दंगों का दर्द: फरिश्ता बनकर पहुंचे थे हाजी बाबू, तब बची थी जैन परिवार के 25 लोगों की जान

Vikas Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vikas Kumar
Updated Wed, 24 Feb 2021 01:35 AM IST
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हाजी बाबू (गोल घेरे में)
हाजी बाबू (गोल घेरे में) - फोटो : amar ujala

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कंपकंपाती और थोड़ा ठहर-ठहरकर हिंसा वाले दिन की कहानी बयां करते हुए राजेश जैन आज भी उस दिन को याद करके सिहर उठ रहे थे। हजारों दंगाईयों की भीड़ बस उनके घर में घुसने को तैयार थी। एक पल तो लगा कि शायद आज उनका परिवार नहीं बचेगा। पथराव और पेट्रोल बम से उनके घर पर हमला होने लगा। अचानक राजेश को अपने पड़ोसी हाजी बाबू उर्फ अब्दुल रशीद का ख्याल आया और उन्होंने उनको कॉल कर ली। हाजी बाबू भी बिना देर किए राजेश के घर पर पहुंच गए। वहां पहुंचते ही बाबू ने भीड़ को हटाया। हालांकि कुछ उपद्रवी मेन रोड पर मौजूद एक ही समुदाय की दुकानों में आग लगाने को तैयार थे, लेकिन बाबू और उनका परिवार भीड़ को वहां से हटाने में कामयाब हो गए। बाबू की जांबाजी का पता चलने पर पुलिस उपायुक्त कार्यालय बुलाकर उप-राज्यपाल अनिल बैजल व पुलिस आयुक्त ने शबाशी दी।
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यमुना विहार रोड, नूरे इलाही में रहने वाले राजेश जैन (51) ने बताया कि उनके तीन भाई राकेश जैन (60) और मांगेराम जैन (68) का परिवार आमने-सामने रहते हैं। इनकी दो गारमेंट और एक किराना की दुकान है। 24 फरवरी को पूरे दिन इलाके में तनाव रहा। अचानक रात को हजारों लोगों की भीड़ ने उपद्रव करना शुरू कर दिया। तीनों ही भाइयों के परिवार और इनके यहां काम करने वाले पांच छह लड़के राजेश के घर में आ गए। उस समय घर में करीब 25 लोग मौजूद थे। घर में राजेश की बूढ़ी मां अतरकली जैन भी मौजूद थी। इस बीच दंगाईयों ने इनके मकान को घेर लिया। बुजुर्ग मां डर की वजह से बेहोश हो गई। परिवार के सभी सदस्यों ने खुद को एक कमरे में कैद कर लिया। इस दौरान घर में पत्थर और पेट्रोल बम गिरने लगे। दरवाजा न टूटने पर दंगाई घर में आग लगाना चाह रहे थे। कॉल करने के चंद ही मिनटों बाद हाजी बाबू वहां पहुंच गए। बाबू के साथ उनका नाबालिग बेटा फहाद भी था।


बाबू ने बताया कि उसने दंगाईयों से कहा कि बेगुनाह को मारोगे तो दोजख में जाओगे। इस बीच कुछ लोग वहां सुरेश सोनी, शेखर शर्मा, राकेश शर्मा व जैन परिवार समेत अन्यों की दुकान में आग लगाने पहुंचे तो बाबू ने उनको वहां से भगाया। इसके बाद बाबू ने तुरंत पुलिस को कॉल की। बाद में देर रात को वहां पर फोर्स पहुंच गई। इस बीच बाबू खुद अपने पूरे परिवार के साथ जैन परिवार की रक्षा में डटे रहे। सभी दुकानदारों का कहना है कि यदि हाजी बाबू न होते तो शायद आज हम सभी सड़क पर आ जाते। नूरे इलाही में पिछले 25-30 सालों से जैन परिवार रहता है। बाकी लोगों की यहां दुकानें हैं, दूसरे इलाकों में रहते हैं। बाबू ने बताया कि 1992 के दंगों भी यहां कुछ नहीं हुआ था। पिछले साल जो कुछ हुआ उसने हम सब का शर्मसार कर दिया। दंगों के बाद जैन परिवार ने मोहल्ला छोड़ने की कोशिश की, लेकिन हाजी बाबू के मिन्नत करने पर परिवार अब यहीं रुक गया है।

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