दिल्ली का हाल : अस्पतालों की दहलीज पर सांसों के लिए छटपटाते रोगी और सिसकते परिजन
- न बेड, न ऑक्सीजन, अस्पतालों की दहलीज पर ही दम तोड़ रहे मरीज
- दिल्ली के ज्यादातर अस्पतालों में एक जैसा हाल, दहशत, दुख और लाचारी का माहौल
- जीटीबी और गंगाराम अस्पताल में एक जैसी स्थिति, एक सरकारी तो दूसरा प्राइवेट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बृहस्पतिवार, रात यही कोई 12 बजकर 30 मिनट का वक्त था। जीटीबी अस्पताल का आपातकालीन विभाग और जितने मरीज अंदर उतने ही बाहर। स्ट्रेचर पर पड़े ये मरीज कोरोना संक्रमण के लक्षण ग्रस्त थे। कोई सांस न लेने की वजह से छटपटा रहा था तो कोई कमजोरी की हालत में उल्टा-सीधा ही स्ट्रेचर पर था। यहां ज्यादातर रोगियों को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, लेकिन अंदर न बेड था और न ऑक्सीजन का कोई खाली पॉइंट। डॉक्टर करें भी तो क्या? एक तो पीपीई किट में पसीना-पसीना और ऊपर से मरीजों का कराहना।
धीरे-धीरे हालात इस कदर दिखाई देने लगे कि सांस के लिए अस्पतालों के बाहर तड़पते मरीजों की चीखें कानों से लेकर दिमाग की सभी नसें तक झनझनाहट दे रही थीं। इसी बीच स्ट्रेचर पर लेटी एक महिला की जुबान बाहर आ गई, डॉक्टर, डॉक्टर जल्दी, जल्दी डॉक्टर। इस खौफनाक चीख ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लिया और अंदर से भागता आया डॉक्टर सीधे मरीज की छाती पर लपका। सीपीआर की विधि देने के साथ ही डॉक्टर ने पूरी ताकत लगा दी, लेकिन छाती जोरों से दबाने के बाद भी सांस वापस नहीं आई और महिला की मौत हो गई।
अभी डॉक्टर कुछ कह पाते कि तभी पीछे से आवाज आई, डॉक्टर साहब, डॉक्टर साहब जल्दी आओ। यहां आकर देखा तो एक बुजुर्ग स्ट्रेचर पर आधे नीचे की ओर थे और नब्ज गायब थी। मेरी तरह वहां मौजूद हर व्यक्ति, तीमारदार, मरीज और स्वास्थ्य कर्मचारी यह माहौल देख रहा था, लेकिन अस्पतालों की दहलीज पर दम तोडने वाले इन मरीजों के साथ सभी लाचार थे। एक के बाद एक दो मरीज की मौत का सिलसिला यहीं नहीं थमा। इसके बाद तीन और मरीजों ने आपातकालीन विभाग में दम तोड़ दिया।
हर मौत अलग, लेकिन कहानी बस यही
जीटीबी के साथ साथ गंगाराम अस्पताल का भी दौरा था। यहां शाम से ही ऑक्सीजन न मिलने का हंगामा जो मचा था। जब रात को वहां पहुंचे तो देखा कि अस्पताल के बाहर ऑक्सीजन का टैंकर धीरे-धीरे रिफिल स्टेशन की ओर बढ़ रहा है। पूछने पर ड्राइवर सख्त तेवर के साथ बोला, एक टन है। अभी टैंकर आंखों के सामने से मुड़ा ही था कि अचानक से एक बुजुर्ग के जमीन पर गिरने की आवाज आई। भागते हुए जब एक कार के पास पहुंचे तो वहां बुजुर्ग जमीन पर गिरे पड़े थे। कार का दरवाजा खुला था और अंदर चेहरे पर ऑक्सीजन लगाए एक लड़का मृत था। बेबस बाप के मुंह पर शब्द न थे। किसी भी तरह उन्हें उठाया। जमीन पर पड़े पैसे उन्हें पकड़ाए, बोले- ये कागज के नोट भी मेरे लाड़ले को बचा नहीं पाए।
साहब, 15 अस्पताल में नहीं मिला बेड, थक गया इसलिए यहां रूका
अभी लाचार पिता को सहारे देने के लिए लोग मौजूद थे कि तभी आवाज आई, डॉक्टर साहब, 15 अस्पताल में चक्कर लगा चुका हूं। थक गया था इसलिए मैं यहीं रूक गया, साहब। मुझे लगा यहां आप भर्ती कर लोगे। आप तो प्राइवेट वाले हो, लेकिन मेरी बहन मर गई। मैं इसका जिम्मेवार हूं। मैं कहीं ओर ले गया होता तो यह बच जाती साहब। वहां मौजूद हर शख्स की तरह डॉक्टर भी चुप थे। शब्द न उनके पास थे और न हमारे। लक्ष्मी नगर निवासी ज्योति चौहान की मौत का गवाह हर कोई बना। काश, उस वक्त कोई ऐसी शक्ति होती कि तड़पते शरीर से बिछड़ती आत्मा को पकड़ कर वापस उसके शरीर में डाल देती। खैर अस्पतालों में दहशत, बैचेनी और पीड़ा का यह मंजर पूरी रात चलता रहा।
बत्रा अस्पताल में ऐन वक्त पर पहुंची ऑक्सीजन
राजधानी के बत्रा अस्पताल में शुक्रवार दोपहर अचानक आईसीयू में भर्ती मरीजों के लिए ऑक्सीजन का दबाव कम कर दिया गया। इसका कारण यह था कि अस्पताल में सिर्फ डेढ़ से दो घंटे की ऑक्सीजन बची हुई थी। गंभीर स्थिति को देखते हुए अस्पताल प्रशासन ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद एन वक्त पर अस्पताल में ऑक्सीजन की आपूर्ति की गई।
अस्पताल से मिली जानकारी के मुताबिक, मरीजों की गंभीर हालत को देखते हुए उनके परिजनों को ऑक्सीजन सिलिंडर लाने के लिए कह दिया गया। इस दौरान तीमारदारों में अफरातफरी का माहौल हो गया। सभी अपने मरीज की जान बचाने के लिए सिलिंडर लाने के लिए निकल पड़े। इस दौरान अस्पताल प्रशासन ने तुरंत न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
साथ ही यह मामला सोशल मीडिया पर भी गरमाने लगा। आनन-फानन प्रशासन की ओर से ऑक्सीजन की व्यवस्था की गई। अस्पताल में ऑक्सीजन खत्म होने से थोड़ी देर पहले ही 2.5 मीट्रिक टन की आपूर्ति की गई। इसके बाद मरीजों के परिजनों ने राहत की सांस ली।
अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि अभी जो ऑक्सीजन है वह अगले एक दिन के लिए ही पर्याप्त होगी। उन्हें फिर से ऑक्सीजन की जरूरत होगी। यहां 45 मरीज आईसीयू में हैं। उधर, होली फैमिली अस्पताल में भी दोपहर के समय ऑक्सीजन की कमी हो गई थी। अस्पताल प्रशासन ने किसी तरह ऑक्सीजन की व्यवस्था कर मरीजों की जान बचाई।
सांसों की मोटी कीमत वसूल रहे हैं मुनाफाखोर
कोरोना का प्रकोप झेल रहे दिल्लीवासियों से मुनाफाखोर उनके अपनों की सांसों की मोटी कीमत वसूल रहे हैं। उन्हें खाली ऑक्सीजन सिलिंडर लेकर पांच घंटे तक लाइन में लगना पड़ रहा है। इसके बाद दो से तीन गुना दाम चुकाने के बाद किसी तरह सिलिंडर भरकर मिल जाए तो वह खुद को खुशकिस्मत समझते हुए घर चले जाते हैं।
नारायणा इंडस्ट्रियल एरिया स्थित ऑक्सीजन रीफिलिंग इकाई में कोरोना संक्रमितों के परिजनों और एंबुलेंस के साथ पहुंचे अस्पताल कर्मियों की भीड़ थी। लाइन के पास ही खड़े एक व्यक्ति ने दूसरे से पूछा, कितनी देर से इंतजार कर रहे हो? जवाब मिला, ‘ढाई घंटे।’ मरीज को ऑक्सीजन तुरंत चाहिए तो रकम अधिक खर्च करनी होती है। दो-तीन गुना दाम वसूलकर बाहर से भी ऑक्सीजन की आपूर्ति की जा रही है।
वजीरपुर से छोटा ऑक्सीजन सिलिंडर लेकर पहुंचे एक व्यक्ति ने बताया कि इसे उन्होंने 5500 रुपये में खरीदा है। इसमें फ्लो मीटर और कैन्यूला लगाने में 1500-2000 रुपये का अलग से खर्च आया। उन्होंने कहा कि खाली सिलिंडर नहीं होता तो भरे हुए सिलिंडर के लिए दो-तीन गुना अधिक कीमत वसूली जाती है। अगर आपको जल्दी है तो कई बार इससे भी अधिक कीमत वसूली जा रही है।
ज्यादा लोगों से छोटे ऑक्सीजन सिलिंडर भरवाने के लिए कहा जा रहा है। ऑक्सीजन की किल्लत होने पर बड़े सिलिंडर से गैस छोटे में भरकर अधिक कीमत में बिक्री की जा रही थी। इस पर शिकंजा कसने के लिए पुलिस की निगरानी में ऑक्सीजन सिलिंडर की आपूर्ति की जा रही है।
ऑक्सीजन के लिए नारायणा में इंतजार करने वाले अधिकतर लोगों ने बताया कि अस्पतालों में बेड, ऑक्सीजन की सुविधा न होने की वजह से उनके रिश्तेदार घर पर ही हैं। एक छोटा सिलिंडर 7-9 लीटर का होता है। यह करीब 8 घंटे तक चलता है। अगर किसी को 24 घंटे ऑक्सीजन चाहिए तो तीन छोटे सिलिंडर पर कम से कम 21-22 हजार रुपये का खर्च आता है। परेशानी से बचने के लिए कोई जल्दबाजी में सिलिंडर चाहता है तो खर्च 40-50 हजार रुपये तक पहुंच जाता है। इसलिए लोग पांच घंटे तक इंतजार करके भी अपनों के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर भरवा रहे हैं।
तीमारदारों का आरोप, ऑक्सीजन की कमी के बारे में नहीं बताया
दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में भर्ती कोरोना संक्रमितों के परिजनों का आरोप है कि उन्हें ऑक्सीजन की कमी को लेकर कोई जानकारी नहीं दी गई। शुक्रवार को तीमारदारों ने कहा कि अस्पताल ने उन्हें ऑक्सीजन की कमी के बारे में सूचित नहीं किया था। मरीज सौरभ शर्मा के एक रिश्तेदार सतीश शर्मा ने कहा कि हम समाचार देख रहे हैं, लेकिन किसी ने भी हमें ऑक्सीजन की कमी के बारे में नहीं बताया। हमारे परिवार के सदस्य ठीक हैं।
हमने उनसे सुबह वीडियो कॉल पर बात की। वहीं मरीज दयानंद वर्मा के बेटे अभिषेक ने कहा कि गंगाराम अस्पताल दिल्ली के शीर्ष अस्पतालों में से एक है। वहां ऑक्सीजन की कमी को लेकर उन्हें कोई जानकारी नहीं थी। खबरों के माध्यम से उन्हें पता चला कि वहां ऑक्सीजन खत्म हो रही है। उन्होंने कहा कि पिता तीन साल से कैंसर से जूझ रहे हैं। हम कीमोथेरेपी के एक सत्र के लिए आए थे। इसी बीच वह संक्रमित हुए।
अभिषेक ने कहा कि अस्पताल में एक बार वे आईसीयू गए थे। उस दौरान उन्हें ऐसा कतई महसूस नहीं हुआ कि ऑक्सीजन कम है जिसकी वजह से मरीजों को दिक्कत हो रही है। सब कुछ सामान्य लग रहा था। करोल बाग निवासी प्रोसनजीत के रिश्तेदारों ने कहा कि मरीज को एक अन्य निजी अस्पताल से लाकर यहां भर्ती किया था। उस अस्पताल में ऑक्सीजन स्टॉक समाप्त हो गया था। वे दो सिलेंडर के साथ यहां आए।
उन्होंने कहा कि वे नहीं जानते कि इसका कितना उपयोग यहां किया गया। अब तक अस्पताल से उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली है। वहीं धरमपाल अहलूवालिया के परिवार के सदस्य जिनकी अस्पताल में कोरोनो वायरस के कारण मृत्यु हो गई, उन्होंने कहा कि वे नहीं बता सकते कि क्या यह ऑक्सीजन की कमी के कारण हुआ। मरीज आईसीयू में था और सुबह अस्पताल से फोन आया कि मरीज की मौत हो चुकी है। हम नहीं जानते कि क्या हुआ?