{"_id":"6576fc06db165db5320bfbb7","slug":"the-visual-language-of-marketing-has-been-changing-in-every-decade-arvind-joshi-safalta-2023-12-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"Safalta Talk Master Class : हर दशक में बदलती रही है मार्केटिंग की विजुअल लैंग्गुएज : अरविंद जोशी","category":{"title":"Career Plus","title_hn":"करियर प्लस","slug":"career-plus"}}
Safalta Talk Master Class : हर दशक में बदलती रही है मार्केटिंग की विजुअल लैंग्गुएज : अरविंद जोशी
Mon, 11 Dec 2023 05:47 PM IST
Pushpendra Mishra
Media Solution Initiative
Media Solution Initiative
Published by: Pushpendra Mishra
Updated Mon, 11 Dec 2023 05:47 PM IST
सार
Master Class Topic: Visual Language In Marketing, Guest Arvind Joshi, Founder Adgini, Delhi Chronicles and White Lotus Comms
विज्ञापन
SAFALTA TALKS Master Class Session On Visual language In Marketing
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
सफलता.कॉम द्वारा विजुअल लैंग्गुएज इन मार्केटिंग विषय पर आयोजित किये गए मास्टर क्लास सेशन में एडजिनी फाउंडर अरविंद जोशी ने कहा कि अक्सर जब हम विजुअल कम्युनिकेशन की बात करते हैं तो हम टेक्स्ट और विजुअल को दो भागों में बांट देते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि टेक्स्ट विजुअल का ही एक पार्ट है आप ऑडियो और विजुअल को दो भागों में बांट सकते हैं। क्योंकि जो सारी प्रथाएं विजुअल के ऊपर लागू होती हैं वहीं सारी प्रथाएं टेक्स्ट के ऊपर भी लागू होती हैं। लेकिन ऑडियो की अपनी अलग प्रथाएं हैं। उन्होंने कहा जैसे हम किसी को एक विजुअल दिखाते हैं इतनी दूरी से कि आप उसमें लिखे टेक्स्ट को पढ़ नहीं पा रहे लेकिन देख पा रहे हैं। तो आप उसे देखकर ये जरूर बता सकते हैं कि सामने जो लाइन्स लिखी हैं वह हिंदी में हैं या रोमन में हैं, रशियन में हैं या बंगाली भाषा में हैं। इससे ये पता चलता कि जो टेक्स्ट फॉर्म में एड लिखा है उसे पढ़ने से पहले आप उसे देखते ही उसकी एक पोजिशनिंग कर लेते हैं। कि ये है क्या ? ये उसी तरह है जैसे हम किसी इंसान से बात करने से पहले ये तय करते हैं कि ये अमीर है या गरीब है। फ्रेंडली दिख रहा है, बोलचाल में ठीक होगा बगैरह बगैरह। या उसके बोलने के अनुसार आप अपनी पोजिशनिंग चेंज कर लेते हैं या वैसा ही होता है जैसा आपने पहले से सोच लिया था।
ये भी पढ़ें
डिजिटल मार्केटिंग ई बुक
विज्ञापन
ये भी सीखें
डिजिटल मार्केटिंग
मास्टर डिजिटल मार्केटिंग
अपनी नॉलेज परखें
डिजिटल मार्केटिंग मॉक टेस्ट
विज्ञापन
ये भी पढ़ें
डिजिटल मार्केटिंग ई बुक
90 के दशक में ब्रांड हिदी में टाइल और इंग्लिश में लिखते थे टैग लाइन
उन्होंने कहा कि दशक पर दशक विजुअल लैंग्गुएज की बात करें तो 90s के दशक में पेप्सी का जो एड बना था। उसमें रोमन में लिखा था ये दिल मांगे मोर, कारगिल की वजह से ये और मशहूर हो गया था। कई ब्रांड्स इंडिया में फिल्मों के नाम हिंदी में पर टैग लाइन इंग्लिश में डालते डालने का रिवाज था। उस समय के ब्रांड अपना नाम हिंदी में और टैगलाइन को रोमन में इस्तेमाल करते थे। इसका कारण देश में हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं की राजनीति भी है और दोनों भाषाओं का क्लास के साथ भी एक संबंध है। अगर आप मिडिल क्लास लोअर क्लास के हैं तो हिंदी या रोमन और अगर आप अपर क्लास के हैं तो अंग्रेजी। क्योंकि अंग्रेजी पॉवर की भाषा है। वहीं हिंदी भाव की भाषा है मासेज को कम्युनिकेट करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही भाषा का देश की आर्थिक शक्ति के साथ भी संबंध है। साथ ही भाषा आपकी सामाजिक स्थिति से भी जुड़ी हुई है।
विज्ञापन
हिंदी अंग्रेजी के बजाया डेढ़ गुना ज्यादा स्पेस लेती है
इसीलिए आजतक ब्रांड्स के एड में अंग्रेजी और हिंदी का बैलेंस इस्तेमाल होता आ रहा है। अंग्रेजी हिंदी के बजाय कम स्पेस लेता है। वहीं हिंदी अंग्रेजी से ज्यादा स्पेस लेती है। अक्षरों के ऊपर और नीचे तक मात्राएं जाती हैं। अंग्रेजी से ये डेढ़ से 2 गुना ज्यादा स्पेस लेती है। उन्होंने कहा इसी तरह एड पर लिखी विजुअल लैंग्गुएज को तो लोग समझते हैं लेकिन विजुअल एड की साइंस को लोग नहीं समझते। हां इतना जरूर है कि विजुअल एड का इस्तेमाल हर कोई कर रहा है।
विज्ञापन
ये भी सीखें
डिजिटल मार्केटिंग
मास्टर डिजिटल मार्केटिंग
हर दशक में दो तरह की एड विजुअल प्रथाएं चलती हैं
एड की दशक दर दशक पहचान बदली जैसे 60 के दशक में जितने भी बॉलीवुड हीरो (राजकपूर, देव आनंद या बलराज साहनी) थे वो सलीके से बाल बनाते थे और कपड़े भी सलीके से पहनते थे। तो ये उस जमाने का ट्रेंड था। तो इसी तरह हर दशक में दो तरह की प्रथाएं एड में चलती रहीं। एक वो जिसमें ब्रांड्स मार्केटिंग में बनी बनाई प्रथा को फॉलो करते थे और दूसरा वो जिसमें उस प्रथा के विपरीत कुछ ब्रांड्स अपनी मार्केटिंग करते हैं। जैसे हर दशक में एक हवा ऐसी चलती है जिसमें नए ट्रेंड्स सेट होते हैं और समाज पुराने ट्रेंड्स को छोड़कर उन नए ट्रेंड्स की ओर चलने लगता है।लंबे बाल, चश्मा या कपड़ों का स्टायल हर चीज बयां करती है अलग पहचान
जैसे 60s, 70s के बाद 80s, 90s के दशक में हीरो के कपड़े और स्टाइल बदलते गए। नब्बे के दशक में लंबे बाल वाले अभिनेता पसंद किये जाने लगे। पेंट में बेल बॉटम का चलन बढ़ा। साथ ही चश्में का प्रयोग भी एक आइडेंटिटी के लिये किया जाने लगा। जैसे हम फिल्म में अमिताभ बच्चन जब चश्मा पहनता था तो सीधा साधा आदमी और जब उतार देता था तो एंग्री यंगमैन फाइट करने वाला। इसी तरह रब ने बना दी जोड़ी में शाहरूख खान चश्में में सीधे साधे हैं और बिना चश्में के एकदम अलग अंदाज में।अपनी नॉलेज परखें
डिजिटल मार्केटिंग मॉक टेस्ट
कमेंट
कमेंट X