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Study: एआई बेहतर, पर चिकित्सा शिक्षा में पाठ्यक्रमों का अभाव, भारत समेत 48 देशों ने माना तकनीक से हो रही आसानी

Thu, 21 Dec 2023 07:22 AM IST
यशोधन शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: यशोधन शर्मा Updated Thu, 21 Dec 2023 07:22 AM IST
सार

शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनिया भर में एआई और स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर गतिविधियां काफी तेजी से चल रही हैं। ऐसे में अगले पांच या 10 वर्ष की कल्पना करें तो स्वास्थ्य के अधिकांश विकल्प इस तकनीक पर आधारित होंगे।

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AI better but lack of courses in medical education
Generative AI - फोटो : iStock

विस्तार

भारत सहित 48 देशों के चिकित्सा छात्रों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में तेजी से बढ़ती कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) तकनीक को बेहतर बताया है। साथ ही चिंता जताई कि चिकित्सा शिक्षा में इसके पाठ्यक्रमों का अभाव है। जर्मनी के सात विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल कॉलेजों के चिकित्सा छात्रों से बातचीत के बाद अध्ययन किया है, जिसे मेडरेक्सिव जर्नल में प्रकाशित किया गया है। भारत से दिल्ली और केरल के करीब 900 चिकित्सा छात्रों ने इसमें हिस्सा लिया है।

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यूनिवर्सिटी बर्लिन और हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी जू बर्लिन के प्रो. डैनियल ट्रुहन के अनुसार, इस साल अप्रैल से अक्तूबर के बीच 48 देशों के 192 मेडिकल कॉलेजों के 4,313 चिकित्सा छात्र, 205 दंतचिकित्सा छात्र और पशु चिकित्सा के 78 छात्रों ने अपने विचार साझा किए हैं। सर्वे में 67.6% (3,091) छात्रों ने स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई इस्तेमाल को बेहतर बताया है, लेकिन 76.1% (3,474) छात्रों का कहना है कि एआई से जुड़े पाठ्यक्रम उनकी शिक्षा में शामिल नहीं है। कई छात्रों ने एआई को लेकर अपना ज्ञान काफी सीमित बताया है। 57.9% (2,652) छात्रों ने भविष्य में बतौर करियर एआई को अपर्याप्त बताया।
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चिकित्सा शिक्षा में एआई पर जोर दें देश
शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनिया भर में एआई और स्वास्थ्य क्षेत्र को लेकर गतिविधियां काफी तेजी से चल रही हैं। ऐसे में अगले पांच या 10 वर्ष की कल्पना करें तो स्वास्थ्य के अधिकांश विकल्प इस तकनीक पर आधारित होंगे। इसलिए सभी देशों को चिकित्सा शिक्षा में एआई पर जोर देना चाहिए और एमबीबीएस एवं पीजी छात्रों के लिए अलग से एआई पाठ्यक्रम संचालित करने चाहिए।
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भारत के लिए अहम है सर्वे
भारत में 2018 से अब तक एआई तकनीक पर कुल व्यय में करीब 109 फीसदी की बढ़त हुई है। यह अब 5,522 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इससे जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 तक भारत में व्यय 97,820 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है जो 2035 में भारत की अर्थव्यवस्था में एक ट्रिलियन यानी करीब 83 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का योगदान देगा।

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