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यूनेस्को की रिपोर्ट: भारत के गांवों में 100 लड़कों पर 59 लड़कियां ही 12वीं पास, क्या है सबसे बड़ी वजह?

Sat, 10 Oct 2026 04:05 AM IST
निर्मल कांत अमर उजाला रिसर्च, पेरिस/नई दिल्ली।
अमर उजाला रिसर्च, पेरिस/नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Sat, 10 Oct 2026 04:05 AM IST
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unesco report rural india girls education gender inequality
Girl Student demo - फोटो : AI Generated
शिक्षा में लैंगिक समानता को लेकर यूनेस्को की तरफ से जारी की गई रिपोर्ट में भारत को लेकर एक बड़ी चिंता सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शहरी क्षेत्रों ने तो लड़के और लड़कियों की पढ़ाई पूरी करने के मामले में लगभग पूर्ण समानता हासिल कर ली है, लेकिन ग्रामीण भारत में पहुंच और समानता की स्थिति बहुत चिंताजनक है।
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ग्रामीण भारत में उच्च माध्यमिक (कक्षा 11 और 12) स्तर पर 100 लड़कों के मुकाबले केवल 59 लड़कियां ही अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर पाती हैं। ग्रामीण इलाकों में इस असमानता का सबसे बड़ा कारण गरीबी और सामाजिक सुरक्षा की कमी है। यूनेस्को ने जेंडर इक्वैलिटी इन एक्सेस टू एजुकेशन नामक रिपोर्ट शुक्रवार को पेरिस में जारी की। इसके मुताबिक अगर पूरे भारत (ग्रामीण व शहरी) का औसत देखा जाए, तो उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने का अडजस्टेड जेंडर पैरिटी इंडेक्स 0.89 है। इसका मतलब देश के स्तर पर हर 100 लड़कों के मुकाबले 89 लड़कियां 12वीं पास कर पाती हैं।
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बचपन की अनदेखी....सीधे प्राइमरी में पहुंच रहे पांच साल के 51 फीसदी बच्चे 
यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग (जेम-2026) रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 5 साल के आधे से अधिक (51%) बच्चे प्री-स्कूल (आंगनवाड़ी या नर्सरी/केजी) जाने के बजाय सीधे कक्षा 1 (प्राइमरी स्कूल) में दाखिला ले रहे हैं। यूनेस्को ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए कहा है कि बच्चे तय और अनुशंसित उम्र 6 वर्ष से पहले ही स्कूली शिक्षा में प्रवेश कर रहे हैं, जो उनके मानसिक व शैक्षणिक विकास के लिहाज से ठीक नहीं है।     
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25 वर्षों में अपनी शुरुआती कमियों को 65% तक दूर हुईं कमियां : यूनेस्को ने अपनी रिपोर्ट में भारत को स्कूली शिक्षा के अंतर को पाटने के मामले में "फास्ट प्रोग्रेस" श्रेणी वाले देशों में रखा है। इसका कारण यह है कि 2000 में भारत दुनिया के उन 47 देशों में शामिल था, जहां लड़कों की तुलना में लड़कियां सबसे ज्यादा पढ़ाई छोड़ती थीं। भारत ने पिछले 25 वर्षों में अपनी शुरुआती कमियों को 65% या दो-तिहाई से अधिक तक कम कर लिया है। दुनिया के 10 में से 1 से भी कम देशों के शिक्षा बजट में वंचित तबकों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। भारत में भी इस पर काफी काम की जरूरत है। 
 
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कर्नाटक के स्कॉलरशिप मॉडल की तारीफ भारत के कुछ राज्यों में 5 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए प्री-प्राइमरी संस्थानों (जैसे बाल वाटिका या केजी) में नामांकन का स्तर 90% से अधिक है। इसका मतलब है कि इन राज्यों में बच्चे सीधे कक्षा 1 में जाने के बजाय सही तरीके से प्री-स्कूलिंग कर रहे हैं। इसमें कर्नाटक के ग्रामीण इलाकों में स्कॉलरशिप मॉडल की यूनेस्को ने तारीफ भी की है। साथ ही  गुजरात, महाराष्ट्र, केरल व नागालैंड की स्थिति भी अच्छी है। 

दुनिया भर में 5 साल के बच्चों का प्राइमरी स्कूल में दाखिला लेने का औसत 27% है, लेकिन वैश्विक स्तर पर यह औसत सबसे ज्यादा भारत (51%) की वजह से बढ़ा हुआ है। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत कक्षा 1 में दाखिले के लिए बच्चे की न्यूनतम उम्र 6 वर्ष निर्धारित की गई है।

 
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