टीम में सबसे खास काम किया है इसके प्रोडक्शन डिजाइनर नितिन गायकवाड़ ने। मुंबई जब बंबई था, तब का रंग रोगन तैयार करने में उनकी टीम ने सबसे ज्यादा मेहनत की है। और, आखिरी दो एपिसोड को छोड़ दें तो तुषार पारेख की एडिटिंग ने भी सीरीज को कहीं ढीला नहीं पड़ने दिया।
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