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जानें कौन हैं हैंस क्रिश्चियन ग्रैम, जिन पर गूगल ने बनाया आज का डूडल
Fri, 13 Sep 2019 11:49 AM IST
Garima Garg
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Published by: Garima Garg
Updated Fri, 13 Sep 2019 11:49 AM IST
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google doodle
- फोटो : amar ujala
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गूगल द्वारा बनाया गया डूडल मशहूर माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैंस क्रिश्चियन ग्रैम की याद में समर्पित है। क्रिश्चियन ग्रैम ने माइक्रोबायोलॉजी के ग्राउंडब्रेकिंग खोज की तकनीक का पता लगाया था। इन्हीं की याद में गूगल ने एक खास एनीमेटेड डूडल बनाया है। बता दें कि बैक्टीरिया से जुड़े फैक्ट्स और तकनीक की खोज 1884 में उनके द्वारा की गई थी। आपको बता दें कि क्रिश्चियन ग्रैम ने बैक्टीरिया का पता लगाने वाली खास तकनीक की खोज माइक्रोस्कोप के माध्यम से की थी।
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हैंस क्रिश्चियन ग्रैम के बारे में सबकुछ-
हैंस क्रिश्चियन ग्रैम का जन्म 13 सितंबर 1853 को दानिश(कोपेनहेगन की राजधानी ) में हुआ। उनके करियर की शुरुआत लोकल सिविक अस्पताल में जनरल फिजिशियन के तौर पर हुई।
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इस दिन विकसित हुई ये तकनीक...
1884 में चिकित्सा जगत की ये क्रांतिकारी तकनीक विकसित हुई। बता दें, उन दिनों वे वह बर्लिन के सिटी हॉस्पिटल में काम कर रहे थे और उनके साथ जर्मनी के माइक्रोबायॉलजिस्ट कार्ल फ्रीडलैंडर भी थे। जब ये तकनीक तैयार की गई तो इसका मकसद था फेफड़े के उत्तक के दाग वाले हिस्से में बैक्टीरिया को अधिक दृश्य बनाना।
ऐसे काम करती है यह तकनीक?
बैक्टीरिया के दो समूह ग्रैम पॉजिटिव और ग्रैम नेगेटिव होते हैं। ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया के कारण कई बीमारियों होती हैं और ग्रैम नेगेटिव में ऐसा नहीं हैं, इसमें कुछ प्रजातियां बीमारी फैलाती तो ही हैं लेकिन कुछ बैक्टीरिया द्वारा फैलाए गए रोगों को दूर भी करती हैं।
स्टेनिंग टेक्निक में बैक्टीरिया के नमूने पर वायलट डाई डालकर उसे आयोडीन सलूशन से साफ किया जाता है। जब ये प्रक्रिया समाप्त हो जाती है तो ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया पर्पल कलर के ही रहते हैं जबकि ग्रैम नेगेटिव बैक्टीरिया का कोई रंग(रंगहीन) नहीं रहता है।
क्या है इस तकनीक का फायदा?
इस तकनीक के जरिए डॉक्टर को आसानी से बैक्टीरियल इंफेक्शन का पता चल जाता है। इसके अलावा किस तरह का बैक्टीरिया आपको परेशान कर रहा है, उसका भी पता चल जाता है। जिसके बाद डॉक्टरअसरदार उपचार कर सकते हैं।
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1884 में चिकित्सा जगत की ये क्रांतिकारी तकनीक विकसित हुई। बता दें, उन दिनों वे वह बर्लिन के सिटी हॉस्पिटल में काम कर रहे थे और उनके साथ जर्मनी के माइक्रोबायॉलजिस्ट कार्ल फ्रीडलैंडर भी थे। जब ये तकनीक तैयार की गई तो इसका मकसद था फेफड़े के उत्तक के दाग वाले हिस्से में बैक्टीरिया को अधिक दृश्य बनाना।
ऐसे काम करती है यह तकनीक?
बैक्टीरिया के दो समूह ग्रैम पॉजिटिव और ग्रैम नेगेटिव होते हैं। ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया के कारण कई बीमारियों होती हैं और ग्रैम नेगेटिव में ऐसा नहीं हैं, इसमें कुछ प्रजातियां बीमारी फैलाती तो ही हैं लेकिन कुछ बैक्टीरिया द्वारा फैलाए गए रोगों को दूर भी करती हैं।
स्टेनिंग टेक्निक में बैक्टीरिया के नमूने पर वायलट डाई डालकर उसे आयोडीन सलूशन से साफ किया जाता है। जब ये प्रक्रिया समाप्त हो जाती है तो ग्रैम पॉजिटिव बैक्टीरिया पर्पल कलर के ही रहते हैं जबकि ग्रैम नेगेटिव बैक्टीरिया का कोई रंग(रंगहीन) नहीं रहता है।
क्या है इस तकनीक का फायदा?
इस तकनीक के जरिए डॉक्टर को आसानी से बैक्टीरियल इंफेक्शन का पता चल जाता है। इसके अलावा किस तरह का बैक्टीरिया आपको परेशान कर रहा है, उसका भी पता चल जाता है। जिसके बाद डॉक्टरअसरदार उपचार कर सकते हैं।
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