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Sustainability: सततता अब केवल नारा नहीं, आवश्यकता है... राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कॉरपोरेट्स से की अपील
Mon, 23 Jun 2025 12:25 PM IST
शिवम गर्ग
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: शिवम गर्ग
Updated Mon, 23 Jun 2025 12:25 PM IST
सार
Sustainability 2025: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि अब सततता ई नारा नहीं बल्कि अनिवार्यता बन गई है। कॉरपोरेट्स को मुनाफे के साथ-साथ पर्यावरण की लागत को भी ध्यान में रखना होगा।
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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
Sustainability 2025: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने सोमवार (23 जून) को स्पष्ट रूप से कहा कि "सततता (Sustainability) अब केवल एक नारा नहीं रह गया है, यह समय की आवश्यकता बन चुकी है।" वह यह बात द इंस्टीट्यूट ऑफ कॉस्ट अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया के 12वें नेशनल स्टूडेंट्स कॉन्वोकेशन 2025 कार्यक्रम के दौरान कह रही थीं।
उन्होंने जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट की ओर इशारा करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में कॉरपोरेट संगठनों का केवल लाभ कमाने का लक्ष्य अब अप्रासंगिक होता जा रहा है। अब समय आ गया है कि कंपनियां पर्यावरणीय लागत को भी अपनी योजनाओं और कार्यों में शामिल करें।
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उन्होंने जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट की ओर इशारा करते हुए कहा कि मौजूदा दौर में कॉरपोरेट संगठनों का केवल लाभ कमाने का लक्ष्य अब अप्रासंगिक होता जा रहा है। अब समय आ गया है कि कंपनियां पर्यावरणीय लागत को भी अपनी योजनाओं और कार्यों में शामिल करें।
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"कॉस्ट अकाउंटेंट्स भविष्य में बदलाव ला सकते हैं"
राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि जहां भी आर्थिक योजना की बात आती है, वहां कॉस्ट अकाउंटेंट्स की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। आपकी दक्षता इस धरती के भविष्य को बचाने में बदलाव ला सकती है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अकाउंटिंग और अकाउंटेबिलिटी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
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कॉर्पोरेट्स को अब बदलाव की जरूरत
राष्ट्रपति ने कॉर्पोरेट्स को चेताते हुए कहा कि उन्हें केवल प्रॉफिट-ओरिएंटेड अप्रोच से आगे बढ़कर अब इको-फ्रेंडली सोच को अपनाना होगा। पर्यावरणीय जिम्मेदारी अब एक वैकल्पिक विकल्प नहीं, बल्कि बिजनेस एथिक्स का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है।अब सिर्फ मुनाफा नहीं, पर्यावरण का भी ख्याल जरूरी
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए कहा कि गांधी जी हमेशा पैसों और संसाधनों का सोच-समझकर इस्तेमाल करते थे। उन्होंने बताया कि गांधी जी ने सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में एक कानूनी मामले में हिस्सा लिया था, जो पैसों से जुड़े हिसाब-किताब पर आधारित था। इसके बाद भी गांधी जी जब भारत लौटे, तो उन्होंने जिन संगठनों के साथ काम किया, वहां भी पैसों की बचत और ईमानदारी से खर्च करने पर जोर दिया।राष्ट्रपति ने कहा कि गांधी जी के लिए "किफायत" सिर्फ पैसे बचाने की बात नहीं थी, बल्कि वह हर चीज को समझदारी से इस्तेमाल करने के पक्ष में थे - क्योंकि बहुत से संसाधन ऐसे होते हैं जो दोबारा नहीं मिलते।
उन्होंने जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) की बात करते हुए कहा कि अब "सस्टेनेबिलिटी" (यानि टिकाऊ जीवनशैली) सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि ज़रूरत बन गई है। उन्होंने साफ कहा कि अब समय आ गया है जब कंपनियों को सिर्फ मुनाफे के बारे में नहीं सोचना चाहिए, बल्कि उन्हें पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की भी चिंता करनी होगी।
मुर्मू ने कहा कि ऐसे समय में कॉस्ट अकाउंटेंट्स (लागत लेखाकार) अपने हुनर से पर्यावरण को बचाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कहा कि हिसाब-किताब रखने और जवाबदेही (Accountability) का आपस में गहरा रिश्ता होता है।
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