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इतिहास के पन्ने: कड़कड़डूमा सबसे पहले बना पूर्वी दिल्ली का हिस्सा, 5200 बीघे का था रकबा
Tue, 27 Jul 2021 06:49 AM IST
Vikas Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Vikas Kumar
Updated Tue, 27 Jul 2021 06:49 AM IST
सार
कड़कड़डूमा गांव के लोग यमुना के किनारे गेहूं, बाजरा, ज्वार की जबरदस्त खेती करते थे। सब्जियां भी उगाते थे और शाहदरा के बाजार में ले जाकर बेचा करते थे।
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1810 में बना कुलदेवी का मंदिर
- फोटो : amar ujala
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विस्तार
यमुनापार दिल्ली विस्तार के दौरान कड़कड़डूमा गांव को सबसे पहले पूर्वी दिल्ली के रूप में पहचान मिली। 1959 में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले से इस गांव को दिल्ली के लिए सबसे पहले अधिग्रहित किया गया। दिल्ली के इस सबसे बड़े क्षेत्रफल वाले गांव का 5200 बीघे का रकबा था। 1980 तक सरकार ने गांव की करीब 5000 बीघा जमीन अधिग्रहित कर ली। गांव वालों के पास अपने घर के अलावा एक धुर जमीन भी नहीं बची। इसका नतीजा यह हुआ कि आबादी बढ़ने के कारण आज यह गांव 15 संकरी गलियों वाले गांव में तब्दील हो गया है।
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करीब 600 साल पुराना यमुना किनारे बसा यह गांव राजपूतों का था। हरियाणा के रोहतक से पंवार और राठौर यहां आए थे। गांव के प्रधान नवल सिंह बताते हैं कि केवल चार परिवार यमुना किनारे जंगलों में आकर बसे थे। बाद में इनकी पीढ़ियों बढ़ी और कड़कड़डूमा गांव बना। मौजूदा समय राजपूतों के अलावा गांव में दो-तीन अनुसूचित जातियां भी बस गई हैं। करीब 200 बीघे में 800 घर होंगे, जिनमें करीब 10 हजार की आबादी रहती है।
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50 पैसे प्रति गज में इनकी जमीनें ले ली गईं
कड़कड़डूमा गांव के बुजुर्गों को आज भी इसका मलाल है कि उनकी 5000 बीघा जमीनें सरकार ने सबसे सस्ते रेट में हथिया ली। नवल सिंह ने कागजात दिखाए कि सरकार ने 50 पैसे से 4 रुपये प्रति गज के हिसाब से लोगों की जमीने ले ली। जमीनों के पैसे भी किस्तों में दिए। कई लोग जो कम पढ़े लिखे थे, उनको उनकी जमीनों की पूरी कीमत भी नहीं मिली।
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यमुना किनारे होती थी जबरदस्त खेती
कड़कड़डूमा गांव के लोग यमुना के किनारे गेहूं, बाजरा, ज्वार की जबरदस्त खेती करते थे। सब्जियां भी उगाते थे और शाहदरा के बाजार में ले जाकर बेचा करते थे। गांव के खेत आज के आनंद विहार बस अड्डे से लेकर विवेक विहार तक थे। लेकिन जमीनें हाथ से निकल जाने के बाद लोग रोजी-रोटी को मोहताज हो गए थे।
यमुनापार शाहदरा बड़ा स्थानीय बाजार था
यमुनापार शाहदरा सबसे बड़ा स्थानीय बाजार था। गांव के कंवर सिंह राठौर ने बताया कि चिल्ला, दल्लूपुरा, गाजीपुर, खिचड़ीपुर, मंडावली, फाजलपुर जैसे गांवों के किसान बैलगाड़ी पर सब्जियां और दूसरी फसलें लादकर कड़कड़डूमा गांव के रास्ते से शाहदरा बाजार जाते थे। अब गांव की गलियों में चार पहिया वाहन लेकर जाना चुनौती है।
बोरोजगारी की मार झेल रहे युवा
मौजूदा समय कड़कड़डूमा गांव की ये स्थिति है कि पुराने कास्तकारों के बच्चे जीवनयापन के लिए ई-रिक्शा चला रहे हैं। गांव के गोपाल कृष्ण ने बताया कि अधिकतर युवा बेरोजगार घूम रहे हैं। दिल्ली के सबसे बड़े गांव की स्थिति अच्छी नहीं है। अनगिनत कॉलोनियां और कॉम्पलेक्स बने सबसे पहले कड़कड़डूमा गांव की जमीन पर 1200 घरों की शिक्षक कॉपरेटिव सोसायटी बनी थी। अबतक यहां 27 कॉपरेटिव सोसायटी, कड़कड़डूमा कोर्ट, हेगड़ेवार अस्पताल, निजी अस्पताल, मेट्रो स्टेशन, कड़कड़डूमा कॉम्पलेक्स, राजीव गांधी स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स, सूरजमल पार्क, सीबीडी ग्राउंड बनाए जा चुके हैं। डीडीए और डीएमआरसी मिलकर यहां पर एक बहुमंजिला इमारत और बना रहे हैं।
अपनी जड़ों को आज भी संजोकर रखा है
कड़कड़डूमा गांव तंग गलियों में तब्दील हो चुका है। लेकिन इस गांव ने सन 1810 में बना अपनी कुलदेवी का मंदिर और गांव का प्राचीन कुंआ आज भी सुरक्षित रखा है। गांव में नव विवाहित जोड़े को कुएं और कुलदेवी के दर्शन जरूर कराए जाते हैं।
राजपूताना पहचान को लेकर हैं फिक्रमंद
- यह राजपूतों का गांव है, सरकार ने गांव की जमीनें ले ली और तन्हा छोड़ दिया, जल्द ही गांव के चौक पर सामूहिक सहयोग से महाराणा प्रताप की प्रतिमा लगाएंगे - संजय सिंह
- सरकार ने हमसे जमीने ले ली, खेती-बाड़ी सब हाथ से चली गई, गांव के युवा बेरोजगार हो गए, आज भी यह स्थिति सुधरी नहीं है - नवल सिंह प्रधान
- अगर यहां कोर्ट ना बना होता और मेट्रो नहीं आई होती तो इस गांव को कोई जानता तक नहीं, जबकि इसी गांव की सबसे ज्यादा जमीनें दिल्ली को मिलीं - गोपाल कृष्ण
- कुल देवी के मंदिर के पास गांव की कुछ खाली जमीन है, गांव के बच्चों के लिए, बुजुर्गों के लिए यहां कोई विकास कार्य हो जाता तो ठीक था - कंवर सिंह राठौड़