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दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट खारिज करने की मांग को लेकर याचिका दायर
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नई दिल्ली। संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान हुए दंगों के संदर्भ में दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग (डीएमसी) जैसे विभिन्न गैर न्यायिक निकायों की जांच रिपोर्ट को गैरकानूनी घोषित करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। अदालत ने इस मामले में केंद्र, दिल्ली पुलिस और डीएमसी समेत विभिन्न गैर न्यायेतर निकायों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मुख्य न्यायाधीश न्यायाधीश डीएन पटेल एवं न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ ने दंगों में प्रभावित एक वकील की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह नोटिस जारी किए हैं। दंगों के दौरान याचिकाकर्ता वकील के स्कूल को आग लगा दी गई थी। उत्तर पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी, 2020 को सांप्रदायिक झड़पें हुई थीं और इस दौरान 53 लोगों की मौत हुई थी जबकि दो सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
याचिकाकर्ता ने कहा है कि जब स्कूल को जलाए जाने के संबंध में दर्ज प्राथमिकी पर आरोप पत्र दायर किया जा चुका है, तब गैर न्यायिक निकायों द्वारा दी गई जांच रिपोर्ट सुनवाई की तय प्रक्रिया में हस्तक्षेप होगी। इन रिपोर्टों को सार्वजनिक जगहों से हटाया जाए और यह घोषित किया जाए कि कानून में इनकी कोई अहमियत नहीं है।
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मामले में केंद्र की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क रखा कि डीएमसी एक वैधानिक निकाय है और इसकी रिपोर्ट निचली अदालत द्वारा किसी भी समय मांगी जा सकती है। भले हभ़योजन उस पर भरोसा न करने का फैसला करे। उन्होंने कहा कि आरोपी या पीड़ित रिपोर्ट पर भरोसा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ रिपोर्ट जहां स्वस्थापित निकायों की हैं, डीएमसी एक वैधानिक निकाय है।
डीएमसी की रिपोर्ट में विधानसभा चुनावों के दौरान भाषणों के जरिये कथित तौर पर लोगों को भड़काने के लिए भाजपा के एक नेता की तरफ इशारा किया गया है। डीएमसी की रिपोर्ट पर भाजपा ने आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया था कि दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग भगवा पार्टी के खिलाफ निराधार आरोप लगा रहा है। डीएमसी की 130 पन्नों की रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस पर भी कार्रवाई न करने का आरोप लगाया गया है।
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मुख्य न्यायाधीश न्यायाधीश डीएन पटेल एवं न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की खंडपीठ ने दंगों में प्रभावित एक वकील की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह नोटिस जारी किए हैं। दंगों के दौरान याचिकाकर्ता वकील के स्कूल को आग लगा दी गई थी। उत्तर पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी, 2020 को सांप्रदायिक झड़पें हुई थीं और इस दौरान 53 लोगों की मौत हुई थी जबकि दो सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे।
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याचिकाकर्ता ने कहा है कि जब स्कूल को जलाए जाने के संबंध में दर्ज प्राथमिकी पर आरोप पत्र दायर किया जा चुका है, तब गैर न्यायिक निकायों द्वारा दी गई जांच रिपोर्ट सुनवाई की तय प्रक्रिया में हस्तक्षेप होगी। इन रिपोर्टों को सार्वजनिक जगहों से हटाया जाए और यह घोषित किया जाए कि कानून में इनकी कोई अहमियत नहीं है।
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मामले में केंद्र की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क रखा कि डीएमसी एक वैधानिक निकाय है और इसकी रिपोर्ट निचली अदालत द्वारा किसी भी समय मांगी जा सकती है। भले हभ़योजन उस पर भरोसा न करने का फैसला करे। उन्होंने कहा कि आरोपी या पीड़ित रिपोर्ट पर भरोसा कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ रिपोर्ट जहां स्वस्थापित निकायों की हैं, डीएमसी एक वैधानिक निकाय है।
डीएमसी की रिपोर्ट में विधानसभा चुनावों के दौरान भाषणों के जरिये कथित तौर पर लोगों को भड़काने के लिए भाजपा के एक नेता की तरफ इशारा किया गया है। डीएमसी की रिपोर्ट पर भाजपा ने आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया था कि दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग भगवा पार्टी के खिलाफ निराधार आरोप लगा रहा है। डीएमसी की 130 पन्नों की रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस पर भी कार्रवाई न करने का आरोप लगाया गया है।