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SC: आईआईटी-आईआईएम में आत्महत्याओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, सख्त नियम बनाने का दिया आश्वासन

Fri, 28 Feb 2025 09:25 PM IST
आकाश कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: आकाश कुमार Updated Fri, 28 Feb 2025 09:25 PM IST
सार

Supreme Court: पिछले 14 महीनों में आईआईटी और आईआईएम में 18 आत्महत्याएं हुई, जिनमें जातिगत भेदभाव की भूमिका बताई गई। सुप्रीम कोर्ट ने आईआईटी और आईआईएम में आत्महत्याओं को "अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण" बताते हुए इसे रोकने के लिए मजबूत तंत्र का आश्वासन दिया।
 

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Supreme Court Concerned Over Suicides in IITs-IIMs, Directs Strict Rules to Prevent Discrimination
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : ANI

विस्तार

Suicides In IIT & IIM: शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने आईआईटी और आईआईएम में हो रही आत्महत्या की घटनाओं को "अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण" बताया और इन मामलों को रोकने के लिए और उनकी जांच के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित करने का आश्वासन दिया।

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पिछले 14 महीनों में 18 आत्महत्याएं

न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह की पीठ को वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने जानकारी दी कि पिछले 14 महीनों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) में 18 आत्महत्याएं हुई हैं।

कोर्ट ने कहा, "यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है जो हो रहा है। हम इस स्थिति को रोकने के लिए एक मजबूत तंत्र बनाएंगे और इस मुद्दे को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाएंगे।"

जाति आधारित भेदभाव का सामना करने के बाद कथित रूप से आत्महत्या करने वाले छात्रों रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं की ओर से पेश जयसिंह ने कहा कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों ने अदालत के आदेश के बावजूद अपने परिसरों में होने वाली आत्महत्याओं पर संपूर्ण डेटा नहीं दिया है।

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के पीएचडी विद्वान रोहित वेमुला की मृत्यु 17 जनवरी, 2016 को हुई थी। वहीं, टीएन टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज की छात्रा पायल तड़वी की मृत्यु 22 मई, 2019 को हुई थी, जब वह अपने कॉलेज के तीन डॉक्टरों द्वारा कथित भेदभाव का शिकार हुई थी।

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने मसौदा विनियम तैयार किए हैं, जो याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाई गई चिंताओं को संबोधित करते हैं। ये मसौदे यूजीसी की वेबसाइट पर सार्वजनिक सुझावों और आपत्तियों के लिए डाले गए हैं।

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मसौदा विनियमों पर सुझाव देने का दिया निर्देश

जयसिंह ने कोर्ट को बताया कि 40% विश्वविद्यालय और 80% कॉलेजों ने अपने परिसरों में समान अवसर प्रकोष्ठ (Equal Opportunity Cells) स्थापित नहीं किए हैं। इस पर कोर्ट ने जयसिंह और अन्य वकीलों से मसौदा विनियमों पर सुझाव देने को कहा और यूजीसी को इन सुझावों पर विचार करने का निर्देश दिया।

जयसिंह ने अदालत से विनियमों को अंतिम रूप देने से पहले एक सुनवाई की मांग की, लेकिन मेहता ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्तिगत सुनवाई की अनुमति दी गई, तो हर कोई इसकी मांग करेगा। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि किसी को सुझाव देना हो तो वह वेबसाइट के माध्यम से दे सकता है, लेकिन व्यक्तिगत सुनवाई संभव नहीं होगी।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की चिंता को उचित बताते हुए आश्वासन दिया कि इस मुद्दे को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाएगा। इस मामले की अगली सुनवाई आठ सप्ताह बाद होगी।

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कोर्ट ने मांगा यूजीसी से डेटा

3 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को संवेदनशील मानते हुए शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव से निपटने के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित करने की बात कही थी।

कोर्ट ने यूजीसी को निर्देश दिया कि वह ऐसे मसौदा विनियम अधिसूचित करे, जिससे केंद्र, राज्य, निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव न हो। इसके अलावा, यूजीसी को यह डेटा भी प्रस्तुत करने के लिए कहा गया कि कितने संस्थानों ने यूजीसी (उच्च शैक्षणिक संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम) 2012 के अनुपालन में समान अवसर प्रकोष्ठ स्थापित किए हैं।

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि 2004 से अब तक, आईआईटी और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में 50 से अधिक छात्रों (मुख्य रूप से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग से) ने जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या की है।

20 सितंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया था। इस याचिका में मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से समानता के अधिकार, जातिगत भेदभाव के निषेध के अधिकार, और जीवन के अधिकार को लागू करने की मांग की गई थी।

याचिका में देशभर के उच्च शिक्षण संस्थानों में व्यापक जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया गया और केंद्र एवं यूजीसी को 2012 के नियमों को सख्ती से लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई।

याचिका में परिसरों में समान अवसर प्रकोष्ठ स्थापित करने की मांग की गई, जिसमें एससी/एसटी प्रतिनिधियों, गैर सरकारी संगठनों या सामाजिक क्षेत्र के व्यक्तियों को शामिल किया जाए, ताकि निष्पक्षता बनी रहे।

इसके अलावा, सभी विश्वविद्यालयों को निर्देश देने की मांग की गई कि वे जातिगत भेदभाव के कारण किसी छात्र या कर्मचारी के उत्पीड़न पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करें और छात्रों को कैंपस में किसी भी प्रकार की प्रतिकूलता से सुरक्षित रखें।

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