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Delhi News: तीन साल डूसू पर मजबूत रखी पकड़, एबीवीपी ने जीता मैदान

Sat, 23 Sep 2023 09:56 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sat, 23 Sep 2023 09:56 PM IST
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Kept a strong hold on DUSU for three years, ABVP won the field
जातिगत समीकरण हावी होने के कारण हाथ से गई एक सीट
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इस सीट पर प्रत्याशियों के बीच रिश्तेदारी ने भी निभाई भूमिका

एनएसयूआई की एक सीट पर जीत संजीवनी का काम करेगी


रश्मि शर्मा

नई दिल्ली। छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी की दिल्ली विश्वविद्यालय में तीन साल की मजबूत पकड़ ने डूसू का किला फतह करा दिया। उपाध्यक्ष पद पर यदि जातिगत समीकरण, रिश्तेदारी व लोकप्रियता हावी नहीं होती, तो यह सीट भी एबीवीपी के खाते में जाती। इस सीट पर ही मतों का सबसे कम अंतर है। वहीं, एनएसयूआई को मिली एक सीट पर जीत उसके लिए संजीवनी का काम करेगी, क्योंकि उपाध्यक्ष पद वर्ष 2017 के बाद मिला है।
कोरोना महामारी के कारण डूसू के चुनाव वर्ष 2019 के बाद हुए हैं। इस कारण से करीब तीन साल तक एबीवीपी के अध्यक्ष अक्षित दहिया ही बने रहे। तीन साल तक उनके इस पद पर बने रहने का लाभ एबीवीपी को मिला, क्योंकि महामारी के बाद कॉलेज खुलने पर छात्रों ने एबीवीपी के उस समय जीते प्रत्याशियों को ही देखा। कोविड के दौरान एबीवीपी ने खूब काम किया। तीन साल में एबीवीपी छात्रों के बीच ही रहा और छात्रों के लिए कई प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए। इसका लाभ उन्हें तीन पदों पर जीत में मिला।
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वहीं, छात्राओं के लिए अलग से वूमेनिफेस्टो जारी किया। इसके साथ ही छात्रों से जुड़े मुद्दों को ही उठाया। वहीं कुछ जगह पर वह राष्ट्रवाद से जुड़े मुद्दों को भुनाने में कामयाब रहा। छात्रों की नब्ज को भांपते हुए उसी तरह से काम किए। एबीवीपी के खाते में उपाध्यक्ष पद की सीट चली जाती तो संगठन चारों सीट पर कब्जा कर लेता। संगठन इस सीट पर वोटरों की थाह लेने में गच्चा खा गया। अगर इस सीट पर संगठन के आड़े जातिगत समीकरण नहीं आते तो यह सीट एबीवीपी को मिल सकती थी। दरअसल इस सीट पर एनएसयूआई ने भी जाट समुदाय से अभि दहिया को उतारा था, जबकि एबीवीपी ने भी जाट के सामने जाट के समुदाय के सुशांत धनखड़ को सामने किया था।
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यह दोनों प्रत्याशी आपस में रिश्तेदार हैं, लेकिन लोकप्रियता के मामले में अभि दहिया आगे निकल गए। सत्र की शुरुआत से ही उन्होंने अपना प्रचार शुरू कर दिया था, उन्हें इसका लाभ मिला। वहीं जहां तक एनएसयूआई की बात है तो अध्यक्ष पद पर कड़ी टक्कर दी, लेकिन एबीवीपी को हुई पैनल वोटिंग का उन्हें नुकसान हुआ। वहीं टिकट बंटवारे से कई लोग नाराज थे इसलिए संगठन के लोग भी कैंपस में नहीं दिखाई दिए। शशांक शर्मा का टिकट कटने से एनएसयूआई के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष नाराज थे। इस कारण से वह कम ही दिखाई दिए। कम वोटिंग का नुकसान भी एनएसयूआई को उठाना पड़ा।
दरअसल ऐसा माना जाता है कि जब भी 43 फीसदी से अधिक वोटिंग होती है तब एनएसयूआई जीत हासिल करने में कामयाब रहती है। वहीं एनएसयूआई का गणित नोटा बटन ने भी बिगाड़ा। अगर इतनी बड़ी संख्या में नोटा बटन नहीं दबता तो कयास लगाए जा रहे हैं कि इसमें से काफी वोट एनएसयूआई के पास आ सकते थे। वहीं एनएसयूआई के कुछ वोट आइसा के कारण भी कटे।




तीन चुनावों का डूसू ने ट्रेंड रखा कायम
डूसू चुनावों में तीन साल का ट्रेड कायम रहा। इस दौरान तीन पदों पर एबीवीपी और एक पर एनएसयूआई काबिज रही है। 2018 में एबीवीपी का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व सहसचिव का पद मिला था, जबकि 2019 में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व सहसचिव का पद जीता। इस बार भी तीन सीटों पर एबीवीपी काबिज रखने में कामयाब रहा। इससे पहले 2017 में मुकाबला दो-दो का बराबर रहा था। एनएसयूआई ने अध्यक्ष व उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल की थी।
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