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Elections 2024: भाजपा की कथित अंदरूनी खींचतान से उड़ी चाणक्य की नींद, साधने में जुटा शीर्ष नेतृत्व

Thu, 16 May 2024 05:42 AM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 16 May 2024 05:42 AM IST
सार

लोकसभा चुनाव 2024 के पहले चार चरणों का मतदान हो चुका है। तूफानी चुनाव प्रचार का दौर जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा एक दिन में तीन या इससे अधिक सभा या रोड-शो कर रहे हैं। ताजा घटनाक्रम में भाजपा पार्टी के भीतर कथित अंदरूनी खींचतान से परेशान है। पार्टी आलाकमान चुनावी समीकरण साधने की कवायद में जुट गया है।

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BJP Internal Rift Reports Political Equations in several States under scanner efforts of damage control
बीजेपी आलाकमान (फाइल) - फोटो : एएनआई

विस्तार

भाजपा के चाणक्य (रणनीतिकार) ने डंडा चलाकर और फिर मरहम लगा कर तमाम सीटों का समीकरण तो जरूर बिठाया। लेकिन अंदरूनी खींचतान ने इसके बाद भी सरकार की नींद उड़ा दी है। बनारस के प्रांत प्रचारक स्तर के सूत्र भी मान रहे हैं कि लड़ाई थोड़ा कठिन हो गई है। एक जिले के नगर कार्यवाह ने कहा कि पिछले महीने से हालात ज्यादा खराब हुए। संघ से भाजपा में आए प्रयागराज के सूत्र का कहना है कि रही-सही कसर बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद पर कार्रवाई करके पूरी कर दी है।

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फैजाबाद के एक असरदार भाजपा नेता ने माना कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जेल से आने के बाद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को लेकर जो भविष्यवाणी की है, वह आवाज गाजियाबाद से लेकर गोरखपुर तक सुनी जा रही है। इसका नतीजा यह है कि जो विपक्ष राजनीतिक लड़ाई से बाहर था, अब तेजी से तमाम सीटों पर कड़ी चुनौती पेश कर रहा है।
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कहां-कहां बढ़ रही है बड़ी चुनौती?
राय बरेली को साधने के लिए गृह मंत्री अमित शाह विधायक मनोज पांडे के घर गए थे। राय बरेली के साथ-साथ अमेठी में भी अब भाजपा को कड़ी चुनौती मिल रही है। बेंती के रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया को मनाने की कोशिश की, लेकिन खास सफलता नहीं मिल पाई। नतीजतन कौशांबी, प्रतापगढ़, इलाहाबाद, फूलपुर का गणित डगमगा रहा है। बताते हैं कहीं ठाकुर नाराज है तो कहीं अंदरखाने में धमाल मचा हुआ है। इलाहाबाद में नंद गोपाल गुप्ता नंदी भी नाराज़ हैं। यही स्थिति अब चंदौली में देखने को मिल रही है। मछली शहर में कड़ा मुकाबला है, तो जौनपुर की लोकसभा सीट पर बसपा प्रत्याशी के बदलने, धनंजय सिंह द्वारा भाजपा के प्रत्याशी कृपाशंकर सिंह को समर्थन देने के बाद भी मामला पटरी पर नहीं आया है।
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जौनपुर में कृपाशंकर सिंह को धनंजय सिंह की पत्नी के चुनाव न लडऩे का फायदा जरूर मिल रहा है, लेकिन इसके साथ-साथ साइंलेट वोटर्स की नाराजगी उन्हें तंग कर सकती है। भाजपा के टिकट पर जौनपुर से विधायक का चुनाव लड़ चुके सूत्र का कहना है कि मुंबई वाले नेता कृपाशंकर सिंह जम गए तो यहां के जमीनी कार्यकर्ता और नेता का क्या होगा?  जौनपुर के बगल में आजमगढ़ है। यहां से सपा के धर्मेंद्र यादव चुनाव लड़ रहे हैं। आजमगढ़, सलेमपुर, गाजीपुर, घोसी में भी एनडीए को कांटे की टक्कर झेलनी पड़ रही है। ओमप्रकाश राजभर के बेटे अनिल राजभर छड़ी चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक ने अनिल राजभर से अगड़ी जाति के लोगों से माफी भी मंगवाई, लेकिन मामला बनता कम दिखाई दे रहा है।

कौन कौन से मुद्दे अटका रहे हैं भाजपा की सांसें?  
उत्तर प्रदेश में घूम रहे दर्जन भर से अधिक पत्रकार मित्र, तमाम दलों के नेता और चुनाव सर्वेक्षण एजेंसियों के सूत्र बताते हैं कि इसमें सबसे असरदार कारण ठाकुर मतदाताओं की नाराजगी रही, जो पश्चिम उत्तर प्रदेश से शुरू हुई थी और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व भी इसके दबाव में आ गया। लेकिन देरी से आया। 


ठाकुर मतदाताओं के मन में अरविंद केजरीवाल की ये बात ठहर गई है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सितंबर 2024 में हटाया जा सकता है, यह दावा गाजियाबाद से ले कर गोरखपुर तक चुपचाप जगह बनाए है। दूसरा बड़ा असरदार मुद्दा मायावती की अपने भतीजे आकाश आनंद पर कार्रवाई और अपने उम्मीदवारों को बदलना रहा। बताते हैं कि सबसे ज्यादा प्रत्याशी समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने बदले। कई सीट पर तीन-तीन बार बदले, लेकिन समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल है। इसलिए उस पर इसका असर नहीं पड़ा। बसपा के इस तरह के प्रयास का संदेश भाजपा के पक्ष में खड़ा होने का चला गया। इसके कारण अल्पसंख्यक समेत तमाम मतदाता रणनीतिक निर्णय लेते दिखाई दे रहे हैं। तीसरा बड़ा कारण, उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के पूरी तरह जातिगत मुद्दे पर चले जाने, सपा और अखिलेश के उम्मीदवारों के चयन में चतुराई का रहा।

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