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भारत सरकार के 16 लाख के प्रोजेक्ट पर कार्य करेंगे जीएलए के शिक्षक
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
Updated Tue, 03 Apr 2018 05:06 PM IST
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क्षीरसागर और तालाब में वर्षों से भरे पानी से आचमन व स्नान से फैलने वाली बीमारियों के बारे में जानने के लिए जीएलए विश्वविद्यालय, मथुरा के बायोटैक्नोलाॅजी के दो शिक्षकों को भारत सरकार के ‘डिपार्टमेंट आॅफ आयोटैक्नोलाॅजी‘ नई दिल्ली से रिसर्च प्रोजेक्ट पर कार्य करने का अवसर प्रदान किया गया है। इस प्रोजेक्ट में 16 लाख रूपये के बजट का प्रावधान है।
प्रो. नितिन वाही और आदित्य सक्सेना ने बताया कि क्षीर सागर और तालाबों में वर्षों से जमे हुए पानी के कारण एलगी (काई) जम जाती है। इसमें तमाम ऐसे जीवाणु होते हैं जो गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। ऐसे जीवाणुओं की खोज करने के लिए कार्य किया जायेगा। ये जीवाणु श्रद्धालुओं के आचमन और स्नान करने से गभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।
उन्होंने बताया कि भारत सरकार के ‘डिपार्टमेंट आॅफ बायोटैक्नोलाॅजी’ नई दिल्ली एवं प्रकाश लैब स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की सहभागिता द्वारा आयोजित शोध प्रोजेक्ट के अन्तर्गत 16 लाख की धनराशि का प्रोजेक्ट आवंटित किया गया है। इसका उद्देश्य एक नई तकनीक पर आधारित है। इस प्रोजेक्ट का शुभारम्भ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यूएसए में आयोजित इण्डो-यूस स्टार्टअप कनैक्ट 2015 में किया था।
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इस प्रोजेक्ट में हमारा ध्येय मथुरा क्षेत्र में पायी जाने वाली एलगी द्वारा फैली बीमारियों की रजिस्ट्री तैयार करना है। जो कि भारत सरकार के ‘डिपार्टमेंट आॅफ बायोटैक्नोलाॅजी‘ नई दिल्ली को सौंप दी जायेगी। इसके बाद विभाग खुद तय करेगा कि क्या किया जाय जिससे लम्बे समय तक पानी भरे रहने पर बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं पर अकुंश लगाया जा सके।
नितिन वाही जो कि एल्गल बायोफ्यूल के क्षेत्र में बायोटैक्नोलाॅजी के विभागाध्यक्ष प्रो. ए.के. भाटिया के अंतर्गत पीएचडी हेतु कार्य अनुसंधानरत हैं व एलगी की एक नई प्रजाति की खोज कर चुके हैं। डीन रिसर्च प्रो. अनिरूद्ध प्रधान ने बताया कि जीएलए विश्वविद्यालय शोध के क्षेत्र में नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है जिसका कारण विश्व विद्यालय प्रशासन द्धारा प्रदत्त शोध सुविधाओं का विस्तारण है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दुर्ग सिंह चैहान, प्रतिकुलपति प्रो. आनंद मोहन अग्रवाल, निदेशक प्रो. अनूप कुमार गुप्ता एवं विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार भाटिया तथा विभागीय शिक्षकों ने नितिन वाही को बधाई दी और कहा कि शिक्षा एवं शोध एक दूसरे के पूरक हैं।
तीन करोड़ के प्रोजेक्ट पर चल रहा है कार्य
न्यूजैन आईडीसी के मुख्य समन्वयक एवं एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. मनोज चैबे ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने करीब तीन करोड़ की धनराशि तय की है, जिसमें से कुछ धनराशि जारी हो गई है। इस प्रोजेक्ट को बीटेक, बीबीए, एमबीए, एमटेक, बीसीए, डिप्लोमा इंजीनियरिंग के छात्रों द्वारा तैयार किया जा रहा है। इससे पहले छात्रों को प्रोजेक्ट को तैयार करने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा छात्रों को जरूरतमंद पहलुओं से अवगत कराया गया है।
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प्रो. नितिन वाही और आदित्य सक्सेना ने बताया कि क्षीर सागर और तालाबों में वर्षों से जमे हुए पानी के कारण एलगी (काई) जम जाती है। इसमें तमाम ऐसे जीवाणु होते हैं जो गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। ऐसे जीवाणुओं की खोज करने के लिए कार्य किया जायेगा। ये जीवाणु श्रद्धालुओं के आचमन और स्नान करने से गभीर बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।
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उन्होंने बताया कि भारत सरकार के ‘डिपार्टमेंट आॅफ बायोटैक्नोलाॅजी’ नई दिल्ली एवं प्रकाश लैब स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय की सहभागिता द्वारा आयोजित शोध प्रोजेक्ट के अन्तर्गत 16 लाख की धनराशि का प्रोजेक्ट आवंटित किया गया है। इसका उद्देश्य एक नई तकनीक पर आधारित है। इस प्रोजेक्ट का शुभारम्भ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यूएसए में आयोजित इण्डो-यूस स्टार्टअप कनैक्ट 2015 में किया था।
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इस प्रोजेक्ट में हमारा ध्येय मथुरा क्षेत्र में पायी जाने वाली एलगी द्वारा फैली बीमारियों की रजिस्ट्री तैयार करना है। जो कि भारत सरकार के ‘डिपार्टमेंट आॅफ बायोटैक्नोलाॅजी‘ नई दिल्ली को सौंप दी जायेगी। इसके बाद विभाग खुद तय करेगा कि क्या किया जाय जिससे लम्बे समय तक पानी भरे रहने पर बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं पर अकुंश लगाया जा सके।
नितिन वाही जो कि एल्गल बायोफ्यूल के क्षेत्र में बायोटैक्नोलाॅजी के विभागाध्यक्ष प्रो. ए.के. भाटिया के अंतर्गत पीएचडी हेतु कार्य अनुसंधानरत हैं व एलगी की एक नई प्रजाति की खोज कर चुके हैं। डीन रिसर्च प्रो. अनिरूद्ध प्रधान ने बताया कि जीएलए विश्वविद्यालय शोध के क्षेत्र में नित नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है जिसका कारण विश्व विद्यालय प्रशासन द्धारा प्रदत्त शोध सुविधाओं का विस्तारण है।
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दुर्ग सिंह चैहान, प्रतिकुलपति प्रो. आनंद मोहन अग्रवाल, निदेशक प्रो. अनूप कुमार गुप्ता एवं विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक कुमार भाटिया तथा विभागीय शिक्षकों ने नितिन वाही को बधाई दी और कहा कि शिक्षा एवं शोध एक दूसरे के पूरक हैं।
तीन करोड़ के प्रोजेक्ट पर चल रहा है कार्य
न्यूजैन आईडीसी के मुख्य समन्वयक एवं एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. मनोज चैबे ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने करीब तीन करोड़ की धनराशि तय की है, जिसमें से कुछ धनराशि जारी हो गई है। इस प्रोजेक्ट को बीटेक, बीबीए, एमबीए, एमटेक, बीसीए, डिप्लोमा इंजीनियरिंग के छात्रों द्वारा तैयार किया जा रहा है। इससे पहले छात्रों को प्रोजेक्ट को तैयार करने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा छात्रों को जरूरतमंद पहलुओं से अवगत कराया गया है।
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