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AI: हाथ से लिखने का युग खत्म, डिजिटल निर्भरता ने बच्चों की सोचने की क्षमता को बदल दिया; जानिए कैसे हुआ बदलाव
Mon, 13 Oct 2025 04:33 AM IST
शिवम गर्ग
अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क
Published by: शिवम गर्ग
Updated Mon, 13 Oct 2025 04:33 AM IST
सार
Handwriting Decline in Children: डिजिटल युग में बच्चे टाइपिंग और स्क्रीन पर निर्भर हो गए हैं। हाथ से लिखने की आदत घटने से सोचने और तर्क क्षमता प्रभावित हो रही है। पढ़ें विशेषज्ञों की रिपोर्ट...
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Adobe Stock
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विस्तार
Digital Learning Impact: एक समय था जब चाक, पेंसिल और इंक पेन बच्चों की कल्पना को आकार देते थे। अब वही बच्चे अंगुलियों से स्क्रीन पर स्क्रॉल कर रहे हैं, सोचने से पहले सर्च कर रहे हैं और लिखने की जगह टाइप कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या डिजिटल दुनिया बच्चों का दिमाग तेज बना रही है या उसे पूर्वनिर्मित बुद्धि (प्री फैब्रिकेटेड इंटेलिजेंस) की दिशा में धकेल रही है।
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ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी दिल्ली) के संयुक्त अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि पिछले दस वर्षों में बच्चों के हैंडराइटिंग-टू-थिंकिंग लिंक में लगभग 40% की कमी आई है। यह वह जैविक संबंध है जिसके तहत हाथ से लिखने की क्रिया मस्तिष्क के फ्रंटल कॉर्टेक्स और हिप्पोकैम्पस क्षेत्रों को सक्रिय करती है। यही वे क्षेत्र हैं जो स्मृति, रचनात्मकता और तर्कशक्ति के लिए जिम्मेदार होते हैं।
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रीडिंग का औसत समय 72% घटा
आईआईटी दिल्ली के न्यूरोकॉग्निटिव साइंस विभाग की प्रोफेसर डॉ. मीरा वशिष्ठ कहती हैं, लिखना केवल भाषा नहीं, एक शारीरिक अनुभव भी है। जब बच्चे हाथ से अक्षर बनाते हैं तो वे शब्द के विचार से जुड़ते हैं। लेकिन जब वही शब्द टाइप किया जाता है तो मस्तिष्क उसे इनपुट कमांड की तरह लेता है, विचार की तरह कतई नहीं लेता। फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए विश्लेषण द वैनिशिंग लाइब्रेरी माइंड में पाया गया है कि 12 से 18 वर्ष की आयु के छात्रों में डीप रीडिंग का औसत समय 72% घट गया है।
जहां पहले छात्र एक विषय पर औसतन 27 मिनट तक एकाग्र रहते थे, वहीं अब डिजिटल स्रोतों पर यह समय घटकर 4.5 मिनट रह गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इंटरनेट पर बच्चों की सूचना तक पहुंच बढ़ी है, लेकिन विचार की गहराई (कॉग्निटिव डेप्थ) कम हुई है। बच्चे अब तथ्यों को संग्रह या शोध नहीं करते, बल्कि खोजने पर निर्भर हो गए हैं। यानी ज्ञान अब याद रखने की बजाय तुरंत मिलने वाली सुविधा बन गया है।
आईआईटी दिल्ली के न्यूरोकॉग्निटिव साइंस विभाग की प्रोफेसर डॉ. मीरा वशिष्ठ कहती हैं, लिखना केवल भाषा नहीं, एक शारीरिक अनुभव भी है। जब बच्चे हाथ से अक्षर बनाते हैं तो वे शब्द के विचार से जुड़ते हैं। लेकिन जब वही शब्द टाइप किया जाता है तो मस्तिष्क उसे इनपुट कमांड की तरह लेता है, विचार की तरह कतई नहीं लेता। फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार युनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए विश्लेषण द वैनिशिंग लाइब्रेरी माइंड में पाया गया है कि 12 से 18 वर्ष की आयु के छात्रों में डीप रीडिंग का औसत समय 72% घट गया है।
जहां पहले छात्र एक विषय पर औसतन 27 मिनट तक एकाग्र रहते थे, वहीं अब डिजिटल स्रोतों पर यह समय घटकर 4.5 मिनट रह गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इंटरनेट पर बच्चों की सूचना तक पहुंच बढ़ी है, लेकिन विचार की गहराई (कॉग्निटिव डेप्थ) कम हुई है। बच्चे अब तथ्यों को संग्रह या शोध नहीं करते, बल्कि खोजने पर निर्भर हो गए हैं। यानी ज्ञान अब याद रखने की बजाय तुरंत मिलने वाली सुविधा बन गया है।
जीवन के व्यवहारिक कौशल पर गहरा असर
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट प्रोफेसर मार्क हेस्किन्स के अनुसार बच्चों की कॉन्शियस थिंकिंग कैपेसिटी यानी सचेत रूप से सोचने और निर्णय लेने की क्षमता में गिरावट का मतलब केवल अकादमिक कमजोरी नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन-कौशलों का क्षरण भी है। वे कहते हैं जब मस्तिष्क लगातार बाहरी स्रोतों जैसे गूगल या एआई पर निर्भर हो जाता है तो वह वास्तविक जीवन में समस्याओं को ‘महसूस’ करने की बजाय ‘सॉल्व करने का कमांड’ ढूंढने लगता है। इससे आत्म-निर्णय, सहानुभूति और धैर्य जैसे व्यवहारिक गुण कमजोर पड़ते हैं।
इसी संदर्भ में अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की 2024 की रिपोर्ट द कॉग्निटिव कास्ट्स आफ डिजिटल डिपेंडेंट बताती है कि 13 से 18 वर्ष के छात्रों में समस्या-समाधान (प्रोब्लम सॉल्विंग) और भावनात्मक विनियमन (इमोशनल रेगुलेशन) की क्षमता 28% तक घट गई है। इसका परिणाम यह हुआ कि बच्चे तर्क या अनुभव से सीखने की बजाय इंस्टेंट रिजल्ट की आदत डाल लेते हैं। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की डॉ. रश्मि नायर के शब्दों में डिजिटल माध्यम ने बच्चों को अधिक सूचित बना दिया है, लेकिन कम अनुभवी। वे सब जानते हैं पर जीवन के छोटे फैसले जैसे दोस्ती निभाना, असफलता झेलना या आत्मविश्वास से बोलना अब उतने सहज नहीं रहे।डिजिटल निर्भरता ने बच्चों को ज्ञान की दृष्टि से तेज और सुविधाभोगी बनाया है, परंतु व्यवहारिक जीवन में वे अधिक अस्थिर, असहिष्णु और आत्म-निर्भरता से दूर होते जा रहे हैं। यानी सोचने से पहले क्लिक करना अब उनका स्वभाव बन चुका है।
दिमाग को नहीं मिली नई दिशा
रिपोर्ट के अनुसार एमआईटी मीडिया लैब की एक ताजा रिपोर्ट द आउटसोर्स्ड ब्रेन बताती है कि एआई प्लेटफार्म्स जैसे चैटजीपीटी का इस्तेमाल करने वाले 14 से 22 वर्ष के छात्रों में प्राकृतिक तर्क कौशल (नेचुरल रीजनिंग एबिलिटी) में 22% की गिरावट आई है। लेकिन वहीं सिंथेटिक इंटेलिजेंस यानी पहले से तैयार जानकारी को जोड़ने, मिलाने और प्रस्तुत करने की क्षमता में वृद्धि देखी गई है। एमआईटी के न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जोनाथन बेल्स कहते हैं, हम एक नए प्रकार के दिमाग देख रहे हैं, ऐसा दिमाग जो जानता है ‘कहां से खोजें’, पर शायद यह नहीं जानता कि ‘क्यों सोचें।’
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट प्रोफेसर मार्क हेस्किन्स के अनुसार बच्चों की कॉन्शियस थिंकिंग कैपेसिटी यानी सचेत रूप से सोचने और निर्णय लेने की क्षमता में गिरावट का मतलब केवल अकादमिक कमजोरी नहीं बल्कि व्यावहारिक जीवन-कौशलों का क्षरण भी है। वे कहते हैं जब मस्तिष्क लगातार बाहरी स्रोतों जैसे गूगल या एआई पर निर्भर हो जाता है तो वह वास्तविक जीवन में समस्याओं को ‘महसूस’ करने की बजाय ‘सॉल्व करने का कमांड’ ढूंढने लगता है। इससे आत्म-निर्णय, सहानुभूति और धैर्य जैसे व्यवहारिक गुण कमजोर पड़ते हैं।
इसी संदर्भ में अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की 2024 की रिपोर्ट द कॉग्निटिव कास्ट्स आफ डिजिटल डिपेंडेंट बताती है कि 13 से 18 वर्ष के छात्रों में समस्या-समाधान (प्रोब्लम सॉल्विंग) और भावनात्मक विनियमन (इमोशनल रेगुलेशन) की क्षमता 28% तक घट गई है। इसका परिणाम यह हुआ कि बच्चे तर्क या अनुभव से सीखने की बजाय इंस्टेंट रिजल्ट की आदत डाल लेते हैं। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की डॉ. रश्मि नायर के शब्दों में डिजिटल माध्यम ने बच्चों को अधिक सूचित बना दिया है, लेकिन कम अनुभवी। वे सब जानते हैं पर जीवन के छोटे फैसले जैसे दोस्ती निभाना, असफलता झेलना या आत्मविश्वास से बोलना अब उतने सहज नहीं रहे।डिजिटल निर्भरता ने बच्चों को ज्ञान की दृष्टि से तेज और सुविधाभोगी बनाया है, परंतु व्यवहारिक जीवन में वे अधिक अस्थिर, असहिष्णु और आत्म-निर्भरता से दूर होते जा रहे हैं। यानी सोचने से पहले क्लिक करना अब उनका स्वभाव बन चुका है।
दिमाग को नहीं मिली नई दिशा
रिपोर्ट के अनुसार एमआईटी मीडिया लैब की एक ताजा रिपोर्ट द आउटसोर्स्ड ब्रेन बताती है कि एआई प्लेटफार्म्स जैसे चैटजीपीटी का इस्तेमाल करने वाले 14 से 22 वर्ष के छात्रों में प्राकृतिक तर्क कौशल (नेचुरल रीजनिंग एबिलिटी) में 22% की गिरावट आई है। लेकिन वहीं सिंथेटिक इंटेलिजेंस यानी पहले से तैयार जानकारी को जोड़ने, मिलाने और प्रस्तुत करने की क्षमता में वृद्धि देखी गई है। एमआईटी के न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. जोनाथन बेल्स कहते हैं, हम एक नए प्रकार के दिमाग देख रहे हैं, ऐसा दिमाग जो जानता है ‘कहां से खोजें’, पर शायद यह नहीं जानता कि ‘क्यों सोचें।’
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