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Pakistani Hindu Refugee : दिल्ली में पाकिस्तानी शरणार्थियों का खौफ छूटा, लेकिन नहीं जला उम्मीद का दीया

Mon, 24 Oct 2022 06:21 AM IST
दुष्यंत शर्मा दीपक सिंह नेगी, नई दिल्ली
दीपक सिंह नेगी, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 24 Oct 2022 06:21 AM IST
सार

 Delhi News : मजनूं का टीले के नजदीक यमुना के किनारे बसी छोटी सी बस्ती आम झुग्गी सरीखी ही है। यह इलाका 2011 से 2017 के बीच आबाद हुआ। रिहायश यहां की करीब 700 है। दीपावली से पहले तक साफ-सफाई, रंगाई-पोताई भी होती रही लेकिन बाशिंदे यहां के भारतीय नहीं हैं। किसी के पास भारत की नागरिकता नहीं है। सब के सब पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी हैं।

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Delhi News : The woes of Delhi Pakistani refugees are not decreasing
मजनूं का टीला पर डेरा जमाए पाक शरणार्थी महिलाएं... - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मजनूं का टीले के नजदीक यमुना के किनारे बसी छोटी सी बस्ती आम झुग्गी सरीखी ही है। यह इलाका 2011 से 2017 के बीच आबाद हुआ। रिहायश यहां की करीब 700 है। दीपावली से पहले तक साफ-सफाई, रंगाई-पोताई भी होती रही लेकिन बाशिंदे यहां के भारतीय नहीं हैं। किसी के पास भारत की नागरिकता नहीं है। सब के सब पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी हैं।

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पाक में बहुसंख्यकों की प्रताड़ना तोड़ने के लिए अपनी जन्मभूमि, अपने वतन से यह रूखसत हुए थे। सोचा था कि यहां उनके हालात बेहतर हो जाएंगे, लेकिन उम्मीदों का दीया अभी तक नहीं जल सका है। हां, यहां खौफ से मुक्ति उनको जरूर मिली है। त्योहार खौफ के साये से इनका निकल आया है।
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पाकिस्तान से ज्यादा इनकी दिवाली भारत में रोशन होती है। पाकिस्तान की तरह यहां कोई धमकियां देने नहीं आ धमकता। बावजूद पहचान का संकट सालता रहता है।
पंजाब के सिंध प्रांत के प्रधान दयाल दास 2013 में भारत आए थे। वह बताते हैं कि पाकिस्तान में भी घरों की सफाई होती है, लोग दीये जलाते हैं, पूजा करते हैं। लेकिन सब-कुछ घर के भीतर तक ही सीमित रहता है।
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जब से भारत आए हैं, उनके लिए हर दिन दीपावली है। यहां वह सुरक्षित महसूस करते हैं, किसी तरह की बंदिश नहीं है। वहीं, कोमल जब आठ साल की थीं, तो अपने परिवार के साथ पाकिस्तान के हैदराबाद प्रांत दिल्ली पहुंची थीं। अब वह 18 साल की हैं। दीपावली की व्यस्तता से जुड़े सवाल पर वह चहक उठती हैं, त्योहार का आनंद तो यहीं पर है। यहां त्योहार, त्योहार जैसे लगते हैं।

पाकिस्तान में न हम देहरी लांघ पाते थे, न ही हमारे त्योहार। कंवरलाल की कहानी भी जुदा नहीं है। तीन परिवारों के साथ वह 2014 में दिल्ली पहुंचे थे। वह बताते हैँ, दोनों ही देशों में दीपावली एक ही तरीके से मनाते हैं, लेकिन भारत में उत्साह का दायरा बढ़ जाता है। यहां जैसे आतिशबाजी और घरों को रौशन किया जाता है, वैसा पाकिस्तान में नहीं होता है।उधर, थोड़ी देर बाद ही प्रधान दयाल दास पर त्योहारी स्मृतियों पर रोजमर्रा की दुश्वारियां हावी हो जाती हैं। 

परिजनों से मिलने आई फिर जाने का मन नहीं हुआ...
सोना दास कहती हैं कि वह पांच साल पहले परिजनों से मिलने परिवार के साथ टूरिस्ट वीजा पर भारत आई थी। भारत का माहौल देखा तो उनका यहां से जाने का मन ही नहीं किया। भारत आकर उन्हें अनजाने डर से मुक्ति मिलने का एहसास हुआ तो उन्होंने यहीं रहने का मन बना लिया। राधा कहती है कि उनके भाई लोग आज भी पाकिस्तान में रहते हैं। फोन पर कभी कभार ही बात हो पाती है। मिलने का मन तो करता है लेकिन वहां जाना नहीं चाहतीं।

सोना दास के सुर में सुर मिलाते हुए प्रधान दयाल भी कहते हैं कि हमारे डर के साथ-साथ हमारे कई परिजन भी पाकिस्तान में छूट गए हैं। त्योहारों की खुशी तो होती है पर अपनों के साथ न होना हमेशा अखरता है। जब से भारत आए हैं, जिंदगी में सुकून है, हालांकि अपनों से मिलने का मन करता है। लेकिन वहां के हालात के कारण जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं।

लाख दबाव के बावजूद नहीं छोड़ा धर्म...
नीमा (बदला हुआ नाम) ने बताया कि वहां अक्सर हिंदू लोगों को परेशान किया जाता था। उन लोगों को इस्लाम अपनाने का दबाव बनाया जाता था। कई गांवों में युवतियों से जबरन निकाह कर लिया जाता था। बेटियों को लेकर अक्सर चिंता सताती थी लेकिन तमाम दबावों के बावजूद हमने धर्म नहीं छोड़ा। यहां आकर उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें नागरिकता मिल जाएगी लेकिन अब तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठने के कारण उनके हाथ निराशा ही लगी।

बाहर जाने में पहचान छुपाती थी बेटियां...
सोना दास का कहना है कि पाकिस्तान में उनका परिवार खेतीबाड़ी का काम कर परिवार का पालन पोषण करते थे। बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। वहां सबसे ज्यादा चिंता घर की बहू-बेटियों को लेकर रहती है। विवाहिताएं सिंदूर आदि सुहाग का प्रतीक लगाने से बचती हैं। बच्चों के घर आने में देर हो जाती है तो परिवार वाले अनहोनी को लेकर चिंतित हो जाते हैं। बच्चों के बेहतर भविष्य को लेकर भी उन्हें वापस पाकिस्तान जाने का मन नहीं करता है।

दिल्ली में रहते हैं पांच हजार पाकिस्तानी हिंदू शरणार्थी
मजनू का टीला, आदर्श नगर, सिग्नेचर ब्रिज, रोहिणी सेक्टर 11 और रोहिणी सेक्टर 25 में इनकी रिहाइश है। पांचों काॅलोनियों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।   सड़कें, गलियां, नालियां टूटी हैं।  इनकी आबादी करीब 5000 हजार के करीब है।


नागरिकता के रूप में दें दिवाली का तोहफा...
शरणार्थियों का कहना है कि संसद में जब नागरिकता बिल पास हुआ था तो शरणार्थियों में खुशी का माहौल था लेकिन नागरिकता नहीं मिलने से वह ठगा महसूस कर रहे हैं। उनका कहना है सरकार उन्हें दिवाली के तोहफे के रूप में नागरिकता दे तो सभी की खुशी दोगुनी हो जाएगी। 

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