फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
Hindi News ›   Education ›   What is Single Use Plastic and how is it affecting people and earth

क्या है सिंगल यूज प्लास्टिक? जानें वर्तमान में कैसी है स्थिति

Sun, 22 Sep 2019 10:25 AM IST
Garima Garg एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: Garima Garg Updated Sun, 22 Sep 2019 10:25 AM IST
विज्ञापन
What is Single Use Plastic and how is it affecting people and earth
plastic

प्लास्टिक कई सालों से पर्यावरण के लिये नासूर बन रहा है। प्लास्टिक और पॉलीथीन की वजह से न केवल ये दुनिया बल्कि पानी और हवा में भी जहर घुल गया है। लेकिन अब प्लास्टिक के केमिकल से होने वाले दुष्प्रभाव से बचने के लिए दुनिया के कई देश प्लास्टिक और पॉलीथीन पर बैन लगा चुके हैं। बता दें कि दशकों पहले लोगों की सुविधा के लिए प्लास्टिक का आविष्कार किया गया थी। पर उस वक्त नहीं पता था कि ये पर्यावरण के लिए ही नासूर बन जाएगा। हाल के दिनों में मीठे और खारे दोनों प्रकार के पानी में मौजूद जलीय जीवों में प्लास्टिक के केमिकल से होने वाले दुष्प्रभाव नजर आने लगे हैं। इसके बावजूद प्लास्टिक और पॉलीथीन की बिक्री में कोई कमी नहीं आई है।

विज्ञापन


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर प्लास्टिक और उससे बनने वाले कचरे के नुकसान के बारे में देशवासियों को बताया। उन्होंने सिंगल टाइम यूज प्लास्टिक (एक बार उपयोग किया जाने वाला) का उपयोग बंद करने की बात कही। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि हमारे देश में कितना प्लास्टिक कचरा निकलता है। देश-दुनिया में प्लास्टिक की क्या स्थिति है। प्लास्टिक का कितना कचरा जमा है और कितना खपाया जा चुका है।
विज्ञापन


वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में सालाना 56 लाख टन प्लास्टिक का कूड़ा बनता है। दुनियाभर में जितना कूड़ा हर साल समुद्र में बहा दिया जाता है उसका 60 प्रतिशत हिस्सा भारत डालता है। प्रत्येक भारतीय रोजाना 15000 टन प्लास्टिक को कचरे के रूप में फेंक देते हैं। प्लास्टिक प्रदूषण के कारण पानी में रहने वाले करोड़ों जीव-जंतुओं की मौत हो जाती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


अपनी इस खबर में हम आपको प्लास्टिक के इतिहास की तरफ ले जा रहे हैं...

प्लास्टिक की शुरुआत-

भारत में प्लास्टिक का प्रवेश 60 के दशक में हुआ था। आज इसको लेकर अजीब-सा विवाद बना हुआ है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यह पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरनाक है लेकिन इसके पक्षधरों का दावा है कि यह 'इको फ्रेंडली' यानी पारिस्थितिकी संगत है क्योंकि यह लकड़ी और कागज का उत्तम विकल्प है। वास्तव में देखा जाए तो प्लास्टिक अपने उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक सभी अवस्थाओं में पर्यावरण और समूचे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरनाक है। इसका निर्माण पेट्रोलियम से प्राप्त रसायनों से होता है। इसलिए पर्यावरणविदों का मानना है कि प्लास्टिक से निकली हुई जहरीली गैस स्वास्थ्य के लिए एक अन्य खतरा है। इसके उत्पादन के दौरान व्यर्थ पदार्थ निकलकर जल स्रोतों में मिलकर जल प्रदूषण का कारण बनते हैं। इसके अलावा गौरतलब तथ्य यह भी है कि इसका उत्पादन ज्यादातर लघु उद्योग क्षेत्र में होता है जहां गुणवत्ता नियमों का पालन नहीं हो पाता।

क्या आप प्लास्टिक प्रदूषण के बारे में जानते हैं ये जरूरी बातें?

  • प्लास्टिक की उत्पत्ति सेलूलोज डेरिवेटिव में हुई थी। प्रथम सिंथेटिक प्लास्टिक को बेकेलाइट कहा गया और इसे जीवाश्म ईंधन से निकाला गया था।
  • फेंकी हुई प्लास्टिक धीरे-धीरे अपघटित होती है एवं इसके रसायन आसपास के परिवेश में घुलने लगते हैं। यह समय के साथ और छोटे-छोटे घटकों में टूटती जाती है और हमारी खाद्य श्रृंखला में प्रवेश करती है।
  • यहां यह स्पष्ट करना बहुत आवश्यक है कि प्लास्टिक की बोतलें ही केवल समस्या नहीं हैं, बल्कि प्लास्टिक के कुछ छोटे रूप भी हैं, जिन्हें माइक्रोबिड्स कहा जाता है। ये बेहद खतरनाक तत्त्व होते हैं। इनका आकार 5 मिलीमीटर से अधिक नहीं होता है।
  • इनका इस्तेमाल सौंदर्य उत्पादों तथा अन्य क्षेत्रों में किया जाता है। ये खतरनाक रसायनों को अवशोषित करते हैं। जब पक्षी एवं मछलियां इनका सेवन करती हैं तो यह उनके शरीर में चले जाते हैं।
  • भारतीय मानक ब्यूरो ने हाल ही में जैव रूप से अपघटित न होने वाले माइक्रोबिड्स को उपभोक्ता उत्पादों में उपयोग के लिये असुरक्षित बताया है।
  • अधिकांशतः प्लास्टिक का जैविक क्षरण नहीं होता है। यही कारण है कि वर्तमान में उत्पन्न किया गया प्लास्टिक कचरा सैकड़ों-हजारों साल तक पर्यावरण में मौजूद रहेगा। ऐसे में इसके उत्पादन और निस्तारण के विषय में गंभीरतापूर्वक विचार-विमर्श किए जाने की आवश्यकता है।

वर्तमान स्थिति की बात करें तो- 

  • स्थिति यह है कि वर्तमान समय में प्रत्येक वर्ष तकरीबन 15 हजार टन प्लास्टिक का उपयोग किया जा रहा है। प्रतिवर्ष हम इतनी अधिक मात्रा में एक ऐसा पदार्थ इकठ्ठा कर रहे हैं जिसके निस्तारण का हमारे पास कोई विकल्प मौजूद नहीं है।
  • यही कारण है कि आज के समय में जहां देखो प्लास्टिक एवं इससे निर्मित पदार्थों का ढेर देखने को मिल जाता है।
  • पहले तो यह ढेर धरती तक ही सीमित था लेकिन अब यह नदियों से लेकर समुद्र तक हर जगह नजर आने लगा है। धरती पर रहने वाले जीव-जंतुओं से लेकर समुद्री जीव भी हर दिन प्लास्टिक निगलने को विवश है।
  • इसके कारण प्रत्येक वर्ष तकरीबन एक लाख से अधिक जलीय जीवों की मृत्यु होती है।
  • समुद्र के प्रति मील वर्ग में लगभग 46 हजार प्लास्टिक के टुकड़े पाए जाते हैं।
  • इतना ही नहीं हर साल प्लास्टिक बैग का निर्माण करने में लगभग 4.3 अरब गैलन कच्चे तेल का इस्तेमाल होता है।

ये भी पढ़ें- बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ: उच्च शिक्षा में रिकॉर्ड साढ़े सात लाख अधिक लड़कियों ने लिया दाखिला

विज्ञापन
विज्ञापन

सबसे विश्वसनीय Hindi News वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें शिक्षा समाचार आदि से संबंधित ब्रेकिंग अपडेट।

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed