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किसानों के समर्थन में उतरे देश-विदेश के 400 शिक्षाविद, कहा- नए कानूनों पर देशभर में हो चर्चा
Thu, 04 Feb 2021 05:23 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 04 Feb 2021 05:23 AM IST
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सिंघु बॉर्डर पर प्रदर्शन करते किसान...
- फोटो : पीटीआई
किसानों को अब शिक्षाविदों का भी साथ मिल गया है। भारत समेत विदेशी विश्वविद्यालयों के करीब 400 शिक्षाविदों का मानना है कि नए तीनों कृषि कानून किसानों के लिए खतरा हैं। इसलिए ये वापस लिए जाएं।
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जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, जादवपुर विश्वविद्यालय, आईआईटी व आईआईएम समेत अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षाविदों ने बुधवार को संयुक्त बयान में कहा कि दिल्ली के सभी बार्डर पर जारी किसानों के आंदोलन और उनको होने वाली कठिनाइयों पर चिंता हो रही है।
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सरकार की ओर से लागू किए गए तीन नए कृषि कानूनों का लक्ष्य देश में खेती करने के तरीकों में बुनियादी बदलाव लाना है, लेकिन ये कानून पूरे देश में कृषक वर्ग के लिए एक बड़ा खतरा हैं। सरकार को निश्चित तौर पर इन मुद्दों को दोबारा देखना चाहिए।
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इस अभियान में यूनिवर्सिटी ऑफ जगरेब, लंदन फिल्म स्कूल यूनिवर्सिटी ऑफ जोहानिसबर्ग, यूनिवर्सिटी ऑफ ओस्लो, यूनिवर्सिटी ऑफ मैसाचुसेट्स, यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के शिक्षाविद भी शामिल हैं।
तीनों कृषक बिलों पर देशभर में चर्चा
किसानों व अन्य वंचित तबकों की मदद के लिए कानून बनाने से पहले देशभर में इस पर चर्चा शुरू की जानी चाहिए। इसकी शुरुआत गांव स्तर से हो, ताकि समाज के सभी वर्गों के पक्षकारों को शामिल किया जा सके। किसानों के मुद्दों के समाधान के लिए मौजूदा कृषि कानूनों को बिना देरी वापस लिया जाना चाहिए।
वहीं, शिक्षाविदों ने सरकार को चेताया है कि प्रस्तावित कमोडिटी मार्केट मॉडल भारत में व्यावहारिक नहीं है। क्योंकि, इससे खाद्य अस्थिरता उत्पन्न हो सकती है। इससे छोटे किसानों के शोषण की भी संभावना है।