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Delhi : इलेक्ट्रिकल डिवाइस से लकवाग्रस्त अंगों में आएगी जान, पांच मरीजों पर हुआ परीक्षण

Mon, 12 Dec 2022 06:57 AM IST
दुष्यंत शर्मा राकेश शर्मा, नई दिल्ली
राकेश शर्मा, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 12 Dec 2022 06:57 AM IST
सार

Delhi : मरीजों के लिए इलेक्ट्रिकल डिवाइस तैयार की गई है, जो दिमाग की तरह काम करेगी। इससे निकलने वाली तरंगें लकवाग्रस्त शरीर के निचले अंग को फिर से चलाने का काम करेंगी। इस डिवाइस को प्रोग्रामर की मदद से संचालित किया जाएगा, जो मरीज के पास होगा।

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Delhi : Paralyzed organs will come to life with electrical device
प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

रीढ़ की हड्डी टूटने के बाद मरीज खड़ा होना या फिर चलने की आस खो ही देता है। ऐसे मरीजों को अब निराश होने की जरूरत नहीं है। इन मरीजों के लिए इलेक्ट्रिकल डिवाइस तैयार की गई है, जो दिमाग की तरह काम करेगी। इससे निकलने वाली तरंगें लकवाग्रस्त शरीर के निचले अंग को फिर से चलाने का काम करेंगी। इस डिवाइस को प्रोग्रामर की मदद से संचालित किया जाएगा, जो मरीज के पास होगा।

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स्पाइन के डॉक्टरों ने स्पाइनल एपिड्यूरल इलेक्ट्रिकल स्टिमुलेशन (एसईईएस) डिवाइस को तैयार किया है, जो पहले जानवरों पर इस्तेमाल किया जा रहा था। इससे संबंधित अध्ययन को स्पाइनल कॉर्ड सोसाइटी और इंडियन स्पाइनल इंजरी सेंटर के 22वें अंतर्राष्ट्रीय स्पाइन और स्पाइनल इंजरी काॅन्फ्रेंस में प्रस्तुत किया गया था। इस डिवाइस के संबंध में स्पाइनल कार्ड सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ एचएस छाबड़ा ने बताया कि सर्जरी कर डिवाइस को पेट लगाया जाता है। 
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इस डिवाइस से निकलने वाली कृत्रिम धमनियों को स्पाइनल कॉर्ड से जोड़ा जाता है। इन कृत्रिम धमनियों का दूसरा छोर डिवाइस से होते हुए लकवाग्रस्त शरीर के अंग से जुड़ा होता है। डिवाइस से तरंग मिलने के बाद लकवाग्रस्त अंग पहले की तरह काम करता है। हालांकि यह डिवाइस न्यूरोलॉजिकल रिकवरी में सहायक साबित नहीं हुआ है।
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पांच मरीजों पर हुआ परीक्षण
डॉ. छाबड़ा ने बताया कि दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी टूटे हुए पांच मरीजों पर करीब तीन माह इस डिवाइस का परीक्षण किया गया। परीक्षण के पहले और दूसरे चरण में किए गए नैदानिक परीक्षण में काफी सफलता मिली और मरीज के निचले हिस्से में काफी सुधार देखा गया। इस अध्ययन को इंस्टीट्यूट एथिक्स कमेटी और रिसर्च रिव्यू कमेटी ने मंजूरी दे दी है। साथ ही इसे देश के क्लिनिकल परीक्षण रजिस्ट्री में पंजीकृत किया गया है।

ऐसे काम करता है डिवाइस
शरीर के निचले हिस्से को चलाने के लिए डिवाइस में पहले से प्रोग्राम किया जाता है। इस डिवाइस का कंट्रोलर मरीज के पास होता है। मरीज उक्त प्रोग्रामर को यदि पैर उठाने का निर्देश देता है तो कृत्रिम धमनियों से होते हुए वह संदेश शरीर के निचले हिस्से में जाता है और पैर उठता है। बता दें कि सामान्य व्यक्ति को काम करने का संदेश दिमाग से मिलता है। यह संदेश धमनियों से होते हुए शरीर के निचले हिस्से में जाता है। यहां दिमाग की जगह संदेश डिवाइस से जाता है।


डिवाइस लगाने से पहले होती है मैपिंग
शरीर में डिवाइस लगाने से पहले लकवाग्रस्त शरीर की मैपिंग होती है। इस दौरान देखा जाता है कि लकवाग्रस्त शरीर के उक्त हिस्से में कौन सी मांसपेशियां काम कर सकती हैं। कृत्रिम धमनियों को उन्हीं हिस्सों से जोड़कर उक्त अंग को चलाया जाता है।

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