Saran Lok Sabha: सारण में नई नहीं है लालू परिवार और राजीव प्रताप रुडी के बीच जंग, जानें कब-कौन पड़ा भारी
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विस्तार
लोकसभा चुनाव में प्रचार चरम पर है। आज पहले चरण का मतदान भी हो जाएगा। इन सबके बीच कुछ सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है। इनमें से एक है बिहार की सारण लोकसभा सीट। इस सीट पर लालू यादव की बेटी किस्मत आजमा रही हैं। रोहिणी के सामने भाजपा के बड़े नेता राजीव प्रताप रुडी हैं।
हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी सारण सीट की बात करेंगे। इसके चुनावी इतिहास की बात करेंगे। बात करेंगे यहां से जीते उम्मीदवारों की, पिछले चुनाव में इस सीट पर क्या हुआ था? इस बार कैसे समीकरण बन रहे हैं? ये भी जानेंगे…
पहले सारण सीट के बारे में
बिहार से लोकसभा के 40 सांसद चुने आते हैं। इन 40 लोकसभा सीटों में से एक सारण भी है। इस चुनाव में सारण सीट सुर्खियों में है। सारण नाम से लोकसभा सीट 2008 में अस्तित्व में आई थी। परिसीमन से पहले यह छपरा लोकसभा चुनाव क्षेत्र हुआ करता था। साल 1951-52 में देश के पहले आम चुनाव हुए तब छपरा नाम से लोकसभा सीट नहीं थी।
शुरुआती चुनावों में कांग्रेस के रामशेखर जीते
साल 1957 में हुए दूसरे आम चुनाव में छपरा सीट अस्तित्व में आई। इस चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के राजेंद्र सिंह को जीत मिली। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार लीला देवी वर्मा को 2,948 वोट से शिकस्त दी थी।
1962 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रामशेखर प्रसाद सिंह को जीत मिली। उन्होंने पिछली बार जीते प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के राजेंद्र सिंह को 21,204 वोट से हरा दिया। 1967 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस के रामशेखर प्रसाद सिंह जीते। इस बार उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के एचपी यादव को 28,209 वोट से हराया था।
1971 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के रामशेखर प्रसाद सिंह ने जीत की हैट्रिक लगा दी। इस चुनाव में उन्होंने भारतीय क्रांति दल के सत्यदेव सिंह को 39,170 वोटों से हरा दिया।
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में लालू यादव जीते
साल 1977, आपातकाल के बाद देश में चुनाव होते हैं। छपरा से जनता पार्टी एक नए चेहरे पर दांव लगाती है। पटना विश्वविद्यालय का एक छात्र नेता भारतीय लोकदल के टिकट पर मैदान में उतरता है। सिर्फ उतरता ही नहीं, जीत भी जाता है। ये जीत भी छोटी-मोटी नहीं होती। पूरे 3,73,800 वोट की जीत होती है और इसी के साथ बिहार की राजनीति में उदय होता है लालू प्रसाद यादव का। वही, लालू प्रसाद यादव जिनके नाम के बिना आज भी बिहार की राजनीति का जिक्र पूरा नहीं होता है। 1977 में 28 साल के युवा लालू छपरा सीट पर लगातार तीन चुनाव जीत चुके कांग्रेस के रामशेखर प्रसाद सिंह को हरा देते हैं।
तीन साल बाद हुए मध्यावधि चुनाव होते हैं। जनता पार्टी टूट चुकी होती है। जनता पार्टी के टिकट पर सत्यदेव सिंह मैदान में होते हैं, तो लालू प्रसाद यादव जनता पार्टी (सेकुलर) के उम्मीदवार होते हैं। बेहद कड़े मुकाबले में लालू को इस बार हार मिलती है। सत्यदेव सिंह महज 8,781 वोटों जीत दर्ज करने में सफल रहते हैं।
1984 के लोकसभा चुनाव में यहां से जनता पार्टी के उम्मीदवार राम बहादुर सिंह को सफलता मिली। सहानुभूति लहर पर सवार होकर कांग्रेस भले ही सत्ता में आई, लेकिन उसे छपरा में जीत नहीं मिली। यहां कांग्रेस के प्रत्याशी भीष्म प्रसाद यादव को 26,006 वोटों से शिकस्त झेलनी पड़ी। 1977 में इस सीट पर जीत दर्ज करने वाले लालू यादव इस बार 28.27 फीसदी वोट पाने के बाद भी तीसरे नंबर पर चले गए। इस चुनाव में लालू लोकदल के टिकट पर मैदान में उतरे थे।
हार के बाद लालू यादव की वापसी
1989 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर लालू प्रसाद यादव छपरा सीट से उतरते हैं। इस बार फिर से उनकी पार्टी अलग होती है। जनता दल के टिकट पर उतरे लालू प्रसाद यादव लगातार दो चुनाव में हार के बाद इस बार वापसी करते हैं। लालू जनता पार्टी (जेपी) के उम्मीदवार राजीव रंजन सिंह को 1,41,882 मतों से हरा देते हैं।
दो साल बाद हुए 1991 के लोकसभा चुनाव होते हैं। लगातार चार चुनाव यहां लड़ने वाले लालू यादव अब तक बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके थे। लालू की पार्टी जनता दल से इस बार लाल बाबू राय उतरते हैं। राय जनता पार्टी की तरफ से उतरे राजीव रंजन सिंह को 1,24,573 वोट से हरा देते हैं।
राजीव प्रताप रूडी ने खोला भाजपा की जीत का खाता
1996 का लोकसभा चुनाव आता है और छपरा की राजनीति में एक और बदलाव लाता है। इस चुनाव में भाजपा ने पहली बार सफलता हासिल की। पार्टी की तरफ से उतरे राजीव प्रताप रूडी जनता दल के लाल बाबू राय को 15,496 मतों से हरा देते हैं।
1998 के लोकसभा चुनाव में चुनाव भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। पार्टी के उम्मीदवार राजीव प्रताप को राजद के हीरालाल राय के सामने 9,327 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। 1999 के चुनाव में भाजपा के राजीव प्रताप रूडी ने छपरा सीट पर वापसी की। इस बार उन्होंने राजद के हीरालाल राय को 43,553 वोटों से हरा दिया। बाद में रूडी अटल सरकार में नागरिक उड्डयन मंत्री भी बने।
एक बार फिर लालू यादव उतरे मैदान में
साल 2004, इस बार भाजपा से राजीव प्रताप रुडी और राजद से लालू प्रसाद यादव आमने-सामने थे। इस चुनाव में जीत लालू को मिली। उन्होंने राजीव प्रताप रुडी को 60,423 वोटों से हरा दिया।
अब आती है 2009 के लोकसभा चुनाव की बारी। लोकसभा सीटों का नए सिरे से परिसीमन हो चुका होता है। और छपरा लोकसभा सीट का अस्तिव नहीं रह जाता है। अब इस सीट का नाम होता है सारण लोकसभा सीट। परिसीमन के बाद हुए चुनाव में राजद की ओर से उतरे लालू यादव सारण सीट से मैदान में उतरे हैं। एक बार फिर उनके सामने भाजपा के राजीव प्रताप रुडी ही होते हैं। जीत एक बार फिर लालू प्रसाद यादव को जीत मिलती है। लालू भाजपा के राजीव प्रताप रुडी को 51,815 वोट से हरा देते हैं।
2014 में राबड़ी देवी को मिली हार
2014 के लोकसभा चुनाव में राजद की तरफ से लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी उम्मीदवार होती हैं। उनके सामने भाजपा के राजीव प्रताप रुडी ही थे। रुडी लगातार दो चुनाव यहां से हार चुके थे। इस चुनाव में रुडी ने वापसी करते हैं और पूर्व मुख्यमंत्री को शिकस्त दे देते हैं। भाजपा उम्मीदवार को 3,55,120 वोट मिले। वहीं, राबड़ी देवी को 3,14,172 वोट मिले। इस जीत के बाद 2014 में रुडी नरेंद्र मोदी सरकार में कौशल विकास और उद्यमिता राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनते हैं।
2019 में लालू के समधी को हार का समना करना पड़ा
2019 के लोकसभा चुनाव में सारण सीट पर भाजपा ने एक बार फिर बड़ी जीत दर्ज की। भाजपा की इस सफलता में सारण की जीत में शामिल रही, जहां भाजपा से राजीव प्रताप रुडी ने एक बार फिर से जीत दर्ज की। भाजपा उम्मीदवार ने इस बार राजद की तरफ से उतरे लालू यादव के समधी चंद्रिका रॉय को हरा दिया। राजीव प्रताप रुडी ने यह चुनाव 1,38,411 वोटों के बड़े अंतर से जीता।
इस बार राजीव प्रताप के सामने लालू की बेटी
अब बात 2024 के चुनाव की कर लेते हैं। इस बार भाजपा ने सारण लोकसभा सीट से सांसद राजीव प्रताप रुडी को ही अपना उम्मीदवार बनाया है। वहीं, राजद की तरफ से लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य मैदान में हैं। रोहिणी पहली बार चुनावी राजनीति में कदम रख रही हैं। हालांकि, रोहिणी सोशल मीडिया पर पिता और भाई के लिए सोशल मीडिया पर लगातार एक्टिव रहती थीं। वह 2022 में अपने पिता लालू यादव को किडनी देकर चर्चा में आई थीं। रोहिणी सिंगापुर में अपने परिवार के साथ रहती हैं लेकिन चुवान के लिए अब वह भारत आ चुकी हैं।