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खास खबरः महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रहे हैं विद्यार्थी, उनमें ही बांटते हैं मुनाफा

Mon, 08 Mar 2021 05:49 AM IST
दुष्यंत शर्मा रश्मि शर्मा, नई दिल्ली
रश्मि शर्मा, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 08 Mar 2021 05:49 AM IST
सार

  • मोतीलाल नेहरू कॉलेज की इनेक्ट्स सोसायटी के छात्र साधारण महिलाओं को बच्चों के डायपर बनाना सिखाते हैं
  • महिलाओं को कच्चा माल खरीद कर दिया, बेचने का काम छात्र करते हैं

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Delhi News : Students are making women self reliant
मोती लाल नेहरू कॉलेज के छात्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली विश्वविद्यालय के मोती लाल नेहरू कॉलेज के छात्र महिलाओं के सशक्तिकरण और आत्मनिर्भर बनाने के महत्व को समझते हुए उन्हें एंटरप्रिन्योर बना रहे हैं। कॉलेज की इनेक्ट्स सोसायटी के बच्चे न केवल उन्हें रोजगार दिलाने में मदद कर रहे हैं बल्कि पर्यावरण के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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दरअसल छात्रों की मदद से महिलाएं बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले पर्यावरण हितैषी डायपर बनाना सीख रही हैं। इन्हें आंगनवाडिय़ों की मदद से आसपास के इलाकों, ग्रामीण इलाकों में बेचा जाता है। इससे होने वाली आय को महिलाओं को ही दिया जाता है।
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मोतीलाल नेहरू कॉलेज की बीकॉम फाइनल की छात्रा व इनेक्ट्स सोसायटी की अध्यक्ष लक्षिता ने बताया कि तीन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। इनमें से एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट है प्रोजेक्ट स्नेह।  इस प्रोजेक्ट के तहत चाणक्य पुरी के आसपास रहने वाली साधारण महिलाओं को कमाई करने के लिए एक रास्ता दिखाया गया है।
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इस प्रोजेक्ट के तहत बच्चों के लिए इस्तेमाल होने वाले डॉयपर कम कीमत पर तैयार कराए जा रहे हैं जिससे कि वह लोगों की जेब पर भारी ना पड़े। कपड़े से बनने वाले यह डायपर इको फ्रैंडली भी है और इसे तैयार करने में लागत भी कम आती है। इसकी कीमत 100 से 250 रुपये तक की है। 

बाजार से जो डायपर खरीदे जाते हैं वह कीमत में भी दुगुने होते हैं। साथ ही वह पर्यावरण के लिहाज से भी ठीक नहीं है। डायपर तैयार करने के लिए महिलाओं को कच्चा माल छात्रों ने ही खरीद कर दिया है जिन्हें विभिन्न इलाकों में छात्र ही जाकर बेचते हैं। छात्रों ने नंवबर 2019 में इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी जो कि फरवरी 2020 तक चला। उसके बाद लॉकडाउन लग जाने के कारण जनवरी से इसे फिर से शुरू किया गया है। 

लक्षिता बताती हैं कि चार महिलाएं इस प्रोजेक्ट से जुड़ी हैं, इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उत्पाद की क्वालिटी से कोई समझौता ना हो। ग्रामीण इलाकों में जाकर इसके फायदे बताते हुए इन्हें बेचा जाता है। वहीं अब आंगनवाड़ी से भी कस्टमर खरीदने आते हैं। अब छात्रों का लक्ष्य इस उत्पाद को मार्केट व केमिस्ट शॉप तक पहुंचाना है। उत्पाद से जो भी मुनाफा होता है उसे महिलाओं में बांट दिया जाता है। लक्षिता कहती हैं कि इस प्रोजेक्ट के तहत हमारा मुख्य फोकस यह है कि साधारण महिलाओं को सशक्त बनाया जा सके।


पालतू कुत्तों की एसेसरीज भी की जा रही हैं तैयार
प्रोजेक्ट परिवर्तन के तहत पालतू कुत्तों के लिए इस्तेमाल होने वाली एसेसरीज भी महिलाएं तैयार करती हैं। जैसे कि कॉलर, चेन, कपड़े व अन्य सामान। इन सामान को शहरी बाजारों में बेचा जाता है, क्योंकि वहां इनकी डिमांड ज्यादा है। जो भी मुनाफा होता है उसे महिलाओं को दिया जाता है। इसी तरह से एक अन्य प्रोजेक्ट देसी के तहत सड़कों पर घूमने वाले कुत्तों का टीकाकरण भी कराया गया है। जिससे कि उनकी संख्या ना बढ़े और उनके काटने से रैबीज जैसी बीमारी किसी को ना होने पाए। 

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