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IIT Bombay: लर्निंग डिसेबिलिटी से पीड़ित छात्र को सुप्रीम कोर्ट से राहत, आईआईटी बॉम्बे को दिए डिग्री देने के आदेश

Mon, 16 May 2022 04:43 PM IST
सुभाष कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: सुभाष कुमार Updated Mon, 16 May 2022 04:43 PM IST
सार

मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अब 1995 के अधिनियम को अब दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 से बदल दिया गया है।

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Supreme Court ordered IIT Bombay to hand over degree to learning disabled student
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : amar ujala

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए आईआईटी बॉम्बे को आदेश जारी किया है कि 'सीखने की अक्षमता' (learning disablity) से पीडित एक छात्र को उसकी डिग्री सौंपने का आदेश जारी किया है। छात्र ने संस्थान से मास्टर इन डिज़ाइन का कोर्स किया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि छात्र ने अपनी डिग्री सफलतापूर्वक पूरी की है। इसलिए उसे उसकी डिग्री सौंपी जाए। 

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जस्टिस उदय उमेश ललित, रवींद्र भट और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बॉम्बे को चार हफ्ते के भीतर अपीलकर्ता नमन वर्मा को उसकी डिग्री और अन्य सभी जरूरी सर्टिफिकेट सौंपने के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने इस मामले में अपनी विशेष शक्ति अनुच्छेद 142 का प्रयोग किया है। कोर्ट ने कहा कि बच्चे के भविष्य को अधर में नहीं छोड़ा जा सकता। बता दें के अनुच्छेद 142 का प्रयोग कोर्ट द्वारा बहुत ही विशेष परिस्थितियों में किया जाता है।  
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सुप्रीम कोर्ट नमन वर्मा नामक छात्र की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। छात्र ने 17 अप्रैल, 2018 को बॉम्बे हाई कोर्ट की ओर से दिए गए फैसले को चुनौती दी थी। छात्र का दावा है कि डिस्कलकुलिया (learning disabilities) से पीड़ित है। छात्र ने साल 2013 में बॉम्बे हाई कोर्ट के समक्ष याचिका दायर कर के मांग की थी कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उसे मास्टर इन डिजाइन के पाठ्यक्रम में प्रवेश दिलाया जाए। कोर्ट के अंतरिम आदेश के आधार पर छात्र को संस्थान में प्रवेश प्राप्त हो गया था। इसके बाद छात्र ने अपनी डिग्री पूरी की। 
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हालांकि, जब मामले के अंतिम निपटारे का समय आया तो विभिन्न मुद्दों पर विचार करने के बाद, बॉम्बे हाईकोर्ट ने विकलांग व्यक्तियों (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 के प्रावधानों के तहत अपीलकर्ता के अधिकार को मान्यता नहीं दी थी। 

बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष यह मुद्दा था कि अपीलकर्ता ने अंतरिम निर्देशों के तहत पाठ्यक्रम पूरा कर लिया है और आगे उसका क्या भाग्य होगा। मामले में उच्च न्यायालय ने कहा था कि हमारा विचार है कि हालांकि याचिकाकर्ता पाठ्यक्रम में सफल घोषित होने का हकदार हो सकता है। अनुच्छेद के तहत आवश्यक शक्तियों के अभाव में हम उसे इस याचिका में कोई और राहत देने में असमर्थ हैं। 


मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अब 1995 के अधिनियम को अब दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 से बदल दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि हम उच्च न्यायालय हालांकि हम कानून के मुद्दों पर उच्च न्यायालय द्वारा उठाए गए विचार की पुष्टि करते हैं, जो उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित किए जाने के लिए आया था। हम इस इस तथ्य पर विचार करते हुए कि अपीलकर्ता ने पाठ्यक्रम पूरा कर लिया है, हम उनकी उम्मीदवारी को रद्द करने के लिए राजी नहीं हैं ताकि जिससे उनकी योग्यता खतरे में पड़े। 

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