ये भी हैं योद्धा : समाज के अंधेरे कोनों में जलाई है ज्ञान की मशाल, नजर कल के भारत पर
- जुनून और जज्बे से सही मायनों में फैला रहे आजादी का उजियारा
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देश को स्वतंत्रता 1947 में ही मिल गई थी, लेकिन अभी भी कई मायनों में देश को पूरी तरह से आजादी नहीं मिली है। इसकी वजह समाज का वह तबका है जो शिक्षा से समझौता कर पैरों में असुविधाओं की बेड़ियां पहनकर रहने को मजबूर हैं और आज भी सही मायने में अपनी आजादी का इंतजार कर रहा है। समाज के इस तबके को आजादी दिलाने का बीड़ा उठाया है दिल्ली के कुछ ऐसे लोगों ने जिन्होंने अपने जज्बे और जुनून से उन लोगों के सामने मिसाल कायम कर दी है जो आगे बढ़कर समाज में शिक्षा का उजियारा फैलाना चाहते हैं। इस स्वतंत्रता दिवस पर अमर उजाला सलाम करता है ऐसे वीरों को और पेश कर रहा है इनकी जज्बे कहानी....
लाल किले में चलती है थान सिंह की क्लास
एतिहासिक विरासत को समेटे हुए लाल किला यहां आने वाले हजार पर्यटकों को अपनी कला और बनावट से आकर्षित करता है। लेकिन, यह सिर्फ अपनी बनावट के लिए नहीं जाना जाता है बल्कि थान सिंह की पाठशाला भी यहां का मशहूर पता है। इस पाठशाला में प्रतिदिन नन्हें बच्चे प्रतिदिन कोरे कागज पर भविष्य को आकार दे रहे हैं। बच्चों के भविष्य को आकार देने का बीड़ा उठाया है दिल्ली पुलिस के जवान थान सिंह ने। जो पिछले पांच सालों से अपने वेतन के एक हिस्से से बच्चों में शिक्षा का उजियारा फैलाने में मदद कर रहे हैं।
थान सिंह ने बताया कि लाल किला में निर्माण कार्य की वजह से मजदूरों का आना होता है और वे यहां काफी लंबे समय तक रहते हैं। ऐसे में उनके बच्चे इधर-उधर घूमकर कूड़ा उठाने से लेकर अन्य काम करते हैं। इससे यहां आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों पर देश की छवि को लेकर अच्छा संदेश नहीं जाता है। यही वजह है कि वर्ष 2016 में उन्होंने दो-चार बच्चों से अपनी पाठशाला शुरू की।वर्तमान में थान सिंह की पाठशाला में 40 बच्चे शिक्षा ले रहे हैं। इसके लिए उन्होंने एक शिक्षक को भी नियुक्त किया है।
यहां सिर्फ न उन्हें किताबी ज्ञान दिया जाता है बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। थान सिंह बताते हैं कि इसके लिए उन्हें अपने वरिष्ठ अधिकारियों को भी सहयोग मिल रहा है जो उनके इस प्रयास को सार्थक बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह खुद बचपन में गरीबी में रह चुके हैं। इसलिए गरीबी में होने वाली परेशानियों को अच्छी तरह समझते हैं। यही वजह है कि ऐसे तबके के लिए उनके दिल में हमेशा के लिए जगह बनी हुई है।
11 सालों से बच्चों को सिखा रहे हैं संगीत व नृत्य की कला
दिल्ली में तीन लोगों का समूह ऐसा भी है जो पिछले 11 सालों से संगीत से लेकर नृत्य के गुण सिखा रहे हैं। पेशे से वकील देविका, फोटोग्राफर श्रेय और साउंड इंजीनियर ललित बच्चों के भविष्य को संवार रहे हैं। वर्तमान में कुछ बच्चे मल्टीनेशनल कंपनी से लेकर अन्य कंपनी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। देविका ने बताया कि वह कॉलेज के समय से स्लम में पहुंच बच्चों को पढ़ाने के लिए जाती थी।
वहीं, ललित और श्रेय भी बच्चों को संगीत सीखाने के लिए पहुंचते थे। तब से तीनों मिलकर रिदम ऑफ लाइफ की स्थापना की और बच्चों के भविष्य को संवारने की ठानी। वर्तमान में इनकी पाठशाला में 500 से अधिक बच्चे शिक्षा ले रहे हैं। बच्चों को शिक्षा के अलावा मंचन, संगीत, अंग्रेजी भाषा, मैथ्स व साइंस को प्रायोगिक विषयों के साथ अध्ययन कराया जाता है। यही नहीं बच्चों के अभिभावकों व अन्य लोगों टेलरिंग से लेकर कढ़ाई का काम सीखाया जाता है। देविका ने बताया कि हाल ही में बच्चों के समूह में से 12वीं कक्षा के एक बच्ची ने 92 फीसदी अंक भी हासिल किए हैं।
एक हजार से अधिक बच्चों में उजियारा फैला रही शिक्षा की बस
दिल्ली में तेजस एशिया समूह बसों के माध्यम से स्लम के बच्चों में शिक्षा पहुंचा रहे हैं। इसके लिए दिल्ली की अलग-अलग सात जगहों पर बसों से पहुंच बच्चों को शिक्षा के साथ पोषण के लिए खाना भी दिया जा रहा है। वर्तामान में समूह की ओर से एक हजार से अधिक वंचित बच्चों की मदद की जा रही है। इनके लिए प्रतिदिन समूह की बसें स्लम क्षेत्रों में पहुंच बसों को प्राथमिक शिक्षा का ज्ञान दे रही है। तेजस एशिया के संस्थापक मार्लो फिलीप के मुताबिक, मर्सी मोबाइल क्लीनिक के माध्यम से 30 से अधिक समुदायों में अपनी सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं। अगले दो वर्षों में तेजस का दो हजार बच्चों तक शिक्षा व खाना पहुंचाने का लक्ष्य है।