Chandni Chowk Assembly Seat: हर बार जो जीता वो हुआ सत्ता का हिस्सेदार, ऐसा है चांदनी चौक का चुनावी इतिहास
Chandni Chowk Seat: चांदनी चौक सीट पर आप ने मौजूदा विधायक प्रहलाद सिंह साहनी की जगह पार्षद बेटे पुरनदीप साहनी को उम्मीदवार बनाया है। वहीं, कांग्रेस ने जयप्रकाश अग्रवाल के बेटे मुदित अग्रवाल को टिकट दिया है। मुदित पहली बार चुनावी मैदान में उतरे हैं। भाजपा ने सतीश जैन को उम्मीदवार बनाया है।
विस्तार
दिल्ली का चांदनी चौक पुरानी दिल्ली का चर्चित इलाका है। यहां की छोटी और संकरी गलियां और दुकानों में देश के व्यापार का बहुत बड़ा हिस्सा समाया हुआ है। यहां के व्यापारी चुनावों में भी बड़ा असर डालते है। इस इलाके का इतिहास तो बहुत पुराना है। आज इसी चांदनी चौक सीट की बात करेंगे।
दिल्ली विधानसभा चुनाव के इतिहास में चांदनी चौक में कब कौन जीता? कब कितने वोट पड़े? पिछले चुनाव में कैसे नतीजे रहे थे? इस बार कैसा मुकाबला हो सकता है? आइये जानते हैं…
दिल्ली को विधानसभा मिलने की ऐसी है कहानी
दिल्ली को विधानसभा कैसे मिली, इसकी कहानी 1952 से शुरू हुई। 1952 पार्ट-सी राज्य के रूप में दिल्ली को एक विधानसभा दी गई। 1956 में उस विधानसभा को भंग कर दिया गया। 1966 में दिल्ली को एक महानगर परिषद दी गई।
दिल्ली राज्य विधानसभा 17 मार्च 1952 को पार्ट-सी राज्य सरकार अधिनियम, 1951 के तहत अस्तित्व में आई। 1952 की विधानसभा में 48 सदस्य थे। मुख्य आयुक्त को उनके कार्यों के निष्पादन में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद का प्रावधान था, जिसके संबंध में राज्य विधानसभा को कानून बनाने की शक्ति दी गई थी।
राज्य पुनर्गठन आयोग (1955) की सिफारिशों के बाद दिल्ली 1 नवंबर 1956 से भाग-सी राज्य नहीं रही। दिल्ली विधानसभा और मंत्रिपरिषद को समाप्त कर दिया गया और दिल्ली राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष प्रशासन के तहत केंद्र शासित प्रदेश बन गया। दिल्ली में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था और उत्तरदायी प्रशासन की मांग उठने लगी। इसके बाद दिल्ली प्रशासन अधिनियम, 1966 के तहत महानगर परिषद बनाई गई। यह एक सदनीय लोकतांत्रिक निकाय था जिसमें 56 निर्वाचित सदस्य और 5 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य होते थे।
इसके बाद भी विधानसभा की मांग उठती रही। 24 दिसंबर 1987 को भारत सरकार ने सरकारिया समिति (जिसे बाद में बालकृष्णन समिति कहा गया) नियुक्त की। समिति ने 14 दिसंबर 1989 को अपनी रिपोर्ट पेश की और सिफारिश की कि दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश बना रहना चाहिए, लेकिन आम आदमी से जुड़े मामलों से निपटने के लिए अच्छी शक्तियों के साथ एक विधानसभा दी जानी चाहिए। बालाकृष्णन समिति की सिफारिश के अनुसार, संसद ने संविधान (69वां संशोधन) अधिनियम, 1991 पारित किया, जिसने संविधान में नए अनुच्छेद 239AA और 239AB डाले, जो अन्य बातों के साथ-साथ दिल्ली के लिए एक विधानसभा की व्यवस्था करते हैं। लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि के मुद्दों पर विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार नहीं था। 1992 में परिसीमन के बाद 1993 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव बाद दिल्ली को एक निर्वाचित विधानसभा और मुख्यमंत्री मिला।
कैसा है चांदनी चौक सीट का इतिहास
इस सीट का इतिहास बहुत पुराना है। यहां 1951 में यहां सबसे पहले चुनाव हुआ था। उस समय सीट पर कांग्रेस को जीत मिली थी। कांग्रेस के युद्धवीर सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़ रहे यज्ञदत्त शर्मा को 952 वोट से हराया था। 1972 में यहां फिर से चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस के रमा शंकर को जीत मिली। भारतीय जन संघ के जनार्दन गुप्ता को 1404 वोट से हरा दिया था।
1977 में चांदनी चौक सीट पर हुए चुनाव मेंं जनता पार्टी के राज कुमार जैन को जीत मिली। जनता पार्टी के उम्मीदवार ने कांग्रेस के रमा शंकर को 6852 वोट से हरा दिया। 1983 में यहां चुनाव हुए। इस चुनाव में चांदनी चौक सीट पर भाजपा के वासदेव कप्तान को जीत मिली। भाजपा उम्मीदवार ने कांग्रेस के राम प्रकाश गुप्ता को 931 वोट से शिकस्त दी।
1993: भाजपा को मिली जीत
दिल्ली को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद 1993 में विधानसभा के चुनाव हुए। 1993 में इस सीट पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर हुई। इस मुकाबले में जीत भाजपा को मिली। भाजपा के वासदेव कप्तान ने कांग्रेस के एम.एम. अग्रवाल को 4454 वोट से हरा दिया।
1998: कांग्रेस ने लिया 1993 की हार का बदला
साल 1998 के विधानसभा चुनाव में में भी मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही था। इस चुनाव में कांग्रेस ने प्रहलाद सिंह साहनी तो भाजपा ने वीरेश प्रताप चौधरी को टिकट दिया। कांग्रेस के प्रहलाद सिंह साहनी ने भाजपा के वीरेश प्रताप चौधरी को 8162 वोट से हरा दिया।
2003: कांग्रेस की दूसरी जीत
2003 के विधानसभा चुनाव में भी चांदनी चौक सीट कांग्रेस के पास बरकरार रही। कांग्रेस ने तत्कालीन विधायक प्रहलाद सिंह सहनी को फिर से उतारा। सहनी फिर से जीतने में सफल रहे। उन्होंने भाजपा के धर्मवीर शर्मा को 10866 वोट से हरा दिया।
2008: कांग्रेस ने लगाई जीत की हैट्रिक
2003 में हुए परिसीमन के बाद एक बार फिर दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए। नए परिसीमन के बाद हुए चुनाव में चांदनी चौक सीट पर नतीजे पुराने ही रहे। कांग्रेस के प्रहलाद सिंह साहनी ने फिर से जीत दर्ज कर हैट्रिक लगाई। कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा के प्रवीण खंडेलवाल को 8019 वोट से हरा दिया।
2013: साहनी ने लगाया जीत का चौका
दिल्ली की राजनीति के लिए साल 2013 एक अहम कड़ी साबित हुआ। इस चुनाव में मुकाबले में कांग्रेस-भाजपा के अलावा इस बार भ्रष्टाचार आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी भी थी। चांदनीचौक विधानसभा सीट पर मुकाबला काफी दिलचस्प रहा।
इस सीट पर मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच में ही था। इस मुकाबले में कांग्रेस के प्रहलाद सिंह साहनी को फिर से जीत मिली। पहली बार चुनाव मैदान में उतरी आप के उम्मीदवार को 15275 वोट मिले।
2015: आप को मिली पहली जीत
2015 में फिर से दिल्ली में विधानसभा चुनाव करवाने पड़े। 2014 में मात्र 49 दिन सरकार चलाने के बाद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया था। फरवरी 2014 में जब लोकपाल विधेयक पारित नहीं हो पाया तो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 2015 में फिर से चुनाव कराए गए और केजरीवाल ने 70 में से 67 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की।
इस चुनाव में चांदनीचौक सीट से अलका लांबा ने आप के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। जीत का अंतर 18287 वोट था। आप उम्मीदवार को 36,756 वोट मिले। भाजपा उम्मीदवार सुमन प्रकाश गुप्ता को 18469 वोट मिले। तीसरे नंबर पर कांग्रेस के प्रहलाद सिंह साहनी रहे। उन्हें 17930 वोट मिले।
2020: आप की दूसरी जीत
2020 के विधानसभा चुनाव में आप आदमी पार्टी ने फिर जबरदस्त जनादेश हासिल किया। आप को 70 में से कुल 62 सीटों पर जीत मिली। चांदनीचौक की बात करें तो इस सीट पर फिर से कई वर्षों से सीट पर विधायक रहे प्रहलाद सिंह साहनी ने ही जीता लेकिन इस बार पार्टी अलग थी। साहनी ने इस बार आप के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते। 2015 में यहां से आप के टिकट पर जीतने वाले अलका लांबा इस चुनाव में अपनी जमानत भी नहीं बचा सकीं। अलका इस बार कांग्रेस के टिकट पर मैदान में थीं। आप उम्मीदवार को 50891 वोट मिले, भाजपा के सुमन कुमार गुप्ता को 21307 वहीं कांग्रेस की अलका लांबा को मात्रा 3881 वोट मिले। जीत का अंतर 29,584 वोट था।
अबकी बार कैसे हैं समीकरण?
चांदनी चौक का राजनीतिक इतिहास बेहद दिलचस्प है। यहां के मतदाता हमेशा सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाते आए हैं। केवल एक बार ऐसा हुआ है जब इस क्षेत्र का विधायक सत्ताधारी दल का हिस्सा नहीं रहा, लेकिन तब भी उसने सरकार को समर्थन दिया था। यह क्षेत्र हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं का मिलाजुला गढ़ है। यहां हर पार्टी के लिए समीकरण साधना चुनौतीपूर्ण होता है। चांदनी चौक में लंबे समय तक कांग्रेस का दबदबा रहा है। पार्टी यहां अक्सर जीत दर्ज करती आई थी, लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। इन चुनावों में आम आदमी पार्टी ने जीत हासिल की और कांग्रेस का प्रभाव लगभग खत्म कर दिया। चांदनी चौक में भाजपा का रिकॉर्ड काफी कमजोर रहा है। पार्टी ने यहां केवल वर्ष 1993 में जीत दर्ज की थी। इसके बाद से यह सीट भाजपा के लिए चुनौती बनी हुई है।
आप और कांग्रेस का नए चेहरों पर दांव